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श्रीः ।। विद्याभवन प्राच्यदिया अन्थुमाखा न्द

42312111.

णिक सिक षिण

त्रीमाकण्डेयपुराण भाषा टीका

टीकाकारः

; @३ च(वभ्बरा वद्यागवन ( भारतोय संस्कृति एवं साहित्य कै प्रकाङ्षक तथा विदरक ) चौक ( बनारस ध्टेट बकं भवन कै पीछे ) पो० बा० न° १०६९ वाराणसी २२१००९१

सर्वाधिकार सुरक्षित ` मूल्य ४0०-00 रु. पत्राकार ३५०-०0 रु. संस्करण १९९५

९.९ पः ८८९ | प्रकाशकं : / (4 नोखम्बा ? चखम्बा दद्याभवन

> ( भारतीय संस्कृति एवं साहित्य के प्रकाशक. तथा वितरक

चोक ( बनारस स्टेट ञेंक भवन के पीछे ) 76

पो० बा० न° ९०६९ 4

वाराणसी २२९१००१ ९४

९९२ प्रमुख वितरक : दूरध्वनि ३२०४०४ भ्र

ति न. | अन्य प्राप्तिस्थान : {0

चोखम्बा संस्कृत प्र | चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन 0

><? | ३८ यू. ए, जवाहरन्रः के० ३७।११७ गोपाल मन्दिर लेन | २. ~ श्रोमदधागवतम्‌ ` श्रीमद्‌. 3८ १३ ^ माक 3 ५५। 8 | भमद्रागवतम्‌ पो० बा० नं० ११२९ १२१९ 522 दिल्ली ११०००७. सम्पूर्ण: १-२ =! १९.१११... धीरो -टौकोषेतम्‌ वाराणसी २२१००१ 1 0408 एरण्ठनि | + = दुरष्वति २8६१६ : मूत्य { 000 -00 सजिल्द मूल्य ©0 -00 सजिल्द सजिल्द > 1 १८००-0 ना { ४५०-०० पत्राकार ५. { ४५०-०० पत्राकार दूरभाष : ३३२३४२९ 6 १२० भ्रीमदैवीभागवतम्‌ ~ हरिव < , श्रोमदेवोभाग हारवशपुराणम्‌ | भरोमद्रागवतम्‌ श्रीशिवमहापुराणम्‌ श्रीमद्राल्मीकिरामायणम्‌ | 5 ५२४ पाताम्बरा - नारायणी -भाषाटीकासहितम्‌ चूर्णिका -टीकोपेतम्‌ 'शिवा' भाषारीकासहितम्‌ 'रामाभिनन्दिनी' -भाषाटीकासहितम्‌ 9 „> =+ 0-०00 सा जत्थ ५००-०० सजिल्द ५००-०० सजिल्द, ८००-०० साजल्द ^००-०० > ‰< ८९ { पा ४५०-०० प्राकार { ५4०-०० पत्राकार्‌ ५. { ७.० -०० पत्राकार्‌ ४. { ५० -०9० विल 9६

= श्रीमरेवीभागवतम्‌ आनन्दरामायणम्‌ | योगवाशिष्ड-महारामायणम्‌ गर्गसंहिता श्रीमद्वाल्मीकिरामायणम्‌ 9

9176 मूलमात्रम्‌ 'ज्योत्स्ना' -भाषारीकाहितम्‌ भाषाटीकासहितम्‌ प्रियंवदा' -भाषाटीकासहितम्‌ मूलमात्रम्‌ 2

रू मूल्य १५०-०० ( सजिल्द ) मूल्य २५०-०० ( सजिल्द ) सम्पूर्णं : १-२ भाग मूल्य २००-०० ( सजिल्द } मूल्य १५०-०० ( सजिल्द ) 2९

| मूल्य ५०-०० £<

© सर्वाधिकार प्रकाशकाधीन

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श्रोमदरागवतम्‌ भि - भाषादीकासहितम्‌ ~>

शिवपुराणम्‌

भूमिका --<€~ उस्‌ सबिदानन्द करुणावरुणालय आनन्दकन्द वजचन्दके चारुचरणेमि वारवार प्रणाम है किं, जिसकी ङ्पाकोरसे मूक वाचाठ आर प्गुगण परवतापरं आरोहण कर जति यह उसदीकी महिमाका विकास हं कि, आजकल संपूण भरतकपन सर्छत चाक प्रचरी ध्वनि प्रतिध्वनित होकर सनातन ध्मावट म्विर्योको भरमदित कररही हं दस भारतव्ने वेदाथको ठेकर भरतिद्रापर युगके अन्तमं भगवान्‌ शरकेदव्यासजी परार्णोका विभाग करते वे बहमपुराण आदि अदश पुराण ह, जिनमे सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर, वंशानचरित, यह पांच विषय हेति हँ इनही पांच) विषयोके कभसे प्रातन काठके समस्त इतिहास; राजाभकि चरित्र) यष्टि आदि

विषय, तथा वेद शाका आयोपान्त समस्त सिद्धान्त आजाता है ओर रसे देसे गड विषयः मोक्षप्रा्िके उपाय सरटतासि पुरा्णामिं वणन क्रिये जति जिसमें चार्य र्णक्रे नरनारी भगवद्रक्तिटाभ कर मक््कि अधिकारी हेते इस कारण उपतिषदादिमं इतिहास पुराणकं पांचवा वेद कहकर निरूपण क्रिया हं

~

यदि प्राण वियान होती, तो पुरातन तत्वे विना यह भारत वर्षं अन्धकारे ठक जाता ओर पुराणांका आशय केवल पुरातन इतिवृत्त वणन्‌ करनहीका नही |

तः

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~~~

दे, किन्तु उपासक की उपासना टढ करते दए उसको बह्मटोककी भामि करनाही है पुराणपाठ करनेमे ठोक ओर प्रक दोरनाही बनते हँ यह शंका नहं करनी चयि कि; प्राणमं भिन्न भिन्च देवतांकी उपासना ठिखी हे, तथा जो पुराण जिस देवताकी महिमा वणेन करता हे वह दूसरे देवता न्य॒न कहता है, यह नही) पुराणी निन्दा करनेको प्रवृत्त नहीं हे, किन्तु उत्कता विधान करती है जसे को नेक महिमा वणन कसते हए कहै कि रम्हारी समान कान नही ई, तो उसका वह कहना सयरी है!्सी प्रकार प्राणो मं परमेशवरका भिन्न भिन्न शक्तिषपसे वणन ज॑से टिखा है कि “शिवका समान्‌ दसरा नही, विप्णुकी समान दसरा नही, देवीकी समान दूसरा नरी इसके भजने मुक्ति रोती है इस बातके देखनेसे यह वात निय हूं कि) नाममात्रका भेद

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ट, परन्तु शक्ति सबकी बरावर है, तव विचारनेमे विदित होता है, यह सव परमेश्वरकेदी रूपान्तर इसमे सवही पुराण परमेश्वरके भरतिपादक ह, यह बात सिद

भरकर परणाक्र हव्रह (कवा

1

< हे ओर प्राणाम अदश मेद्‌ दस कारण है कि सत्‌, रज, तमके सम, विषम न्युन भेदे प्राणियाके सभाव अग्रह भकारके होते जिसका सवाव जसा होता ॥९

ह्‌, वेसीही कथा अ।र देवतामं उसका मन छगता ₹, इससे भगवान्‌ श्रविदव्यासजाने यह्‌ पवार कर्‌ किं सवका ह। चित्तवृत्ति उत्त पस्मालम दवजा) अगरह |

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| पुराणक्ी क, नके कार साधारे | | यर पराणी सरत विधां हने कारण सपे साधारण इनके ररस्योको नदीं समञ्च सकत) यही विचार कर . इनका रीका सक्षाधारणके समे पोर | | ददी क्षामं शका समाधानके सदित होना परम आवश्यकः आर हमारे प्रम माननीय ज्ये भाता पण्डित ज्वालाभसादजी मिभने भीमद्धागवत, हरिवंश, शिव | पुराण आदि करै पुरार्णोका इसी भरकार टीका किया हमने जिस प्राण का रीका किया है, इसकी गेरी भी भातृद्के रीकेके अनसार रश्खी ओर एकवार टीकेको ` भकाश हेन परिे उनके दिगो चर्‌ भी करदिया हे - जिसका दीका करनं हम प्रवृत्त हुए यह पुराणम सतवा पुराण माकेण्डेय नामक है, इसमे महाभारतकी अनेक शंकांका समाधान तथा रतवष-

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की अनेक ुरीतियोके गत रहस्य, अनेक भरकारकी शिक्षा, उपदेश, बाठकोकी सुरक्षा, उनको सुयोग्य बनाना, अथै, पम, काम्‌, ेक्षादि चारो पदाथोकी भाषिकि मत्‌ न्तः नार करट कहीं गृढ विषयोका विवर [कित्‌ स्थरे धानं भरीभौतिमे। | किया है, अक्षरा्थ, भावाथेको बहत स्पष्ट दिखला दिया साथमे महामाया भगवती #। चिका हका णतारि अभे वा है। दस प्ंथके शका करनेमं मरे परम मित्र _चन्दोसीनि वासी पण्डित मुन्नाराटनीशमो ओर मुरादागादमिवासी पण्डित कन्हैयालारुजी तैज्मैयने विशेष उत्साह दिलाया था, अतं एवं उक्तं महाशथाको अन्तःक्रणसे धन्यवाद दैकर आशा करताहूं कि वह्‌ सदैव इसी भकार मञ्चक उत्साहित कसते रे | `. अव यहं धथ सव प्रकारे अठंकत कर सव भरकारके स्वत्वसहित परम माननीय जगद्विख्यात ' श्रीवेङ्कटेश्वर" ( स्दीम्‌ ) यन्त्राटयाध्यक्ष सेठजी भीखेमरान| श्रीकष्णदासजी महोदयको समपण किया है जो सव भकारके सन्मानसदित निय हमारे उत्पाहको बहति रहे है | पाठक महाशयसि पाथना है कि हमने पुराणोंको मिलाकर इस प्राणका टीका मिजमतिके अतुसार किया है, यदि आप छो इमे कहीं शृ पर| | कृपाकर सुधार टे, कारण कि) सर्जन परमेश्वर है जेहि मारत गिरमिर्‌ उडादीं। कष तूर केटि छेते माहीं

परन्तु इसके पाठसे आपको अनेक विषमं दक्षता ओर भगवद्वक्तिकी प्राति होगी, एसी मुने दह आशा है।

स॒जनोंका अनुगरहीत १० कन्दैयालाल मिश्र, मोहहा-दीनदारपुरा, पररादायाद-सिरी.

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[थाया ररणा गीर मीनणि

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भूमिका.

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'ककककररुरकररररुरकररकरररुककरकररर रुरक रुर ररररुकररुररकयं

अध्यायः विषयः

षि

परश्च ओर माकैण्डेयका वपुअष्सरा शापकथन्‌

शमीकं मुनिके समीप पक्षियंका निजशापवत्तान्त

पयि वा 1 " = बतायप्मतताण ~ =+ ---------*--- ~ ---- --~ ~

के पूर्वोक्त चार भ्रश्र ओर पक्षियाकिद्ारा भग्वानूका चतुष्यरहावतार ओर प्रथम प्रश्नो त्तरकथन

| द्रोपदीके पांच पति हेनेका कारण ओर इन्द्रविकरि-

जेमिनिके महाभारतविषयकं

पतम्‌. |

चटकचतुष्टयकी उत्पत्ति

कहकर विध्याचलमं जाना चटकगर्णोके समीप जेमिनि-

| ४३

११ भाणियोंकौ उत्पत्तिकाक्रम ४०

| नि

चु

अथ मारकेण्डयपुराणभाषारीकाकी-विषयातुक्रमणिका

- <> ्८-न- 0

विषयः याकथन ...

बल्देवजीकी बह्महत्या- जनित पापप्रक्षाटनाथ

अध्यायः

_ विषयः पतरम्‌. | अध्यायः विषयः पत्रम्‌. | अध्यायः विषयः पत्रम्‌. _ | १३ |

द्रोपदीके पांच पृत्र भवि- वारित अवस्थां मृत्युको प्ाप्हुर इसकाकारणवणेन १६ , < हरिन्द्रका उपाख्यान

आडिबकयुद्ध. .. ° प्राणियाके जन्मादि-

००» ©. २२

विषयमे प्रश्च ओर पिता-

पु्रसम्बादवणेनद्रारा जीषूविपातिकथन

तीथयान्नाका कारणदणन १५ |

= २५

विषयः पतम्‌. १२ नृरकविवरण ४१ १३ यभदृतसे विदेहराजकीवाता ४३ १४ कमेफङजनित नरकया- तनावणेन ..* ,.. १५ कमेविपाक ओर भराणि- यका नरकसे छटकारा ४९ १६ पतिवतामाहात्म्य ओर

अध्यायः

४४

अनसूयाको वरप ... ५३ (२० मदाटस्रावियोग

» चन्द्र, दत्तत्रेय ओर दुवौसाकी उतत्ति ...

» कातैवीये अजुनके भरति

गगैमुनिका उपदेश भर

= ज~ - -

विषयः

अनुप्रह्‌ . ..

| अध्यायः पत्रम्‌. | ,., ६२ | १८ कूवलयाश्वको कुवल्य- | ` नामकं अश्वका मिना १९ कुवलयाश्वका पाताट- गमन, मदाठक्षापरिणय | ओर भेनासरित पाताट केतु देत्यका वध ... ६६ „+ तप्स्यके प्रभावे अश-

त्रको मदाटसाकी भरि

ओर कव्या शवका

नागराजाके षर जाना

दत्तात्रेय वृत्तान्तवर्णेन ... २२ कुवटयाश्वको पुनवार

१७ कात्तवीरथके भरति दत्तात्रेयका

पदाठस्तापराप्ि ७९,

[1 8 ए. 1 ए) 1 1 2

(विकि किनि 9 0) 9006

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| करान्युन } | : #२॥।

~~~ च्यु कः दु गा = [न . >

| अध्यायः विषयः |२३ मदाटक्षाका उत्लापन ॥२४ रानधर्मकथन |२्‌ वणोश्मधर्मकीत्ेन =... | २६ गरैर्थ्यधमनिरूपण ... |२५ निमि

1

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(००००००५२

नेमित्तिकादि भाद- | कत्प २८ पावेणभराद्धकल्प | २९ श्राद्धमं प्रशस्तप्रशस्त- निरूपण

३० का[म्यन्राद्फठकथन. . . ३१ सदाचारवणेन | ३२ वञ्यावञ्यं कथनं | ३२ अलकको शासनयुक्त अगरढीकी भ्रापरि ३५ अलकेको आत्मविवेक ३५ दत्तात्रेयसे अलकेका योम्‌ पना

~= =-= न-पा = नन आक, ~ 5 "8 कः

> अध्याय, (वषयः

प्रम्‌. ३६ योगाध्याय ११३१ ३५७ योगसिदि ११४

| ३८ योगिचर््या ११६ २९ ओद्रस्रूपकथन १३७

४० अरिषटकथन ११८ ४१ अकेकी योगपद एषं

जडउ ओर उसके पिताकी

तपस्या १२२ ४२ ब्रह्माण्ड ओर बरह्मोतपत्ति-

कथन ... ... १२४ ४२ मह्माजीकीं आयुका

परिमाण १२७ ४४ प्रारुत भोर वेत सृष्टि

कथन १२९.

कि (च

४५ देवादिकी शिका वणेन २३१ ४६ मिथुनसृष्टि भोर स्थान- कल्पना -...

१२१

विषयः

४७ यक्षानुशासन

४८ दोहयैलत्ति

४९ सद्रारिसृटि

५५० स्वायमुवमन्वन्तर- कथन (१)

५१ जम्वद्रीपवणेन

५२ जमबुद्रीपके वनपवता- दिका विवरण

५५३ गगावतार

५४ भारतवयषविताग ...

५९ कृ्मसस्थान

५६ भद्राश्वादिवषवणेन. ..

५७ किम्पुरुषादिवषषणेन

अध्ययः

५८ स्रारो दिषमन्वन्तरारम्प

(२) बाह्मणवरूथिनी- संषाद्‌ ... ५९, कलिवषूथेनीसमागम

„1

पत्रम्‌. १२६ १४१ १४७

१५८ १५०

१५१ १५२ १५३ १५६

५९ १६१

१६१ १६५

अभ्कयः विषयः

६० स्वरोधिका जन्म ओर

मनोरमफे संग विवाह १६७ |

६१ मनोरमाकी दोनो सखि-

योके संग सरोयिका विवाह१७० |

६२ चक्रवाकी भर सृगका

ररोविको तिरस्कार १७१

६३ स्वारोचेष मनुकी उतत्ति१७२ |

६४ स्वारोचिषमन्वन्तर- कथन

६५ निधिनिणेय

६६ ओंत्तममनन्तरभार- मौ (३) वपति उत्तमका अपनी भार्याः त्याग भर द्विनपा्ाका टढना १७७

६७ द्विजायाको उसके पिके घर भेजना...

६८ क्षिके संग उत्तमका

१८

पत्रम्‌. |

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| अकामायाः

1 अध्यायः विषयः पत्रम्‌. कथोपकथनं १८२ ६९ ओत्तममनुकी उत्पत्ति १८४ ७० ओंत्तममन्वन्तरकथन १८६ ७१ तामन्षमन्वन्तरणन (४) "`

७२ रेवतमन्वन्तरवर्णन (५) १८९

७३ च्‌[श्षुषमन्वन्तरवणन (६) १९३ ७४ वेवस्वतमन्वन्तर आरम्ना (७) वैवस्वत मनुकी उत्पात्ते ओर विश्वकर्मा का सुयेशातन ७५ देव ओर कपिगणकर्तैक सयका स्तव एवं अशिनी- कुमार ओर यन्तकी उत्पत्ति १९७ ७६ वेवस्वतमन्वन्तरकथन १९९ ७७ सावर्णिक मन्वन्तर आरमो ( < ) सावर्णि

१९६

` अध्यायः विषयः पत्रम्‌

मन्वन्तरके कष्यादि-

कँ न्‌ = ०.8 ,७८ देवीमाहात्म्य म॑धुकेटभ-

| धू 3)

७९ महिषासुरसेन्यवध ... २०४ < © महिषासुरवध ८१ शक्रादिकत देवीस्तव..- २०९ ८२ देवीसे शुके दूतका

कृथोपकथन २१२ ८३ धृम्रटोचनवध्‌ २१६ < चण्डमुण्डवध्‌ २१७ < रक्तवीजवध्‌ ... ... २५८ ८& निशुगवध २२१ ८७ शव २२२ ८८ देवीस्तोत्र ... ... २२४. ८९ देवताओंको देवीका

व्रदानं २२६

२०७

अध्यायः विषयः

९५ हरथ ओर वेश्यको देवीका वरदान

९१ दक्षसावणे बह्मसावणे, धर्मसावणं हद्रसावणे ओर रोच्यमन्वन्त- रकथन

९२ रुचिको पितराका गाहस्थ्य उपदेश ...

९३ स्चिरतपुत्रस्तव ....

९.४ रुचिको पितरांका वर- दान

९५ रोच्ययनुका जन्म...

९६ भावयमन्वन्तर आरम ( १४ ) श्नि अभिस्तो्र

९७ भोत्यमन्वन्तर ओर सुवं मन्वन्तरश्रवण-

1

अध्यायः विषयः फलकथन. ..

९८ राजवंशानुकीत्तेन भरः 7 ओर मार्चण्डस्वरप- कथन

९९ वेदमय मा्तेण्डकी

उत्पत्ति

१०० बरह्मरृतरविश्तव , ..

१०१ कश्यप प्रनापतिकी

सृष्टि ओर अदिति-

छत दिवाकरस्तुति २४५ १०२ अदितिके

गैस आदित्यका नन्म- ग्रहण ...

१०३ भानुतनुलेन ....

१०४ विश्वकमाकतसूये- शात्‌

१०४५ सूय सन्तानगणका

पत्रम्‌

२४०

२५

२५३ २४४

२४७ २४८

२.५१

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दिष्य पत्रम्‌

` अषिकारलाक्न -.. २५२ १०६ संज्यवद्नकी आयु | वदधिकामनासि भजा- | कौ सूर्यआराधना ओर किपरगेणरूत

भानुस्तव्‌ २५५३ १०७ राजा ओर प्रनागण-

की आयुवो ... ९१७

१०८ सूयेवंशानुकरम ... २५९

३०९ पूषघोपाख्यान ... २६०

११० नाभ्नागचेरित २६१

१११ प्रमतिशुपि २६३ ११२ ठृपावतीको अग्‌-

अध्यायः विषयः पम्‌ स्त्यजाक जभाताका शपि २६४ ११३ भलन्दन ओर वत्सभी- चरित ... २६५ ११४ भरंशुप्रजाति ओर खनिजकरे राज्यका वि प्रण २६९ ११५ खनित्रच्‌रित्र २७१ ११६ विषिंशचरित्‌ २.७२

११७ खनिनेत्रचरित ... ११८ करन्धमचरितं ... २७५ ९१९ अवक्षितका जन्म

ओर वेशाहिनीह्रण २५७६ १२० युद्धम अवीक्षितका

अध्यायः विषयः

वनम्‌

बधन ... ,., २७७ १२१ अवीक्षितका उद्धार ओर

वैराग्य २७८

१२२. अवीक्षितका पिति

अगीक्रार... ... १२३ अवीक्षितके द्रारावेश-

दिनीका उद्धार ... २८३ १२१४ अवीक्षितके रुग

वेशािनीका विवाह

ओर मरुत्तराजाका

जन्म .. २८५५ १२५ मरुत्तकी राज्यप्राप्ति २८७ १२द्‌ मरुत्तके यज्ञका षिव-

रण भर उकषके प्रति

५८

इत्यनुक्रमणिका समाप्ता

अध्यायः विषयः | पितामही वीराके उप- देशबाक्य ... २८९ १२७ नागोका भामिनीकी शरणमे आना ... २९५० १२८ मरुत्चरित्‌ १२९, नूरिष्यन्तचरित . . १३० दमचरित, सुमना- स्वयम्बर्‌... ..* १३१ नरिष्यन्तवध ... १३२ वपुष्मानूके वधाथ दम- की प्रतिज्ञा १३३ वपुष्मानूका वध ... ३०१ १३४ माकेण्डेय पुराण सुन- नेका फट्‌... , ३०३

पचम्‌

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श्रीगणेशाय नमः अथ माकंण्डेयपुराणभाषादीकाप्रारंभः पङ्खाचरणम्‌-श्ीकः गोरीपत्रं नमस्कत्य शारदामम्बिकां तथा बरह्ाणं शंकरं विष्णुं देवदेवं जगद्ररुम्‌ सुखानन्दतनूजेन कन्देयालाटशर्मणा माकंण्डेयपुराणस्य भाषाटीका विरिच्यते

जो संसारके भय ओर दुःखके नाश करनेमे योग्य एकान्तचित्तवाडे योगीजन ओर संन्यासी जिनके चरणोंको ध्यानद्वारा पराप्त करके प्रणाम करते हँ, जिन्हनि

प्रगट होकर श्रलोक पुवर्छोक स्वछौकको वामनरूपसे अतिक्रमण किया है, वह नारायणे चरणकमल आपको पवित्र कर सब पापसमृहं के नाश केरने में |

चतुर, क्षीरसागरमें शेषजीके शरीरपर मूर्पिमानूहो शयन करनेवाठे, जिनके श्वासे जटके कराल कणिका कमित होती हँ जिसमे एसा समुद्र जिनके संगते सृत्य

करतासा दिखाई देता है, वह अविनाशी तुम्हारी रषा कर नारायणनरः नरोत्तम ओर देवी सरस्वतीको भणाम्‌ करके जयकीतेन अथौतु पुराणादि पाठ करं॥ ३॥

श्रीगगेज्ञाय नमः श्रीमदेङ्टेलञाय नमः॥ अथ माकण्डयपुराणप्रारभः पव .॥ नमे भगवते वासुदेवाय यद्योगिभिभवभयािषिनाङयो | ग्यमासायवेदितमतीवविविक्तचिततेः तद्ःएनातहरिपादसरोजयुग्ममाविभवत्कम्‌विरंषितभूषवःस्वः १॥ पायात्सवःसकठ्कल्मपभेददक्ष्ीरोदङुकषिफ | गिभोगनिविष्टमूतिः श्वासावधूतसरिोत्कणिकाकलः सिन्धुःृत्यमिवयस्यकरोतिसंगात्‌ नारायण॑नमसछृत्यनरचैवनरोत्तमम्‌ देवीसरस्वतीं व्यासंततोनयसुदीसयेत्‌ तपःस्वाध्यायनिरतंमाकंण्डेयंमहाखनिम्‌ व्यासशिष्योमहातेजानेमिनि-पयेपृच्छत्‌ भगवन्‌ | भारता्यानंन्यातेनोक्तमहात्मना परणेमस्तमरेःश्रेनौनारा्सषठचयैः २, नातिदधिसमायु्तंसाधरान्दोपरोभितम्‌ प्रपकीकतितिद्न्तपरि | निष्ठासमन्वितम्‌ ॥२ भिदश्ानांयथाविष्णुद्रिपदाराह्मणोयथा भूषणानांचसवषांयथाच्रूडामणिरः यथायुधानाङ्कटिरमिन्दियाणांयथामनः |

तयेदसर्वश्ञाघ्लाणांमदाभारतयुत्तमम्‌॥५॥ | | एक समय महषि वेदव्यासजीके शिष्य महातेजा जैमिनिने प्रम तपस्वी, वेदादि पढनेम निरतः महामुनि माकण्डेयजीसे ढा हे भगवन्‌ ! महातमा वेदव्यासजीनि भारत नामक जो भथ वर्णन किया दै, सब अनेक शाके ममोथसे युक्तं विशद्ध शब्दस परिपूर्णं छन्द ओर अढंकारादि से युक्त, कानेको सुखदायक शब्दस संयुक्त ओर उसमे जो सव भशन कदे उनका भी .यथाथं उत्तर रभिेशित है जेते देवताभमंवि्ु, मनु यमि ब्राह्ण संपूर्णं गहनो जेते चूडामणिं भ्म भसे वज ओर सव इन्द्रयोमं जसे मन भधान रसीभकार शाम यह महाभारतदी एकमात्र

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| इरे धमे, अथ, काम ओर मोक्ष सबरी परस्पर मिरे दए ओर भरकटित रूपमे तथा पृथङ्‌ पृथक्‌ वर्णित हुए अतएव यही धशा, अर्थशान् | कामशाञ ओर मोक्षका साधन शाख है हे महाभाग , बुद्धिमान्‌ मरपिवेदग्यासजीने चारों आभमोका आचार अवस्थान ओर साधन भवही इसमे विशेष ||ह वणेन किया है हे तात ! उदारकमो महष वेदव्यासर्जने इस महा भारत नामक महाशाख्की .दस प्रकार रचना करी है कि, यह अत्यन्त विस्तृत (‡ ||हेनेपर भी इसमे किरी स्थलका प्रस्पर विरोध नरी दुआ वासुदवके वचनरूपी इस जलराशिने बेदहूपी परयतसे निकटकर कृतरकहषी पृक्षोको उखाई |पथ्वीको रजरहित करदिया है १० रङष्ण देपायनभणीत पचमवेदस्वरूप यह महाहद ( तालाब ) मधुर शब्दरूप महास ओर महास्यानरपी कमलेकि,

|| अवराथेशेवधमेश्चकामोमोक्षश्चवण्येते परस्परालबन्धाञअसानुबन्धाश्वतेपथक्‌ £ धममेशाखमिरदेशरष्ठपथेशाश्मिदेपरम्‌ कामशाघ्नमिदैचाग्यंमो || श्ाहयेतथोत्तमम्‌ चतुराश्रमथमोणामाचारस्थितिसाधनम्‌ परोक्तमेतन्महाभागवेदव्यासेनधीमता ॥८॥ तथातातक्ृतंयतव्यासेनोदारकमंणा

| यथा व्याप्तंमदाशाश्रविरोधेनीभिभूयते ग्यासवाक्यनरोषेनकुतकैतरुदारिणा वेदशेखवतीणेननीरनस्कामदीकृता १०॥ कलरब्दमहाहंसं

| पहाख्यानपराम्बुनम्‌ कथाविस्तीणेसलिठंकाष्णेवेदंमराह्वदम्‌ ११॥ तदिदं भारताख्यान॑बहथशतिविस्तरम्‌ तत्ततोज्ञात॒कामोरभगवस्त्वामुप

स्थितः १२॥ कस्मान्मानुषतांप्राप्तोनिशेणोऽपिजनादेनः वासुदेवोनगत्सूतिस्थितितेयमकारणम्‌ १३॥ कस्माञ्चपाण्डुपु्ाणामेकासाद्रपदात्मना॥

| पञचानांमहिषीकृष्णाह्यजनःसेरयोमहान्‌ १० भषजत्रहमहत्यायाबर्देषोमहावः तीथेयाजापरसद्गनकस्मा्रेदरायुधः १५ कथंचद्रोपदे | यास्तेऽकृतदारामहारथाः ॥¦पाण्डुनाथामदात्मानोवधमापुरनाथवत्‌ १६॥

दारा शोभायमान ओर विस्तीर्णं कथारूपी जके द्वारा पणे हआ है ११ हे भगवन्‌ ! जो वेशथं ओर शरुतियोतसे युक्त है उस महाभारतनामकं शाश्चका यथाथ [रूपसे अथं जाननेके निमित्ती भँ आपके पास आया हं १२ जो जगती सृष्टि, स्थिति भोर संहार करते है पह जनादैन वासुदेव निगुण होकर भी किस [कारण मनुष्यत्वको भाप हुए थे ! १३ अकेटी दुषदपुतरी दरौपदी ष्णा जिस पकार पंच पांड्ोकी महिषी हृदं थी ! इस विषयमे ुञचको महान्‌ संदेह दै |॥ १४ ओर महाबरुशाटी बल्देवजीने तीथयाजाके प्रसेगमे किस भकार बह्हत्यके पापका प्रायश्ित्त किया था ! १५ ओर पाण्डव निनके सहायक निनके रोके उदरे सपमं जगत्‌ अवस्थान करति ओर जो सदादी क्रीडा करते अधीत सचिदाने स्वस है उनकोही वासुदेव कहते हं

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थे) उन्‌ महारथ ब्रोपदीके पूत्रेनि अविवाहित अवस्थामे किस प्रकार अनाथकी समान प्राण त्याग किया १६ यह सब आप मूसे विस्तारसहित वणन कीजिये क्योकि आपी अबोध पुरुषांको ज्ञानोदय कराति है १७ योगशास्रोक्तं अटौरह दोषरहित महामुनि माण्डेयजी जैमिनि मुनिके इस प्रकार वचन | सुनकर कहनेलमे १८ मारकण्डेयजी वोठे-हे मुनिसत्तम ! भरे संध्यावन्दनादि करनेका समय उपस्थित हुआ है,यह विस्तारसहित केका समय नहीं है | |॥ १९ हे जेमिने ! जो पक्षी यह विषय तुमसे कर्हगे, उनका वणेन करता वह क्षी यह विषय सुनाकर तुमको संदेहहीन करगे २० रिगाक्ष, विबोध. सुपुत्र ओर सुमुख इत्यादि खगभषठ द्रोणके पुत्र शासका तत्व जाननेवाठे ॥२१। पक्षी विन्धयपवैतकी कन्दरामे वासर करते है, देदशाबार्थत्नानमे उनकी बुद्धि

एतत्सवेषिस्तरशोममास्यातमिरदेपि भवन्तोमृदधुदधीनामवयोधकराःसदा १७॥ इतितस्यवचःत्वामाकण्डेयो महाघुनिः दशा्टदोषरहितोक् समुपचक्रमे १८ माकंण्डयउवाच क्रियाकारोऽयमस्माकंसंपापतो युनिसत्तम विस्तेचापिवकतव्येनेषकारःप्ररास्यते १९॥ येतुवकषय | न्तिवक्ष्येऽयतानदंजेमिनेतव तथाचन्सन्देद॑त्वाकरिष्यन्तिपक्षिणः॥ २०॥ पिद्धक्षमिगोपन्चयुपुवःसुयुखस्तथा दरोणपुत्राःखगग्रष्ठास्त्तजञाः |. शाख्रचिन्तकाः ॥{२१ वेदशाख्राथविज्ञानेयेषामव्यादतामतिः विष्यकन्दरमध्यस्थास्तानुपास्यचपृच्छच २२॥ एवयुक्तस्तदातिनमाकैण्डेयेनधी | मता भरयुवाचर्षिरादरोविरुमयोतफखलोचनः २२॥ जैमिनिरुवाच अत्यद्तमिद्हमन्सगबागिवमालुषी यतपक्षिणस्तेवज्ञानमापुरतयन्तु रेभम्‌ २४॥ तिय्यैग्योन्यांयदिभवस्तेषा्ानंरतोऽभवत्‌ कथचद्रोणतनयाःप्रोच्यन्ेतेपतत्रिणः २५ कशचदरोणः परविस्यातोयस्यपु्रचतुष | - यम्‌ जातेगुणवतां तेषांधमेज्ञानेमहात्मनाम्‌ २६॥

कशी नहीं सकती हे, तुम उनकी उपासना करके पूो तो सब विषय जान सकोगे २२ बुद्धिमान्‌ माकण्डय्जीके इसभकार कलनेपर उन कषिशादड जेमिनिने विस्मयोत्फुडनेव होकर पिर पूछा २३ जेमिनिने कहा-हे बन्‌ ! पक्षी मनुप्यके समान कथा कह सकते प्रथम तौ यही [आशय हे ओर फिर इसपर भी उन्देनि अत्यन्त दुरपर शाब्ज्ञान भराप्त कियाद २४ जो हो. यदि ति्ग्योनिमे उनका जन्म हुभा ₹ै, तो फिर उनको || रसा ज्ञान कहां से हुआ ओर किस ल्मि उनको द्रोणपुत्र कहते हँ २५ यह्‌ चार पक्षी जिसके पत्र वह गोण फोन है भर इन गुणवान्‌ महात्मा पक्षि ||

निद्रा तन्द्राः भय, कोध, मोह, मद्‌, उन्मद्‌? प्रमाद, विस्मय, सन्देह, कोम, असूया, मात्स, कपटता, मिथ्या, नास्तिकता, अगमदषिता ओर अदिप

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| | टना दृद थी, वह एकाम चित्तसे सुनो >७ एक दिन देर्बषि नारदर्जीने हात उपस्थित होकर देखा कि) देवराज इन्द्‌ कितनीरी वेश्याभंति परिटिहो | | ||उनंके मुखकी ओर देखरहे है २८ शचीपति इन्द्रे उन महपिभको देखतेरी उठकर अत्यन्त आदर किया ओर मेके श्थि उनको अपना आहन | दिया २९॥ इन्द्रको उठता हभ देखकर स्वगेकी वेश्याओं ने भी उठकर महरपिको भरणाम किया ओर विमीतभावसे मीचेको म्तकं किये खडी रहीं २० | (नारद इसभकार उनसे पूजित हो जव इन्द्रे सहित बेठे, तब परस्पर यथायोग्य अनेकपकारकी वातो करने रुगे ३१ इसी बीच शचीपति न्द्रो महा | मारकण्डयउवाच शृणुष्वावहितो भूत्वायदृत्तनन्दनेएरा राकस्याप्सरसांचेवनारदस्यचसंगमे २७ नारदोनन्दनेऽपरयतपंधरीगणमध्यगम्‌ | | शक्रखराधिरानानेतन्युखासक्तखोचनम्‌ २८ सतेनरपिवरिष्ेनदष्टमाजःराचीपतिः सत्तस्थोस्वकंचास्मेददावासनमादरात्‌ ॥२९ तदष्चवल्त्रघरषु | | त्ितंनिदश्ाङ्गनाः प्रणसुस्ताशचदेवषिषिनयावनताः स्थिताः ॥३०॥ तामिरभ्यधितःसोऽथ उपविषटरातकतो यथादेकृतसंभाषःकथाशक्रेमनोरमाः | | ३१ ततः कथान्तरेशकस्तयुवाचमहासनिम्‌ राक्र उवाच दे्यज्ञानृत्यतामासांतवयाभिमतेतिषे ३२॥ रम्भावाककंरावाथयेरेयथ | | तिखोत्तमा धताचीमेनकावापियजरवाभवतोरुचिः ॥३२॥ एतच्छरत्वाद्िजशरषठोवाचाकरस्यनारदः रिचिनयाप्सरसःप्ाहविनयावनताः स्थिताः २४॥ | युष्माकमिदसवोसा पोदायैयुणाधिकम्‌ आत्मानंमन्यतेयातसानृत्यतममागम॒तः ३५ गणरूपविदीनायाःपिदधिनीसयस्यनास्तिे चातेधषठानव | ्रत्यनृत्यमन्यादरिडम्बनम्‌ ॥३६॥ माकण्डयउवाच तद्वाक्यसमकाठंचरएकेकास्तानतास्ततः अरगणाधिकानतनतवचान्यत्र रवम्‌ २७॥ |

मनिसि कहा, इन्द्र बोरे-हे महाभाग ! भिसको आपकी इच्छाहो गाने की आङ्ञादो ३२ रंभा, मिश्रकेशी, तिलोत्तमा, उशी पृताची वा मेनका ह्म जि| सकी अभिलाषाहो उसीको नृत्य करनेकी आज्ञादो ३३ द्विजश्रेष्ठ नारद्जीने देवराज इन्द्रके यह वचन सुनः कु काल चिन्ता कर विनेय करती हुईं अप्त रासि कहा ३४ देखो, तुमे जो रमणी रूपवती ओर उदारता इत्यादि गुणो मं अपनेको विचारतीहो वही भरे पन्सुख 4. त्य करे २५॥ | क्योकि रूपवती ओर गुणवतीके अतिरिक्त नाटवशाह्मे अन्यकी सिद्धि नहीं होती वं हाव, भाव ओर कटाक्ष विकपादि युक्त _चृत्यकोही रत्य कहौ वी

[अन्य सृत्य वृथा ३॥ ३६॥ मार्ण्डेयजी बोठे-अनन्तर उनका यह कचन सुनकर एक एक अप्रा परस्पर कहने ठगी" भें ही सबसे गुणोमे अधिकटूं तुष नहीं ` ३४॥ |

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कित्वा नक ८3 चै = -~ ~. 3 कोम सजा (वदनन, योक कियो

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ते किस भकार ध्न अः \ २६५ मफेण्डेयजी बोरे जमित! पूवैकारमे नन्दनवनमे इन्द्र, नारद ओर अप्परां के एकत्र मिलित देगेषर जो|| *भा०धै° `

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इसप्रकार विशद उपस्थित हभा देखकर भगवान्‌ पाकशासन ( इन्द्र ) ने कहा) तुम इन मुनिसेही पू, तुममं कोन गुणवती है सो यही कह

पवयलामााव्ः

चररुरकरुरररुररररर ररर गर रनर रररररर ररर

4

[सकते २८ हे जैमिने ! इन्द्रकी इच्छानुसार चलनेवारी वेश्याओकि पएुखनेपर महि नारदजीने उस समय जो कहा था, कतां सुनो ३९ नार ।दजी बोले-देखो . मुनिभेष्ठ दुवौसा प्वैतके ऊपर तपस्या करते ह, उनको जो मोहित कर सकेगी, तुममं वही अधिक गुणशालिनी है ४० माकण्डेयनी || ई| (बोले-उनका यह वचन सुनकर सव अप्सरानि मस्तक कम्पायमान करके कहाइस काके करनेमे हमारी सामथ्यं नहीं है ४१ तनमे पपुनामक एक अप्त || | राने अनेक वार अनेक यृनियोकै तप भग किया थाइसी कारण उसने गवं सहित कहा-भज्ञा कीजिये, जहां दवासा मुमि स्थित है मे वरीं जाङगी ४२॥ पे

(4 (धि

| तासांसेत्रममारोक्य भगवान्पाकरापननः प्रच्छयर्तायुनिरित्याहवक्त

यावोगुणधिकाम्‌ ३८ रक्रच्छन्दानुयाताभिःपषटस्ताभिःसनारदः | प्रोवाचयत्तदावाकयंनेमिनेतत्निबोधमे ३९ तपस्यंतंनोन्दरस्थंयाद्षोभयतेबटात्‌ इवाससंसुनिशरष्ठं तवोमन्येगुणाधिकाम्‌ ४०॥ माके ण्डेयउवाच तस्यतद्रचनंशचत्वासवोवेपितकन्धराः अडाक्यमेतदस्माकमितिताक्रिरेकथाः ॥४१॥ तत्राप्सरावपुनौममुनिक्षोभणगिता प्रतय वाचानुयास्यामियजासेसंस्थितोभुनिः ४२॥ अदयतदेहयन्तारपयुक्तेद्धियवानिनम्‌ स्मरराखगरुदररिमकरिष्यामिढुपारथम्‌ ४३ ब्रह्मानना दैनोवापियदिवानीरुखोदितः॥ तमप्ययकरिष्यामिकामाणक्षतान्तरम्‌ ॥४४॥ इत्युक्ताप्रजगमाथप्राखेयार्िवपुस्तदा स॒नेस्तपःप्रभवेणप्रशान्तश्वापदा अमम्‌ ४५ सापुंस्कोकिरमाधुयायतास्तेसमदायुनिः कोडमा्स्थितातस्मादगायतवरप्सरः ४६॥ तद्रीतध्वनिमाकण्यसुनििस्मितमानसः जगामतजयतास्तसाबारारुधिरानना ताँदक्चायारुसवोद्गीमुनिःसेस्तभ्यमानम्‌ क्षोभणायागतांज्ञात्वाकोपामषैसमन्वितः ४८॥

| अभी कामबाणके आधातसे उनकी मनोरूप लगामको छेदन कर इन्दरियरूपी पोडोको उन्मागेगामी करके देदृरूपी रथको वुदिरूप सारथी विहीनं करूंगी ४३ यदि बह्मा विष्णु वा महादेव भी हों, तो भी निःसन्देह इस समय उनका अन्तर कामबाणसे जेरिति करुगी ४४ वपु नामक अप्रा यह || (कहकर हिमाटय पयैतमें गै, वहां मुनिकी तपस्याके प्रभावसे आश्रमवासी हसक जीव भी अत्यन्त शान्त थे ४५ अप्मराभमं गरष पपु जहां | ¢ || महामुनि दुर्वासा वास करते थे, वहसि एक कोशमात्रके अन्तरम अवस्थानकरके पस्कोकिलके समान मनोहर कैठसे गान करने छगी ४६ मुनिवर | सी इस भीतको सुनकर जहां वह कोकिलकेठी बाला स्थित थी, आश्वर्यचिक्तसे वहां गये ४७ मुनिवर दुवोसाने उस सवोङ्गुम्दरी कमिनी को देख, मन|१|

#ॐ6 9994

| | त्यि | अत्यन्त || रेक भरे तपम वि करने के स्थिरौ आदं है ` यह समञ्च अत्यन्त को यक्त होकर ४८ महातपा मरि ने

॥-३॥ | |‡ | कने ¡जन्म रहण करके रहेगी ५१ रे अप्स्राधम ! तू अपना रूप त्याग कर पक्षीरप धारण करेगी तेरे चार पत्र उत्पन्न हेगि ५२

|: करे की भीति भाप करोमे वचित होगी ओर शब्ञाघातसे विनषटपापहोकर किर स्वगं जायगी, देखना इसमे अब कोई उत्तर करना ` ५३

||| उवाचिदेततोवाक्यंमहषिस्तांमातपाः॥४९॥ यस्माद्‌ःलाभितस्थेहतपसोविघ्कारणात्‌॥ आगतापिमदोन्पत्तेममदुःखायसेचर तस्मातसुपणेगेनेतव |१| म्तोषकलषीकृता॥नन्मभरप्स्यतिद्प्मजञेयाद्रपोणिषोड्‌॥५१॥ निजरपंपरित्यन्यप्षिणीरपथारिणी। चलाप्ेचतनयाननि ॥५२॥ ||| अगपराप्यतेषुचप्ीतिश्खपतापुनदिषि वासमाप्स्यसिवकतव्यनोत्तरतेकथचन | ५२॥ इतिवचनमसद्यंकोपसंरक्तदटशिश्रुकर्वर्यां ामानिनीं वमित्वा ||| तरठतरतरङ्कगापरित्यज्यविपःप्रथितगुणगणो्ासिप्रयातःखगद्धम्‌ ॥५०॥ इतिमाकंण्डेयपुराणेवपुरापकथनंनामप्रथमोऽध्यायः १॥ माकैण्डे ||| यउवाच अरिटनेमिपुब्रोऽभूद्ररुडानामपक्िराट्‌ गरुढस्याभवतपुनःसम्पातिरितिभिथतः तस्याप्यासीतसुतःशरसुपाश्वोवायुषिकमः॥ सुपास्वैत (4 नयःङन्तिःडुन्तिुन्ःप्रोलुपः ॥२॥ तस्यापितनयावास्तांकट्कःकन्धरएवच कड्कैकासरिखरविचुद्रपेतिषिधुतम्‌ द्द्म्बुनपत्राकषरक्षसं || || पनदायुगम्‌ आपानापक्तममरुक्षग्दामाम्बरधारिणम्‌ भायोसहायमासीनंरिखषटेऽमरे्ुभे ५॥ |

गेगाको चेगये ५४ इति श्रीमाकेण्डेयपुराणे मुरादाबादनिवासिकन्देयाटाठमिश्रकतभाषाटीकायां वपुशापवणेनं नाम प्रथमोऽध्यायः | ाकेण्डेयजी बोले कि) सब पक्षियेकि राजा गरुड अरिषटनेमिके पुत्र हुए, गरुड का पतर सम्पाति हआ अत्यन्त बलवान्‌ ओर वायुके समान विक्रमशाढी सुपाश्बे सम्पाति का पुत्र हआ, इसका पुत्र कुन्ति ओर कुन्तिका पुत्र प्रोटुप हुभा॥ परोलुपके दो पुर हए. कंक ओर कन्धर ॥३॥ कंकने एक दिन कैलास

|| |च! गेरी इस दुःसखोपानित तपस्याभे तू विप्र करनेके रिथिरी आई है ५० इस कारण रे दुबे! तू मरे कोधे कटुषित होकर सोरहवरषतक पिके |

तु पुर उलन्न||

| पवेत जाकर पञ्मपत्रके समान विशार नेजवारे कुवेरके अनुचर विदुदरूष नामक राक्षसको देखा यह राक्षस उस समय निर्मल माला ओर अच्छे अच्छे |

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|‡ | बाहणभेष् महि दुवौसा कोधे काल नेवरहो चैचरु मनोरम कैकणधारिणीमानिनी वुको यह्‌ वचन सुना कर, पृथ्वीको छोड, भतिद गणो से युक्त आकाश |

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वञ्च धारण किये स्वच्छ शिलापर भायोके सग वेढा हुभा मयपान कर रहा था विधुद्रष राक्षस कंको देखतेही अत्यन्त करोधित होकर कहनेठगा रे | | पक्षियों मं अधम ! तू किंसयियि यहां आया! ॥६। वकि संग बेदाहूं हस समय किस कारण तू मेरे समीप आया हे ? क्योकि रह्यका्यमे बुद्धिमान्‌ पुरुपाको एेसा | आचरण नहीं करना चाहिये कंकने कहा-इश पवतर सव का समान अधिकार रै, दशमं निसभकार तुम्हारा अधिकार है केसाही मेरा रै. ओर अन्यान्पज ्तुवोंका भी उभीभकार है, किर इस विषयमे तुमको इतनी ममता क्यों हे मारण्डेयजी बोले-फंकके इस भकार कहनेपर उस ,राक्षसने अत्यन्त कोधि- | तहो खड़गाघातसे उसका शिर काट डाः शिर कटनेके कारण रुधिरके गिरनेमे अतिभयंकर कायं हअ) तब कंक रिचेतन होकर मर गया ° इसके पीठे

तदष्टमं कडनरक्षःकरोधस्षमन्वितम्‌ प्रोवाचकस्मादायातस्त्वमितोद्यण्डजाथम & श्चीसन्निकरषतिष्ठन्तंकस्मान्माभुपसपेसि नेषधमेःसुबद्धीनांमि योनिष्पादयवस्तुषु कडङ्उवाच साधारणोऽयशेटेन्द्रोयथातवतथामम अन्येषां चेवजन्तुनांममताभवतोऽ्रका माकेण्डेयउवाच घवाणमित्थखद्धेनकड्ंचिच्छेदराक्षसः क्षरक्षतजवीभत्तविस्फुरन्तमचेतनम्‌ ९॥ विनिहतंशुत्वाकन्धरःकरोधमूितः विदुदरपवधायाङ्ुमनर्च ण्डजेर्वरः ॥१०॥ सगत्वशेखशिखरंकङ्ेयतहतःस्थितः तस्यसेकटनंचकरेभातुर्ज्येष्ठस्यखेचरः कोपापषविवृत्तक्षोनागेन्द्हवनिःरवसन्‌ ११ नगामाथस्यवास्तेधात्दातस्यरक्षसः पक्षवातेनमहताचाखयन्भूधरान्वरान्‌ \। १२ वेगात्पयोदनालानिविक्षिपनक्षतनेक्षणः क्षणातक्षयितशघ्ुः पपक्षाभ्यांक्रान्तभूथरः १३ पानासक्तमतितयतंददशेनिशाचरम्‌ आताग्रवक्रनयनंरेमपयंङ्माशितम्‌ १४ श्दामापूरितशिखंहारिवन्दनभ पितम्‌ केतकीपत्रगभोभेदेतेवोरतराननम्‌ १५

| पक्षिया मे शरेष्ठ कन्धरने कंकको मरा हआ सुन अत्यन्त कोधसंहित विदयुदरूष राक्षसके मारनेकी इच्छा करी ॥१०॥ अनन्तर वडा भाद केधर कंक जहां माराग्या था, केढा पर्वते उसी स्थानम जाकर उसका अन्त्यष्टि कम किया ओर विर्फारतने्मि सर्पकी समान श्वास ठेता हभ ११ भाताका मारनेवाठा | वियुद्रप॒राक्षस जहां स्थित था, वहां गया, उसके गमनसमयमं प्खोँकी वायुके वेगसे आहत होकर बडे बडे पेत चटायमान हीने गे १२

-ॐ

ओर समुद्रका जट इधर उधर विखरने ठग केधरने इसप्रकार एकमात्र पके आश्रयते क्षणमात्रमही पवेतको आक्रमण क्रिया १३ पक्षी

| ष्ठ केधरने पवैतके ऊपर पहुंचकर देखा कि, निशाचर विदुदरूप सुवणंमय शय्यापर वेढा हुभा मयपान कर रहा है १४ उसके मुखमण्डल ओर दोनों नेत्ेनि

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| लाटव्ं धारण किया हे ओर उसका मस्तक मासि युक्त) सवोङ्ग हरिचेदनके द्वारा चवित ओर मुखमण्डल केतकीपुष्पके गर्पत्रकी समान सफेद दतांकी पैक्तिसे शोभायमान हो रहा ईं १५ आर यह्‌ भा देखा किं, एक सवोङ्गसुन्दरी कोकिलकेटी नितम्बिभी उसके समीप वेदी है, यही उसकी प्रती है कमिनीके दोनों नत्र बडे आर उसका नाम मानिका हं १६ इसके उपरान्त पक्षयोमं कन्धरने अत्यन्त कोधित होकर पर्ैतकी कन्दरा वटे हृए निशाचरो बलाकर कहा रे दुष्टात्मन्‌ ! शीघ्र आनकर्‌ मुञ्ञसे युद्धकेर १७ जो फं, ते ने मदोन्मत्त होकर भेरे बडे भारे केकफो वध किया ह, इस कारण अब

तञ्चको निःसन्देह यमाटय गेजृगा १८ विश्वास्षघातकता, खाहत्या आर बालकाकी हत्या करनेवाठे पातकी जिन नरकोमं जति तू भी इस समय मेरे

बूमोरूपाश्रताचास्यदद्शायतखचनाम्‌ पनमदनकनापपुस्काकंरुकरुस्वनाम्‌ १६ ततोयेषपरतात्माकन्धरःकन्दगस्थतम्‌ तसमुवाचस दषातमत्रदियुध्यस्ववेमया ।॥ १७ यस्माच्यष्टोममत्रातविश्रन्धोवातितस्त्वया तस्मात्तवांमदसंसक्तंनयिष्येयमसादनम्‌ १८ विशवस्तघा तिनांेकयिचद्चीबाख्वातिनाम्‌ ।॥ यास्यसनेरयान्वास्तास्त्वपयमयाहतः १९॥ माकेण्डयउवाच ।॥। इत्यवपतगन्दरेणपरोक्तस्नीपतिधो तदा।॥ रक्ष कोधसमाविषप्रत्यभाषतपक्षिणम्‌ ।। २० यदितेनिहनोधातापोरुषंतद्विदारीतम्‌ त्वामप्यद्यहनिष्येरखडेनानेनखेचर २१ तिष्क्षणं नायजीवन्पतगाधपयास्यास ॥। इत्य्ासनपुलाभावमट्खडमादद्‌ ।। २२ ।। तत्‌ पतगराजस्ययक्षाधिपभटस्यच वभूवयुद्रमतुरुयथागरूडराक्रय) २३ ।\ ततःसगक्षसःकोधात्वडमाविध्यवेगवत्‌ चिक्षेपपतगेन्द्रायनिवोणाङ्ारवचेसम्‌ २४ पतगेनद्ररचतंखदंकिचचिदुल्यत्यभुतरत्‌ वुक्रणजग्राहतदागरूडःपन्नगयथा २५

हाथमे मरकर उन्दी नरकमिं जायगा ३९ माकंण्डेयजी बोले-वह्‌ निशाचर विदुद्रूप पकषभष्ठ केधरके यह वचन अपनी पर्नीके निकट सुन) अत्यन्त करोधित होकर पक्षीसे कद्नेकगा २० रे खेचर ! तेरे भके मारनेमं भेरा पोरुषी भरकाश पाता हे, अत एव भव इस सङ्गमे तुक्चकोभी निहत कंग ॥२१॥ रे पतगा | धम ! क्षणकाल ठहर, भेरे निकटमे जीवित अवस्थामे नहीं जा सकेगा यह कह कर उस राक्षसने अंजनपुंजकी समान ष्ण वणे निमंट खड्ञ ग्रहण किया ॥२२॥ कालम जिसभकार इन्दरके संग गरुडका तुमर युद हआ थावैसेह दस राक्षसके संग पक्षी कंध्रका साम हनि गा ॥२३॥ अनन्तर उस राक्षसे अत्यन्त कोधे

परकर अधिकी समान चमकता हआ कप्णवणे खद्च वेगसटित पक्षीके ऊपर चलाया ॥२४॥पक्षीने भी वेह पृ्वीसे कुेक कूदकर गरुड जिसभकार सपांको चोचमृं

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पकडते उसीपभकार उस खङ्गको चो चमे धारण कर खिया॥ २५॥पक्षिभष्ट कंधर चौ चम खङ्धारणपुषैक पेरोसे उसके तोड़कर अत्यन्त क्रोधित हृभा ओर उनका बाहुयुदध होने खगा २६ अनन्तर निशाचर पक्चकरद्रार वक्ष स्थलं आक्रान होकर पक्षीके प्रहारसे जर्जर हभ ओर उसकी नाडी हाथ पैर तथा मस्तक देहसे प्रथक्‌ होगया २७1 उस राक्षसके मरनेपर उसकी पत्नी मदनिकाने भयाकृटचित्तमे खगराजकी शरणागत होकर कहा-हे महाशय ! आप कीनायो हृदं } २८ खमभ्रेषठ कन्धरने-निशाचरको मारकर भ।तृवध जनित शाकेस निष्छति टा कौ आर मदतिक(को संगलेकर अपने घर आया २९ मेनकाकी पुजी निशाचरी मदनिका अपनी इच्छानुसार हप धारणकर टेपतीथी; इस कारण कंधरफे घर आनकर पश्षीरूपम अषटम्बन क्या ३० दसी पक्षिणीके उदरसे दुवक्ता सृनिकी शापानटसे युक्त वपु अषप्प्रनि जन्म महण क्रिया, खगपति केधरने उसका नाम तार्षा रक्खा ॥३१॥ हे द्विजसत्तम ! मन्दपाल वक्रपादतरेभेङ्क्त्वाचकरेक्षोभमथाण्डजः तस्मिन्भगनेततःखद्धेषाहुय॒द्धमवतंत ॥२६॥ ततःपतगरानेनवक्षस्यक्रम्यरक्षसः॥ दस्तपादकेरेरङरिरसाच वियोजितः २७। तस्मिनिनिहतेसाघीषगंश्रणमभ्यगात्‌।। कि्चित्सातसन्वाप्ाप्राहभायौभवापिते ॥२८॥। तामादायखगशरष्टस्वकेगृदमगात्पुनः।। गत्वासनिष्कृतिध्रातुविचयुदरर्पनिपातनात्‌ २९ कन्धरस्यचसविहमप्राप्यच्छरूपथारिणी मेनकातनयासभूःसोपणैदूपमाददे ३० तस्यां सजनयामासताक्षीनामसुतांतदा सुनिरापथिविषष्टंवपुमप्सरसांवरम्‌ तस्यानामतदाचकरेताक्षीमितिविदेगमः ।॥। ३१ मन्दपाठसताशसशचत्वारे ऽमितबुद्धयः ।॥ नरिताशिपिभृतयेद्रोणान्ताद्विनसत्तमाः ।। ३२ तेषानषन्योधमौत्मविदवेदांगपार- ॥। उपयेमेसताताक्षीकन्धगावुमतेज्भाम्‌ ३३॥ कृस्यचित्वथकारस्यताक्षीगभेमवपद ॥सप्तपक्षारितिगभ॑ङ्रकषरंनगापसा ३९ कुरुपाण्डवयोयेद्े वतंमानेसुदारुणे भावितराचैवकायंस्यरथपध्य | विवेशासा ३५ तापदयतयुदधंसासवेषाप्रथिषीक्षिताम्‌ दारडात्तयिभिर्भीमिययदेवासुरंरणम्‌ ३६॥ ` | | नामक बाह्णके चार पुजथे) उनमें वेडेका नाम जितारि ओर छेटेका नाम द्रोण था वह सथ अत्यन्त बदधिमानथे ३२॥ तिन वेदेदाङ्गका तत्त जानने वाटे धम| त्मा द्रीणके संग खगराज कंधरकी भनुमतिसे उस सवोङ्गमुन्दरी तापीका विवाह कर दिया था ३३ अनन्तर कुछदिन बीतनेपर उस तारक्षीको गप रहा गौ | धारणके दिनसे सात पक्ष बीतनेपर तारी कुरुक्षेत्रमं धारणके दिनसेसात पक्ष बीतनेपर तारा करुक्षजमें ३४ उस समय कोरव पाण्डवोक। | दारुण युद्ध ॒होरहाथा, क्िन्मु जो अवश्य हेनेवाटी वाते उसको कोद खंडन नहीं कर सकता, सीमे ताक्षी उस युद्धस्थटमं गै ३५ पक्षिणी ने | वहां पटुचकर देखा कि भगदत्त ओर अजुन तुमुल संयाम कर रहे हं) उनके निरन्तर दृरेहृए बाणौमे आकाशमण्डठ टीढीकी समान व्याप्त हआ है ३६

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इधर पार्थे धनुषे द्रेहुए वेगसित एकं बाणे आनकर ताक्षके जदरकी तक्‌ ( खार ) बध ठी ३७ पक्षिणीकी कुक्षि विदीणे हेनेपर चदमाकी समान श्वेतवणे चार अंडे अत्यन्त ऊचे स्थाने गिरकर भी आयुकार विशेष विमान हनेके कारण रूदैकी समान परमिमं गिरे ३८ इसी समयम भगद तके सुप्रतीक नामक गनराजक। महाभमाण गर्षटा_ बाणसे छिन्नवधन होकर गिरा ३९ य्यपि दोना एक ह! कामे पृथ्वीपर भाप हए, किन्तु घंटा इस भकार गिरा कि, उस मांसपिंडके उपरिस्थ सव अडोके चारों ओर भीभातिढकन हो गया ४० नरपतिग्रेष्ठ भगदत्तके उस युद्धम मारेजनेपर भी करव ओर प्रांडवौकी सेनाका बहुत दिनोतक्‌ युद हंभा ४१ अनन्तर युद समाप्त होनेपर ध्पृत्र युधिष्ठिर धमैविषयक नानाप्रकार उपदेश प्रहण करनेको

य॒द्धभगदत्तकिरीलिनं शि

तत्रापयत्तदायुदधंभगदत्तकिरीष्निः निरतरंशरेरसीदाकाराररुभेरिव ३७॥ पाथेकोदण्डनिशुक्तमासप्रमतिवेगवत्‌ तस्याभटमदिरयामेतवचं चिच्छेदनाटगीम्‌॥ ३८ भिप्रकष्ठेशशङ्भभूमावण्डचतुष्टयम्‌ आयुषःसावरोषत्वात्तरराङ्ञाक्िवापतत्‌ ३९ तत्पातसमकाट्चसुप्रतीकाद्रनो तमात्‌ पपातमहतीवण्याबाणसंछिन्नवन्धना 11 ° ।। स्मेसमन्तात्परा्तातुनिभिन्नधरणीतर छदयन्तीखमण्डनिस्थितनिंपिरितेपरि ।।४१॥ हतेचत सिमत्रपतोभगदत्तेनरेरवरे वहुन्यान्यभूयुद्धङुरूपाण्डवसेन्ययोः ।॥ ५२ वृत्तयुदधेधमेपेणतेशन्तनवात्तिकम्‌ भीष्पस्यगदतोऽरेषाभ्श्रोतुधमोन्मरा त्मनः॥ ४३ वण्टागतानितिषठन्तियत्ाण्डानिद्रिनोत्तम जआजनगामतमुैशंशमीकोनामसंयमी ०४ सतय्शम्दमशुणोिचीङ्कचीतिवाशताम्‌ बाल्यादस्फुटवाक्यानांविज्ञनेऽपिपरेसति ७५ अय्षिःरिष्य्तदितोषण्टपुत्पाटयवितितः अमातुपितपक्षाणिरिङकानिद्दह ४६ तानितततथाभूमोरमीकोभगवान्मुनिः दष्ासतविस्मयाविष्ठःप्रोवाचवगताम््िजान्‌ ४७॥

शन्तनुपु महात्मा भीष्मके निकट गये ४२ इसके पीछे जहां पंटेसे दके हए पक्षीके वदे वियमान थे, अकस्मात्‌ संयमचित्त बाह्मण शमीकमुनि उस

स्थानम आये ४३ ओर धटेके शीतर पक्षीके व्वोका विची कुच शब्द उन्हूनि सना यथपि बाटकोंको अत्यन्त ज्ञान हो गया था, किन्तु तो भी वह बाल्यकाटवशतः अस्फुट अथोत्‌ जो समन्ञमं अवं, एसे शब्द उचारण करते थे ॥४४॥ अनन्तर शि्योके सहित कषिभरष्ठने अकस्मात्‌ पक्षिशावकों का शब्द सुनकर आश्वयैयुक्तचिक्तसे घटा उठाया ओर माता पिता तथा पखहीन पक्षीके वचको देखा ४५ मुनिभरे् भगवान्‌ शमीकमुनिने श्तटमं यथावत स्थित पक्षीके वचांको देखकर अनुगत बाहर्णोसे आश्वयैयुक्तं होकर कहा ४९ हे बाह्णो ! पूवक टमं देवताओसि ताडितहोकर जब देत्योडी सेना इधर उधर

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| भागने टमी, उस समय द्विजे शुक्राचायेजीने उससे सत्यही कहा था ॥४७॥ ५“ हे देत्यगण ! तुम मत भागे निवृत्तहोओ ! इसभकार कातर होकर किस स्यि | जतिहो ! शोय ओर यश त्यागकर कहां जाओगे ! तुम क्या कभी नीं मरोगे ! ४८ पू मे विधाताने जब तुमको उन्न किया है, तो जबतक उनकी इच्छा |न हो, तबतकं युद्ध करो ना भागो, किसी प्रकार तुम नरीं मरोगे ॥४९॥ देखो, कोई अपने घर रहनेपरभी मरताहे को$ भागकर भी मरता है रोई पान भोजन |करते करते ही भराण त्याग करता है ५० ओर कोई कामगामी सुस्थ शरीरते पियमान रहकरभी ` दिव्यविटास वासना भोगताहुभा शब्ञादिसे अविद | होकर भी कालके कराठगारे गिरता ५१ ओर कों तपस्यामें निर तथा कोई योगाभ्यास करते यमाटयमे गया किन्तु अमर कोद भी नहीं हुभा॥

| सम्ययुक्तद्विनाग्रयेणशुकरेणोरनसास्वयम्‌ पठायनपरदष्देत्यतन्यंसुरादितम्‌ ४८॥ नगन्तव्यनिवतंकस्माद्रनतकातरः ॥(उसस्यनञोय्ययङसी | करगतानमरिष्यथ ४९ नरयतोयु्यतोवापितावद्धवतिंजीषितम्‌ यावद्धातापनसपर्वनयावन्भनतेप्तितम्‌ ५० एकेमियन्तेस्वगृदेपलयन्तोऽप | जनाः युजन्तोऽनंतथेवापःपिबन्तोनिधरनगताः ५१ विरासिनस्तथेवायेकामयानानिरामयाः अविकषतांगाःशातशवमेतरानवरांगताः ५२ अन्येतपस्यभिरतानीतः्रततृपानुगेः योगाम्यिरता्ान्येनेवपापुरमृत्यताम्‌ ५३ शाम्बरायुरािपव्ंकुरिशपाणिना इंदयेऽभिहतस्तेनत || | थापि नमृतोसुरः ५९ तेनैवखलव्रेणतेनेवेन्ेणदानवाः प्रातिकाठेहतदत्यास्तत्षणामिधनंगताः ५५ विदितैवनसंतरासःकतंन्योविनि | वतेत ततेनिवृत्तास्तेदेत्यास्त्यक्तामरणनंभयम्‌ ५६ इतिशुकवचःसत्यंकृतमेमिःखगोत्तमेः येयुदधेऽपिनसंपाप्ताःपशत्वमतिमातुषे ५७॥

| ५२ # पिरे वजपाणि इन्द्रे शम्बरके भति वज चाया ओर उस पजसे उसकी छाती फट जनिप्रभी उस अघुरका भाण नष्ट नहीं हृभा ५३ किन्तु | उसी इन्द्रे फिर उसी वजसे सयं अदुरों के भरति आधात किया किन्तु उनका समय उपस्थित हभाथा; इसकारणं वह यमसदनके अतिथि हृए ५४॥ अत एव || | तुम यह सब जानकर भी किस खयि एसे जसित हेतो! मवृत् होओो निवृच हओ" दैत्यगण यह सुन मेका भय त्यागकर निवृ हृष्ये ५५ हे पििगण ।|‡ | इन पक्षिशावकेनि भी शुक्राचायेके यह सब वचन सत्य कियिथे देसो, इस अलोकिक युदध्मेशी इनका प्राण नरीं गया ५६ क्या आश्य |‡ है, देखो, कहां तो सव अंडाका गिरना, कहां उसी समय वषटेका गिरना, ओर कहां मंस पा ( चरबी ) ओर रक्तसे पृथ्वीका आच्छादन शर्म ||

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अत्यन्त अन्तर होनेषर भी एकटी कारम सबका संघटन हुआ ५७ यह कोन ! हे विपरगण ! बोध रोता है कि, यह सामान्य पक्षी नहीं दैवके अनुकूक हेनेषर महात्ाग्यता उपस्थित होती है ॥५८॥ यह कहकर महि शमीकने उनको फिर देखकर कहा-दे द्विजगण ! तुम निवृत्त होओे ओर पृक्षिशावकोँको लेकर किर आभमम जाओ ५९ जहां बिह्ी; चह कुक वा वाज पक्षीका भय उपस्थित हो, वहां दन पक्षियोको रश्खो भथवा॥६०॥ हे बाह्मण ! अधिक यतलकी क्या आवश्यकता है, क्योकि जीवमातरही अपने अपने कभेसे निहत ओर रक्षित हेते ई) यह पक्षीके ववे यहां किसे रक्षित हृए ! ६१ किन्त॒ तोभी सव कायोमेही मनुष्यको यतन करना चाहिये, नहीं तो पुरुषं करनेसे साधुभके निकट निन्दनीय होना पडता है ६२ मुनि

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काण्डानांपतनेविप्राःकवण्टापतनंसमम्‌ कचमांसवसारक्तेथुमेरास्तरणक्रिया ५८ केऽप्येतेषवैथाविप्रनतसापान्यपक्षिणः देवाुकूरतारेके पाभाग्यप्रदरिीनी ५९ ॥'एवसुक्तापतान्ी्ष्यपुनपेचनमत्रवीत्‌ निवतेताध्रमंयातगदीत्वापक्षिबारुकान्‌ ६० मानोराखुभेयंय्नेपामण्डनन न्मनाम्‌ श्येनतोनङखद्रापिस्याप्यतां तञ पक्षिणः ॥\ &१ द्विजाःकिवातियतेनमायेन्तकपेभिःस्वकेः रक्ष्यन्ेचासिराजीवाथथेतेपक्षिवारकाः ६२॥ तथापियत्नःकतेव्योनेरेःसवेधुकमेस ऊुषैमपुरुषकारंतुवाच्यतांयातिनोसताम्‌ ६३ इतिमुनिवस्चोदितास्ततस्तेशुनितनयाः परिगृ्यपक्षिण स्तान्‌ तर्विटपसमाधिताटिसंषेययुरथतापसरम्यमाश्चमंस्वम्‌ ६९ पचापिवन्यंमनसाभिकामितंप्रएयमूठंकुषमेफरंकुशान्‌ चकारचक्रायधरं द्रवेधसांुरेनद्रवेवस्वतनातवेदसाम्‌ ६५ अपांपतेशीष्पतिवित्तरक्षिणोःसभीरणस्यपितथाद्विजत्तमः धातुर्विधातुस्त्वथवेशवदेषिकाःशतिपरयक्ताषिवि धास्तुसत्कियाः && इतिमाकैण्डयपुराणेचट्कोत्पत्तिकथनंनामदवितीयोऽष्यायः

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बारे मरही यह वचन सुनः पक्षिशाव्कोको धरहण कर वृकषोकी शाखाअमिं गूजते हृए भोरेसि युक्त रमणीय अपे तपके आश्रमम भस्थान किया ६२ महिं शमीकने भी इच्छानुसार वनके फल मूल पुष्प ओर कुश अरहण करके बजा विष्णु महादेव इन्दर यम अकी पूना कौ ६४ वरणः वृहुरपति) कुबेर धाता ओर विधाताको पूजा ओर वेदोक्तं विधिके अनुसार उनके रमादि विविध कायं संपादन क्किये ६५ इति शरीमाकेण्डेयपुराण मुरादावादनिवासि कन्देयाराठमिशभ्रकतभाषाटीकायां चटकोत्पततिव्णेनं नाम द्वितीयोऽध्यायः

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भार्कण्डेयजी बोटे-हे विमेनदर ! मुनिभेष्ठ शमीककषि प्रतिदिन आहारदान जटदानः ओर रकषाद्रारा उनका पोषण करने ठगे ॥१ परियोके वे. मुनिके | दारा इसप्रकार पाठित होकर एक मासके भीतर ही आकाशमागेम जने गे मुनिकुमार कोतृहटाक्रान्त हो उनको देखने रगे तियक्‌ योनिम उतपन्न | हुए महात्मा पश्चा नद, नदी, सागर ओर नगरादि द्वारा परिपूणं रथके पहियेकीसमान पृथ्वीको देख अत्यन्त थकजानेपर फिर आश्रमम लोट आये मृनिके | करमशः उनको ज्ञान उत्पन्न हभ ३॥ ४॥ एक समय महर्षि शमीक शिष्योंके ऊपर कपा करके धमोपदेश कर रहे थ, उसी समय पक्िर्योनि दक्षिणा | करके उनके चरणोमिं अभिवादन अथीत्‌ भरणाम किया ओर कहा-५हेमुने ! आपने हमको पोर मृतयुके कषस दाया है, आपहीनि हमको वासस्था|

मारकण्डयउवाच॥भटन्यहनिषिपरनसतेषांयनिसत्तमः॥ चकाराहारपयसातथायु्याचपोषणम्‌ ॥१॥ मासमात्रेणनम्पुस्तेभानोः स्यन्दनक्मनि॥ कौतूहल | साठकटेक्षमुनिकुमारकैः॥२॥दष्ठामहीसनगरासाम्भोनिधिषरिद्रम्‌॥ स्थचक्रप्माणतिपुनराश्रममागताः॥२॥ भमञ्ातरातमानोमहात्मानोवियोनिनाः॥ , ज्ञानंचप्रकटीभूतं तञतेषांप्रभावतः षेःरिष्यायुकम्पाथैवदतोधमेनिश्वयम्‌ ृत्वापरदकषिणंसवैषरणावभ्यवादयन्‌ 4 उुश्वमरणादवोरन्मो | क्षिताःस्मस्त्वयायुने ॥आवासमभक्ष्यपयसां वनोदातापितागुरः & गभेस्थानांमृतामातापित्ानेवापिपाठिताः त्वयानोजीवितंदत्तरिवोयेनरक्षिताः ` ॥9॥ क्षिताकक्षततेनास्तवकृमीणामिवशुष्यताम्‌॥ गनपंटसमुत्पाटयकृतवानदुःखरेचनम्‌ ८॥ करथदयुखसःलस्थानरशष्यम्यरंकद्‌ कदाभूममं | प्राप्तान््श्येवृक्षंतरगताम्‌ ॥९॥ कंदामसदनाकान्तिःपासुनानारामेष्यति एषांपक्षानिठेोत्थेनमत्समीपविचारिणाम्‌ ॥१०॥ इतिषिन्तयतातातभवतप्रतिषा खिताः तेसांपरतंप्रबृद्धाःस्मःप्रबुद्धाःकसषामकिम्‌ ११

आहार ओर दियाहे इस कारण आपह हमारे पिता ओर गुरु ६॥ गभेवासके समयही हमारी माता मरगई पिताने हमारा पाटन नहीं किया, आपन

ही हमारी वाल्यअवस्थासे आजतक रक्षा की है दे अक्षततेना ! हम भिस समय पृथ्वीम पदए ठमिके समान सूखते थे, उत्त काठ आपनेही|

हाथीका घंटा उगकर हमारा दुःख दुर्‌ किया था॥८॥५यह्‌ दुबेर पक्षियाके बचे किसभकारसे वदधित ह. कव आकाशे उदं पृथ्वीम वक्षके उपर जार्यै ओर कब एकं |

क्षसे दुसरे वक्षपर जारे ॥९॥ ओर “कब भेर समीप विचरण करे करते उ्दगेकब इनके प॑खसंचाटनकी वायुसे उदीहुदे रजदवारा मेरी खाभाषिके कन्ति वि.

नष्ट होगी" १० हे तात ! इसपकार विचार कर आपने हमारा पाटन किया दै, अव हम बे हूए हँ ओर प्रकी उपासे ज्ञान प्राया है, इत समय हम। 2

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क्या करं ! सो आज्ञा कीजिये \ .११ शिष्ये मह शमाकं उनकायह्‌ संस्कारयक्ं परस्फुट वचन सुनकर अपने पृ भृगक सहित अत्यन्त अकम | १२ ओर्‌ अत्यन्त कालक, कारण पुरकित देकर परियेपि कदन रग १३ कि, सत्य करो, तुम पते स्वन किसभकार उचारण | ये ओर किसके शापसे दमदार वाक्य आर रूपको रस विक्रिया उत्पन्न दहे ! १४ पषयेनि कहा-दे मुनिस्‌ ! पृषकाम विपुलान्‌ नामकं णक || सनि वे ुहूप ओर तपुर नामक उनके हए ॥१५॥ हम्‌ सव उन महातमनितेनधिय सुपे है. विनय, आचार, भि ओर सपरत अवहम्बन करक | हम सदाय उन निकट रहते १६ पहं जव सयतवितसे तपस्या करते तव हम उनकी अभिलापानुसार क्तु दिते १७ समिध, पष |

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इत्यषिषेचनंतेाध॒तवासस्कारवत्स्फुटम्‌ रिष्येःपरिवृत सः सदपुेणमृ्धिणा १२ कोतृहलपरोभूत्वरोमाचपटवृतः उवाच | तत्तता्तपवृतेःकारणाग्रः १३॥ कस्य रापादियंपराप्तावद्धि्िकियापरा रूपस्यवचसशचेवतन्ेवमिहादेथ १४ पक्षिणञचः विषुरुस्वानितिख्यातः प्रागासान्सानसत्तपः तस्यपुद्र्यजजञसुकृपस्तुबुरुस्तथा १५॥ सुकृपस्यवयंपुाश्चत्वारसेयतात्मनः तस्यपिन याचारभ्तिनव्रा-सदवारं 9६ तप्चरणरक्तस्यङास्यमानेन्दियस्यच यथाभिमतमस्माभिस्तदातस्योपपादितम्‌ ॥१७॥ सपितपुष्पादिकंसमैयते वाभ्यवृहारकम्‌ एतत्चाथवसततिस्यास्माकंचकानन्‌ ॥१८॥ आजनगाममरावप्मौभयपक्षोनगनवितः आताम्रनःघ्स्तात्पापक्षीयूतासिरेथरः॥१९॥ | सत्यरचक्षमाचारमतावादारमानसम्‌ जिज्ञसुस्तमृषिभरष्ठमस्मच्छापभवायच २० पक्युवाच दविन्दरमाकषथाविषटपखातमिहादैषि | भक्षणाथामदाभागगातिभेवममातुखा २१ विन्ध्यस्यशिखरतिष्ठम्पथिपतेस्तिनवे पतितोऽस्मिमदाभागश्वस्नेनातिरा २२॥

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ओर संपृणे भोजनङी सामी लति. वह इसपरकार हमारे संग़॒ वनम वासकरतेथे १८ सुरेश्वर इन्द्र एकं दिन बदा देह वृद पक्षोका रूप धारणकर्‌ |

हमारे निकट आये उनके पस सव टदे हुए) नेत्र ताम्रवणं ओर आत्मा शिथिल होरहाथा ३९ वह सत्य, शोच, क्षमा ओर आचारसंप् उदारवित निमे

कोदं विषय पृखने ठगेःओर जानाजाता है कि, हमारे भति पितृशाप होनेकेकारणही आयेये॥ २०॥पक्षी बोला-हे द्विजेन ! ससे अत्यन्त आतुर हृभाह | मरी ~ ° ^= ~ _ १९ 9 > 9 = =$ | * / मेरी रक्षा करो हेमहापाग ! मं नितान्त भक्षणार्थी हू आपह मेरी गतिश्वरूपहं २१॥ह महाभाग ! मं विन्ध्यपषेतके शिखरचृडामं वास कराह अकस्मात्‌ पक्षिराज |

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गरुढुके पेखोकी उदी वायुद्रारा इस स्थानम गिरती मृरछित होगया २२ इस अवस्थाम एकं सपाह कार बीतेपर आं दिन मुङ्ञको चेतन्यता पराप हुई | |॥ २३ कुठ देरके पीठे सुस्थहुभा आर क्षुधासे आतुर होकर आपकी शारणमें आया हे महाभाग ! भेरा हृदय भूससे अत्यन्त कातर होकर मुञ्चको निरानन्द | करे गलता है २४ हे विप्रं ! मेरी रक्षा करकी चेष्टा कीनिये ओर जिससे मेरी शरुधा नष्ट हो एेसा आहार दीजिये २५ उन महिने पक्षीसे इसमकार ! सनकर पक्षीरूपी इन्द्रसे कहा हे खग ! भ्राणधारणके उपयोगी तुमको किसआदारकी अभिलाषा हे ! तुम्हारे आहारके उपयुक्तं किस द्रव्यको लाञ ॥२६ हे द्विजोत्तम ! यह कहकर फिर म॒निने कहा कि, कहिये क्या भोजन करोगे ! मतुम्हारे निमित्त किस आहारको छाऊं ! तव उसने उत्तर दिया किः मनुप्यका मासि |

| सोहमोहसमाविषटोभूमोसप्तादमस्मरतिः स्थितस्तवाष्टमेनाहाचेतनां प्राप्तवानहम्‌ २२ प्राप्तचेताश्ुधाविष्टोभवेतंरारणंगतः भ्ष्या्थीमिगत नंदो

दूयमानेनचेतसा २४ तत्कुरुष्वामरुमतेमत्राणायाचलां मतिम्‌ प्रयच्छभश््यविप्रषेभाणयातरक्षममम २५॥ यणएवमुक्तःपरोवाचतमिन्रपकषिरूपि णम्‌ प्राणसन्धारणाथौयद्‌स्येभक््यतवेप्सितम्‌ २६॥ इत्युक्तापुनरप्येनमप्रच्छन्सद्विजोत्तमः आहारःकस्तवाथोयउपकर्प्योभवेन्मया सचाहनर

मसिनतरतिरभवतिमेपरा २७॥ ऋषिरुवाच केमारतेव्यतिक्रांतमतीतंयोवनंचते वथपःपरिणामस्तवतेतनूनमंडज ॥२८॥ यस्मित्नरा्णासवेषामरेषे च्छानिवत्तेते सकस्माद्रद्भवेऽपिसुनृशेसात्मकोभवान्‌ २९॥ कमादुषस्यपिरितंकवयश्चरमतव सवेथादुष्भावानाप्थमोनोपपयते २३०

अथवाकिमयेतेनपोकते नास्तिप्रयोजनम्‌ प्रतिश्त्यसददियमितिनोभावितंमनः ३१॥ इत्युक्तातंसपपदरस्तथेतिकृतनिश्वयः सीत्रमस्मान्समाहूय गुणतोऽनुप्ररास्यच ३२॥

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लनिसे मेरी परम तृपि होगी २७ कषि बोटे-हे अण्डज ! तुम्हारी कौमारभवस्था वीतकर योवन अवस्था हू, वह भी अव बीतकर वृद्धावस्था आई है।२८॥ जिसमें मनुप्यकी भी समस्त वासना शेष होती है, किन्तु तोभी तुम वृद्धहोकरइतने नृशंसात्मक क्यां हो २९॥ देखो नरमांसभक्षण ओर वदधावस्था इन दोनेमिं बडा अन्तर ै, तथापि दष परुषोकी दुराशा निवृत्त नरी होती २० ॥अथवा मुञचकोही इन सब बाति आलोचना करेकी क्या आवश्यकता है! "अंगीकार करिया हआ विय ,;अवश्य देना चाहिये" यही मनम विचारना उचित है ३१ हे दजन ! उस पकषीसे पह कहकर तनिश्वय मूनिने

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|शीत्र हमक बुराया ओर गृणते प्र ३२ हमारे विनयनप्र ओर भक्तियुक्तो हाथ जडकर संडे हेनेपर पिताने श्भ्थ विकतसे अति ||‡ |: 4 निषु यह कचन करे ॥२२॥ तुम सर विः. ग्‌ बाह्मण ओर सन्तानोत्पादनदरारामेरी समान कणसे मक्त हुए हो तुम भिसपकार भेरी सन्तान हो एेरेही तुम्ही | || त्र उतन्न हुए ३४॥ में तुम्हारा पिताहं तुम यदि मुञ्को गुर ओर पृञ्य विचारतेहो तो अकपटचिन्तसे भेरे वचन भ्रतिषाठन करो ॥२५॥ तब हमने सादर कहा हे पिता! आप जो आज्ञा करेगे उसको हमरे दारा संपादित हुआ समङ्षिये २६॥ ऋपि बोरे बालको ! यह पश प्रस प्यासते यकत होकर भेरी शरणम

[आया है इससमय तुम्हारा मांस भोजन करनेसे क्षण काठके लिये इसकी तृषि २७॥ओर रक्ते पीने प्यास निवृत्त होगी इस कारण तुम शीघ्र यही करो तव,

| उवाचकषुग्धहद्योमुनि्ाक्यंुनिषुरम्‌ विनयावनतान्सवोन्भक्तियुकतान्कृतांनीन्‌ ३२॥ कृतात्मानोद्रिनश्रष्ठकणेयुक्तामयासह नातेगरष्मपत्यवोयुयं | | ममयथाद्रिनाः॥३४॥ युरुःूज्योयदिमतोभवतांपरमः पिता ततःङुरुतमेवाक्यनिव्ैटीतिनचेतपा २५ तद्रायसमकारुच्रो्तमस्माभिरहतैः | यद्रकष्यतिभवांस्तद्ेकृतमेवावधायैताम्‌ ३६ ऋषिरुवाच ममेषरारणंपापोषिदगत्तपानितः युषमन्ासेयेनासयकषणंतापिेतवे ॥२७॥ तष्णा | ्षयश्चरक्तेनतथारींविधीयताम्‌ ततेवयेपव्यथिताःप्रकम्पोदरूतसाप्वसाः क्कषटमितिपरच्यनतत्कमेतिचाष्वन्‌ २८॥ क्परररस्यहेतदिईं | स्वकंबुधः विनाश्येदवातयेदराययाह्यात्मातथाहुतः ३९॥ पितदेवमलप्याणांयानयुक्तानिरणानिवे तान्यपाकुस्तेपुोनर्रीखदःसुतः ॥४०॥ तस्मात्नेतत्करिष्यामोनोचीणयतपुरातनेः जीवन्भद्राण्यवपरोतिजीवनपुण्यंकरोतिच ४१ मृतस्यदेहनाश्श्पमोदयुपरतिस्तथा भातमनेसवेतोरक्ष्य ,

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हमने अत्यन्त व्यथितहदय ओर भयते कपत कहा-यह अतीष कष्टायककारय हमसे नहीं होसकेगा ॥३८॥. कोन पण्डितनन होकर प्राया देह पृष करके | लिये अपना जीवन नष्ट वा निहत करेगा ? भ्योकि आत्माका सन्तानकौ समानयत करना चाहिये ३९ पितृक्रण देककरण ओं म॒नुष्यकण जो शाम का गया है, संतान उसकोही छाती है परन्तु देह नहीं सकता ४० इसलिये हमत यह्‌ काथ नहीं ही परकेगा- व्याक ८५. भी किसीन पता आचरण नहीं किया ह, जीवन हनेसे ही प्रयति हती है ओर पण्यादिकाभचरण कर सकता दै॥४१॥ मृत पृरुषकेदेहका विनाश होता है ओर धमांचारादि|

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| नष्ट होते ह, इसी कारण धर्मके जाननेवारे पण्डितां कहा है कि, आत्माकी सप्रकार से सदा रक्षा करे ४२॥ मुनिवर हमारे यह वचन सुनते ही कोधे नने खगे || ओर कोधसे खाल ने्रकर मानों हमको दग्धकरनेके स्यि फिर बोरे ॥४२॥ रे दुपैत्तगण मने इसके निकट प्रतिज्ञाकी रै ओर तुमने मेरा कचन प्रतिपाठन नहीं कियाद | कारण भरे शापसे दग्ध होकर तिग्‌ योनिम जागे ४४ हे दविजसत्तम !उन्हं ने हमसे यह कहकर शा्ञानुसार अपनी उनदोहिक अत्येटि क्रिया सम्पादन | करके उस पक्षीसे कटा ४५ रे खग ! तुम विश्वस्त चित्तसे मुञ्ञको भक्षण करो भने अपने देहको तुम्हारा आहार किया ४६ हे पतगभेष्ठ ! बाज्ञण जवतक | अपना सत्य प्रतिपान करता है, तबंतकही उसको बाह्मण कहाजाता है ४७॥सत्यप्रतिपालनमें जिसप्रकार पुण्य संचय होता है, दक्षिणा युक्त य्ञानुष्ठाने वा

|

इत्थशुत्वावचोऽस्माकंुनिःकोधादिविज्वटन्‌ प्रोवाचपुनरप्यस्मातरिदेहत्निवलोचनेः ४२ प्रतिज्ञातंवचोमद्ययस्मात्रेतत्कारष्यथ तस्मान्मच्छप निदेग्धास्तियेग्योनोप्रयास्यथ ४४ एवमुक्ततदासोस्मांस्तंविहंगममत्रवीत्‌ अन्त्येिमात्मनःकृत्वाराघ्त्थोष्वेदोहिकिम्‌ ४५॥ भक्षयस्वसुविश्र ग्धोमामद्विनसत्तम आहारीकृतमेतत्तेमयदेदमिदात्मनः ॥४६॥ एतावदेवविप्रस्यन्राह्मणत्वैपचक्ष्यते यावत्पतगजात्यग्रयस्वसत्यपरिपाटनम्‌ ॥४७॥ नयज्ञेदेक्षिणावद्धिस्तत्पुण्यंपराप्यतेमहत्‌ कमंणान्येनवाविपेयत्सत्यपारिपारनात्‌॥४८॥ इत्युषेवैचनंशुत्वासोऽन्तर्िस्मयनिभेरः प्रत्युवाचयुनिशाक्रःपक्षि रूपधरस्तदा ॥४९॥ योगमास्थाय किपिन्रत्यन्येद॑स्वंकरेवरम्‌ जीवनंतुंहिविपेन्द्रमभक्षामिकदाचन ॥५०॥ तस्यतद्रचनेश्ुत्वायोगयुक्तोऽभवन्युनिः तेतस्यनिश्वयंज्ञात्वारक्रोऽध्यारस्वदेदभृत्‌ ५१ भोभोकिपिनदरयुष्यस्वबुद्धयाबोष्यंबुधात्मक निज्ञाप्ाथमयाभयतेभपराधःकतोऽनष ५२॥

अन्य किसी कर्मदयारा वेसा पुण्य भ्रात नहीं होता ४८ उन पक्षीरपी इन्द्र कषिभष्ठके यह वचन सुन, मनम अत्यन्त विस्मितः हो उनसे कहा ४९ हे विभेन्द्र ! परिटे योगावटम्बन करके अपना कटेवर त्याग कीनिये, किर आपकामांस भक्षण करूंगा, क्योंकि भने जीवित भ्राणीको कभी भोजन नहीं किया॥५०॥ | पक्षीका यह्‌ वचन सुनकर मुनिराजने योगावलम्बन किया तब इन्द्रने भी उनकायह्‌ संकल्प निश्वय जान अपना देह धारण करफे कहा ॥५१॥ हे पण्ठिताग्रगण्य िपरष ! जाननेयोग्य विषयको बुद्धिपरवकं बोध कीजिये हे अनष ! ने आपको भटी भांति जाननेके वियेही आपके निकट यह अपराध किया है ५२

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|॥ ५३ अवमे आपको रेन्रज्ञान उत्पन्न होगा ओर तपस्याचरणम कभी विघ्नहीं होगा ५४ देवराज इन््रके इसप्रकार कहकर चठे जानिपर हमने पिताफे चरणोमे प्रणाम करके कोधयुक्त महामुनिसे कहा ५५॥ हे पिता ! हे महामते! हमने मरके भयते अत्यन्त भीत ओर जीवनभियताके वशीशत होकर एेसा कहाह |अत एव हमके क्षमा कीेये ५६ यह देह त्वक्‌ अस्थि ओर मांस राद ची ओर शोणितसे परिष र, सम $ अनुराग नरी करना चाहिय |किन्तु हे तात ! उसी दहमे हमारा अनुराग बदा है ५७ हे महाभाग ! सुनार कि, प्रशत्रस्प काम फरोधादिदिषदाराही सव ोक मोदित हेते

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ततक्षमस्वामरमतकाचेच्छाक्रियतांतव। पाटनात्सत्यवाक्यस्य्रीतिमैपरमातयि॥ ५२ अदप्रभतितेज्ञनमनादुभविष्यति॥ तपस्यथतथापर्मनेकिमोभ | विष्यति॥ «8 इत्युक्ातुगतेर्केपिताकोपसमन्बितः प्रणम्यिरसास्माभिरिदयुक्तोमहामुनि॥५९॥ िभ्यतांमरणात्ताततवमस्माकमहामत। न्तम सिदीनानांजीवितप्रियतादिनः ॥५९॥ त्वगस्थिमांससंवतिप्यशोगितप्पति॥ कतव्यानरतियंबतभास्माकमियंरतिः ॥५७॥ श्रयताचमहाभागयथारोकोवि मुद्यति।कामक्रोधादिभिदेपिरवराःप्रलरिभिः॥५८॥ परज्ञप्राकारसंयुक्तमस्थिस्थूणंपरंमहत्‌ चममिततिमहधमांपशोणितछ्पनम्‌ ॥५९॥ नवद्रारमहा यासंसवेतःस्ायुवेष्ितम्‌ त्रप्थपुरुषस्तसचेतनावानवस्थितः ६० मंबिणोतस्यदुद्धि-्मन्धेवविरोधिनौ यतेतेवरनाशञायतावुभावितरेतरम्‌ | ६१ ॥नृपम्यतस्यचत्वारोनाञमिच्छंतिविद्रिषः \ कामःकराधस्तथाटोभेोमेह्चान्यस्तथारिषुः ६२ यदातुसनृपस्तानिद्रारण्ात्यतिष्ठत सदा सुस्थवटब्धवमिरातंकन्धजायते ६२

|॥ ५८ फिा ! प्जञारूपीदीवारोमे वेष्टित यह देहरप नगरी वतमान रहतीहे „अर्थि जिसका समौ जो चमरी शीतके दारा अत्यन्त रुद, ओर मांस- शाणितरूप कौचडमे टिपरी ५९ नक्ते उसको चारों ओरते थेरे इए रहै भोर निके बहुत बडे नो दरवान उत परीमे चैतन्यूषी पुरुष राज्य करत्‌।

॥६०॥ राजाके दो मंज हैः मन ओर बुधि वह भी परस्मर विरोधी है इसलिये १रसर परस्पर को विनाश करके लिये सदा यतवान्‌ है ६१ काम,

(@ | ध, ठभ, ओर मोह नामक राजाके चार शत्रुहः वह सदा राजाके विनाशकरने का चष्ट कृते ६२ वह राजा जिततस्मय पूर्वोक्त नवद्वार रुद्ध करके

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९॥

निमेटचित ! मुके क्षमा करो, आपकी कया अभिलाषा हे ! आज्ञा करो, सत्यवाक्य प्रतिपान करनेके कारण आपे भरति मेरी अत्यन्त प्रीति उतत हं है

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| अवस्थान करता है, उसी समय वह अत्यन्त सुस्थ गिरातंक होता है ६३ ओर प्रमवान्‌ होते। है, इसकारण उस समय उसको शब अिभूत नरी कर सक | ते ६४ वह जव सब द्वार खोकर अवस्थान करता है, उसी समयम अनुराग नामक शबर नेत्रादि सब दवारो पर आक्रमण करता है ६५ यह श्र वै | व्यापी ओर अत्यन्त प्रबल है यह अनुरागरूषी श्र जब नेचादि द्वारम घुसत रै, उसी समय टोभ मोह ओर धूप तीनो शत्र उपतके पीछे पीडि दोडते | ॥६६॥ वह रागरूपी इन्द्रिय नामक सव दरवाजेकि दवारा पुरी मे पुसकर मनओर बद्धे संगसेयुक्त हेनेकी अभिलाषा करता है ॥६७॥ यह दुदधंषे अनुराग इन्दि | यगण मन ओर सब द्रारोको वशीूतकरके पर्ञरूप भराकार (ुद्धिरपपरकोदा) प्रकरा है॥६८॥ बुद्धि भी मनको उस्तका आश्रय ग्रहण करता देखकर तत्का नष्ट

| नातातुरागोभवतिराभिनोभिभूयते यदातुसवद्राराणिविवृतानिषपुंचति रागोनामतदाराञनेादिद्रारमृच्छति ६4 सर्वव्यापीमहायामः

हितस्तयपोरव्गेज्ड्ितस्तथा ६९ रिपुमिरुग्धविवरःसनपोनाशमृच्छति एवंरागस्तथामोहोरोभःकरोधस्तथवच ७० प्रवततिदुरात्मा नोमष्यस्मृतिनाज्ञकाः रागात्करोधःप्रभवतिक्रोधालछोभोऽभिनायते ७१ छोभाद्रवतिषम्मोदःसम्मोहातस्मृतिषिभरमः स्मृतिभंशाहद्िनाशोदु द्िनारात्मणद्यति ७२॥ एवप्रण्टुद्धीनांरागरोभानुवतिनाम्‌ जीवितेचसरोभानापरसादंङुरुपत्तम ॥७२॥ योऽथंशपोभगवतादततःसनभवेत्तथा नतामसीगतिकषटात्रनेसमुनिसत्तम ७९ ऋषिरुवाच यन्मयोर्तेनतम्मिथ्याभविष्यतिकदाचन नमेवानृतंप्राहयावदयेतिपु्रकाः ७९॥

होती हे, अतएव अमात्यहीन ओर भरना वर्स त्यागा हभ ६९ वह राजा शगुभेसि आकान्त छिद्र होकर कष्ट होता रै काम्‌, कोष, लोप ओर मोरहप |॥ ७० दुरात्मागण पुरीम वास करते रै, दसीटियि मनुष्य स्मरणशक्तिविहीन होता हे, अनुरागसे कोथ होता दै, कोधे रोभ उतयन्न होता है ७१ लोपे ।मोहकी उत्पत्ति ओर मोहसे स्मृतिका नाश रोता है स्मृतिनाशंसे बुद्धिनाश ओर बुद्धि नाशसे ही मृत्यु होती है ७२ हे तात ! राग ओर लोके वशीगृत होनेसे ही हमारी भी वुद्धि भश हु दै, इसी कारण जीवनके प्रति इतना लोभ है, अत एव हे सत्तम ! प्रसन्न हूनिये ७३ आपने जो शाप दिया है, यह शाप |जिससे फलित हो, हमारे ऊपर प्रसन्न होकर वही कीजिये हे ुनिमन्तम ! तो यह्‌ कष्टदायके तामसी गति हमको भरा वही होगी ७४ कषि बोठे-“ हे

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पचेद्रारभरवेरानः तस्यायुमागेिरातितदैषोररिपुजयम्‌ &द प्विदियाथसवेततद्रररिदधियपजकैः रागः परृटेषमायातिमनपाचरतेर 2७ इन्दियाणिमन्येववशकृत्वादुरासदः द्राणिचवरोकृत्वापराकारनाशयत्यथ &८ मनस्तस्या्रितट्कडुदिनेरयतिततक्षणात्‌ अमात्य

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| बालको ने जो करा वह कशी भिया नहीं हागा, अचतक करी मरे मुखे मिथ्या वचन नहीं निकला है ५५ वृधा पोरूषको धिङ्ार हम विचारा [वही इस विषयमं बली है, देवनदी मु्को इसभरकारके अचिन्तित अकार्य करो भ्न किया हे ७६ तुमने प्रणाम करके पूञ्चको परस्न किया [क | | कारण तियग योनि जन्म लेकर भी परम ज्ञानवान्‌ होगे ७७ भेरे प्रसादे ुमजञानद्रारा सत्‌ मार्ग अवरोकनपैक पाको करके अदिभवितते| धानसिदधि लाभ करसकोगे ? ७८ दे भगवन! पर्काटम देवके दीप्त होकर हमारे पिताने इसमकार शाप दिवा था किर कृढ कार बीत | पर यह पक्षियानि भरारण करी ७९ हे द्विजवर ! युद्धस्थलमं हमारा जन्म हभ, आपने ठाकर प्रतिपालन किया! अव हम आकिता |

| देवमाजेपरमन्येधिकपोरुषमनथंकम्‌ अकायैकारितोयेनवलादहमचिन्तितम्‌ ७६ यस्माचयुप्माभरदप्रिपतयपरसादितः ८५१ | | परज्ञानमवाप्स्यथ ७७ ज्ञानद्रितमागोधानिभरूतेशकर्मषाः मत््रसादादन्दगधापरापिषमवाप्त्थ ७८ एरान | वव्ात्पुर ततःकाञेनमहतायोन्यन्तरमुपागताः ७९ जातश्चरणमप्यवभवतापसार्ताः वयमित्थद्विनशरष्वगत्समुपायता, | नास्त्यसाविटसंसर्योनदिषेनयाध्यते सवेपामेवजन्तूनदेवाधीनेदियेषितम्‌ ८१ माकण्डयउवाच इतितषावचःशृतवरामाकामगनानधनः | प्रत्युवाचमहाभागःसमीपस्थायिनेोद्रिनान्‌ ८२ पूैमेवमयप्रो्तभवतांसतनिधाषिद्म्‌ सामान्यपकषिणोनैतकेऽप्यतद्वित्ताः ०५८. | पचत्वमतिमानपे॥ ८३ ततःप्रीतिमतातेनतेऽयज्ञातामहात्मना जभ्पुःशिखरिणत्रिटविष्यरुमर्तायुतम्‌ ८४ यद्यह्तात्तए | क्षिणः तपःस्वाध्यायनिरताःसमाधोकरृतनिःधयाः ८५ ~. | | जनिको समथ होगयेष्े ८० हे मुनिशादृल ' इस संसारम रेसा कोई नरी है,जो रजके वर्म होकर रहता हो सब प्राणिर्याकी ५० | वाधीन ८१ माणडेयजी बोरे-कि पशषियेकि इसमकारवचन सुनकर दे्यादिपडगणरतपन मुनिभेदे महाभाग भगवानु शमीक ५५८५७ | से कहा ८२ हे विभरगण ! ममे पठे तुमसे यही कहाथा कि यहं सामान्य पक्षा अलोकिक समरे भी जव काठकवलम कवित नहीं ए, तब # सिम | | सामान्य पक्षी नहीं है बोध होता है, कोई बाह्णकृमार ८३ अनन्तर वह पशा परतन हए महाता शमीक मुनिकी आक्ञनु्ार = 0 | विन्ध्य परथते चगये ॥८४॥ वे रमपकषी तवतक उस वतम निवास करते रहे तप ओर वेदपाठमं निरत हाकर समाधिर्मे ही अपना निश्वय टद किया ८५॥

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गमीकजीकी यह आज्ञा पाय, वह्‌ पक्षीरूप मुनिकुमार उनसे समस्त क्रियाका उपदेश ले, उस प्ैतके शिखरपर जहां अतिपवित्र निल जल है, आनन्दपुवंक

वासं करने ठगे ८६ इति श्रीमाकंण्डेयपुराणे मुरादाबादनिवासि-कन्देयाठाटमिश्रतभाषादीकायां ` दिनध्यभाषिनोम तृतीयोऽध्यायः कंण्डेयजी बेले-दे जेमिने ! वह ज्ञानवान्‌ सब पक्षी इस भकार द्रोणके पुत्र हृए्थे वह विन्ध्य पवतम वास करते हं तुम उनकी उपासना करके | सब पृच्छ महर्षि जेमिनि माकंण्डेयमुनिके यह वचन सुनकर जहां वह धरम पक्षी वास करतेथे; उसी विन्ध्य पयैतम गये ॥२॥ जब वह पवतके निकट पुषे | तो पक्षयेकि वेदपाटका शब्द उनके कानमे सुनाई आया, उस. समय कह अत्यन्त अचभेम होकर चिन्ता कर ठगे “क्या आशर्यं है ¡ बाह्मणगण पृ

| इति युनिवररग्थसक्ियास्तेसुनितनयाविदगत्वमभ्युपेताः। गिरिवरगहनेऽतिपुण्यतोयेयतमनसोनिवसन्तिषिन््यपृषठे ॥८६॥ इतिश्रीमाकेण्डेयपुराणेविन्ध्यप्र पिकथननामततीयोऽध्यायः ३॥ मकेण्डेयउवाच एवंतद्रोणतनयाःपक्षिणोज्ञानिनोऽभवन्‌ वसन्तिह्यचखेविन्धयेतानुपास्वचपच्छच इत्युषेवेचनं शुत्वामाकैण्डयस्यनेमिनिः नगामविन्ध्यरिखरंयतरतेधमेपक्षिणः॥२।॥तत्रगासत्रभूतश्दुश्रावपठताध्वनिम्‌ शुत्वाचविस्मयाविष्टिन्तयामा | सनेमिनिः॥ २३॥ स्थानसोष्टवसम्पत्ननितश्वासमविश्रमम्‌ विस्पष्टमपदोषंचपटयतेदविजसत्तमेः ॥४॥ वियोनिमपिसंपराप्तानेतान्पुनिकुमारकान्‌ चिमे | तदहेमन्येननहातिशरस्वती ^ बन्धुवगेस्तथामि्यवेष्ठमपरगृरे त्यक्तागच्छतितत्समैनजदातिषरस्वती ॥६॥ इतिविन्तयत्नेवविवेशगिरिकन्दरम्‌

प्रविर्यचददशसोशेखपगताद्धिनान्‌ ॥७॥ पठतस्तान्समाटोक्युसदोषम्िभितान्‌ सोऽथरोकेनरप॑णपवानेवाभ्यभाषत ॥८॥ स्वस्त्य्तषोदिन ्रष्ठजेमिरनिमांनिबोधत॥ग्यासरिष्यमनुप्राप्तभवतंदशेनोत्स॒कम्‌॥९॥न्ुनेखलुकतैव्योयत्पितातीवमन्युना शप्ताः खगत्वमापत्राःसवैथादिषटमेवतत्‌॥ ०॥ रूप अवलम्बन करके भी स्थानकी भरे्ठतासे श्वास जीतकर स्पष्टता ओर निर्दोषता सहित अविभराम वेदपाठ कसे हँ इन बालकेकि तिर्यग्योनिं गिरने प्र भी जो स्रस्वतीने इनको नरी त्यागा यह ओर भी अचंभेकी बात है इससे जानाजाता कि, बेभुवगेःमित्र वा घरकी समस्त अष्ट वस्तु सभी ठोड कर चटीनाती हँ किन्तु केवल मात्र सरस्वती कभी नही छोडती ॥६ मुनि जेमिनिने इसपभकार चिन्ता करते करते पतक कन्दरा मँ भवेश किया भर देखा किः वह विप्रगण पृत्थरकी ददटरानपर विराजमान हँ संपृणं दोषोे रहित उन सब पकषि्योको वेदपाठ करता देखकर शोक ओर हके वशीप़त हो सके | कहा हे द्विजभरे्ठगण ! तुम्हारा मंगल हो मे व्यासशिष्य जेमिनि तुम्हरे दशंनकी टाटसरासे उत्कण्ठित हकर इस्‌ स्थानम आयाहू अत्यन्त कृद

ककुकककरक करक कक. ०.य ककव क.कककरकक करक करक लकककश कच

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|पिताके शापसे पिरप अवलम्बन करना पडा ह, ठेसा जानकर शोक करना, क्योकि सव प्रारब्धकाही फल हे १०॥ देखो, धरनमानादि वि | |विषयसपत् भरेष् वेमे किसी महात्माका जन्म होता है ओर फिर उप द्रव्यके नष्ट होनेषर वही पीठेकि दवारा सानवनाफो पराप होता है ११ कोई दान | | करके भी भीख मागता, कोई वध करके निहत होता है, को दृसरेको निहत करा कर अन्यके द्वारा मरता है, तपस्याका क्षयहेन से इषी भकारकी घटना हती रह [है ॥१२॥ भने अनेकवार एेसी घटना देखी है, इसप्रकार भावाभाव परम्परा द्रारा सब जगत्‌ निरन्तर व्याकुल हभ है १३ इसपकार मनम विचारकर तम्‌

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| शोक करना क्योकि शोक वा हष इत्यादित अभिभूत होनाही तपस्याका फल है १४ अनन्तर उन सव धर्मपक्षयेनि पयाय इत्यादिसे महामुनि

स्फीतदरव्येकुरेकेचिलाताःकिटमनस्विनः दरव्यनारोद्विजन्द्रास्तेरबरेणससान्त्विताः 9१ दत्वायाचन्तिपुरुषाहत्वाव्यन्तिचापरे पातयि त्वाचपास्यन्तेतएवतपसःक्षयात्‌ १२॥ एतदृष्ट॑सवहशोषिपरीतंतथामया भावाभावसपुच्छेदेरनसरंम्याङ्कटंनगत्‌ १३॥ इतिचिन्त्यमनसानरोकं कृतमरेथ ज्ञानस्यफरमेतावच्छोकदर्परधृष्यता १४॥ ततस्तेजेमिनिसवपायाध्योभ्यामपुजयन्‌ अनामरयचपप्रच्छुः प्रणिपत्यमहामुनिम्‌ १५ अथोचुःखगमाःसर्वेव्यासरिष्यंतपोनिषिम्‌ सुखोपविष्टं विधरातिपक्षानिटहतङृमम्‌ १६॥ पक्षिणउचुः अ्यनःसफटंजन्मजीवितंचयुजीवि तम्‌ यत्पर्यामःसन्यंतवपादाम्बदरयम्‌ ॥१७॥ पितृकोपामिरुद्तोयोनोदेदेषुवतेते सोयशान्तिगतेविपरयुष्मदरोनवारिणा ॥१८॥ कञ्चितेकुरां ्रहमत्राथ्रमेमृगपक्षषु वृकषष्वथरतागुल्मत्वक्सारतृणनातिषु ॥१९॥ अथवानेतदुक्तहिसम्यगस्माभिराहतेः भवतापंगमोयेषांतेषामकुरारंकुतः॥२०॥ परसादेचकुरुष्वायत्रूल्यागमनकारणम्‌ देवानामिवतसगभवतोऽभ्युदयोमहान्‌ केनास्मद्वाग्यगुरुणाआनीतोदष्टिगोचरम्‌ २१॥

।की पूजा करी भर प्रणाम करके कुशल पटी १५ किर जव व्यासशिष्य तपोनिधि जैमिनि उनके प॑सोंकी वायुसे थकावर दूरकरके पुखपूक बैठे, तब वे पक्षी उनसे कहने रगे १६ पक्षी बेलि-देमहाभाग ! अव हमारा जन्म सफल ओर जीवन सार्थक हुभा, क्योकि आपके देवताभंसि वदित दोनों चरणकम लोका दशन किया १७ पितृदेवकी कोपामि अयन्त प्रबल होकर जो हमारे दहमं मान रहती है सो हे कि ! वह अब आपके दशेनरूपी जले शान्त | होगई १८ हे बहन्‌ ! तुम्हारे आश्रमके मृग पक्षीगण वृक्षलता ओर त्क्सार तृणादि पन्त सबकी कुशल तो है १९ वा हमारा यह पूछनाही अनु चित है, क्योकि जो आपके निकट वास करते है उनको किर अगल कां ॥२०॥ अब आप किस निमित्त अयि अनुम्हपूषेकं उसतको रकश कीमिये

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| आपका आना ओर देवताओंका संसगे दोनों समान है, सुतरां नीं जाना जाता कि, किस भाग्यके बरसे भापका दीन हुआ २१ जैमिनि बोठे-हे द्विज | शादूल ! मेँ जिस कारण रेवा नर्दीके जलक्णेसि सिचित हुभा इस ॒विध्यपवेतकी मनोहर कन्दरा आया हूं, सो सुनो महाभारत शास्म कद सन्देहकि होनेसे मे पूनेके ख्य २२॥ भ्रगुकुरधुरेधर महात्मा माकण्डेयमुनिंके निकट गया था ओर महाभारतके प्रति सन्देह उनसे पुछ थे २३॥ उन्हनि कहा किं, वि नध्याचलमें महात्मा द्रोणके पुत्र वास करते तुम वहां जाकर उनसे पूञो, वी तुमसे इन प्रश्नंका उत्तर विस्तार सहित णन करगे” २४ भँ उनकेही षचनानुसार

इस महापवेतमं आयाहूं अव तुम मेरे उन सव प्रश्नोको भीरभौति सुनकर यथावत्‌ व्याख्या करदो २५ प्षिर्योनि ` कहा-यदि वक्तव्य होगा तो कर्हगे, आप

| जैमिनिरुवाच श्रयतादविजशादखःकारणंयेनकन्द्रम्‌ विन्ध्यस्येहागतोरम्थं रावारिकणोक्षितम्‌ सन्देदानभारतेश्चाघ्ेतान्पष्टगतवानहम्‌ २२ माकंण्डयंमहात्मानंपूैभृगडटोद्रहम्‌ तमहप्टवान्प्राप्यसन्देहान्भारतंप्रति २३ संचयष्टोमयाप्राहपन्िविन्धयेमहाचरे द्रोणपुप्रामहात्मानस्ते | वक्ष्यन्त्यथविस्तरम्‌ २४॥ तद्राक्यचेदितश्चेममागतोऽईमदागिरि्‌॥ तच्छरणुष्वमशेषेणश्रुत्व्याष्यातुमदेथ २५ पक्षिणलुः॥ | विषयेसतिवक्ष्यामोनिर्विशाङ्ः-यृणुष्वतत्‌ कथंतत्नवदिष्यामोयदस्मदरदधिगोचरम्‌ २६ चतुष्यैपिदिदेषुधमेशघेषुचैवदि समस्तेषुतथाद्धेषुया नयद्ेदसंमितम्‌ २७॥ एतेषुगोचरोऽस्माकंुदेवह्मणसत्तम प्रतिज्ञातुसमवोदुंतथापिनदिशक्रुमः २८ तस्माद्रदस्वविश्रभ्यसन्दिग्धंयद्धिभारे॥ व््यामस्तवधमेज्ञनचेन्मोहोभकिष्यति २९ जैमिनिरषाच सन्दिग्धानीहवस्तूनिभारतपरतियानिमे शृणुष्वममलस्तानिशुत्वा्याल्यातुम | देथ ३० कस्मान्मावुषतापरपिनिशणोऽपिजनादैनः वाुदेवोऽविखधारःवैकारणकारणम्‌ ३१ कस्माचपाण्डुपुत्राणमेकासा द्रुपदात्मजा पश्चानामदिषीकृष्णासमहानयरंशयः ३२॥ | | | नेःशंकं चित्तसे किये, जो हमारे बुद्धिगोचर होगा वह क्यों नह कगे! २६ चार वेद, समस्त धमेशाच्र वा सब वेदाङ्ग वा दसम जो कोई शाघ्लही क्यों ॥२७॥ हे द्विजसत्तम ! ययपि सबही हमारे बद्धिगोचर द, किन्तु तो भी हम परतिज्ञा नहीं करसकते २८ अत एवं महाभारतम आपको जो सन्देह रै नेःशंकं चिक्तसे आज्ञा कीजिये, यदि मोह नहो तोहे धर्मज्ञ! वह अवश्यही अपसि कटैगे २९ जेमिनि बेटे-है निमैचित्तविहंगमगण ! | उहाभारतके वीच जिन सव विषर्योमिं मुञ्चको सन्देह उत्यन्न हआ है, वह सुनो ओर उनकी व्याख्या

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दरो ३० मेरा सन्देह यरीहै कि, “नो कसि ति वि २९, £ क, @ = (९ [कष्य | कार्णोके कारण ओर समस्त वब्ह्माण्डके आधार वह्‌ जनार्दन वासुदेव निगैण कर भी छिस निमित मनुष्य हए थे ! ३१ एकदरुपदकी कन्या

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| > १९ शय | ) भ्रसंगमं ॥,९ ०६ दी कित भकार पाच पाण्डोकी महिषी है थी यर महान्‌ रेशय्‌ हे ॥३२॥ महावर हलायुध बलरामजी किंस प्रकार तीथयातरा पगम बहहत्याके पातकं

| देथ ३३ ओर महारथ युषिष्ठिरआदि पांच पाण्डव भिनके सहायकथे वह्‌ ्रोपदीके पुत्र अविवाहित अदस्थामे अनाथकी समान किसपरकार मेरे! ॥३४॥ ; ि | बातेमिं मञ्ञको [कर्‌ न्य क्र | १२॥||‡ || सब बातेमिं मुञ्षको अत्यन्त रह है! तुम इन महाभारत सबधी सन्देहाका यथा वत्‌ उत्तर कर मञ्चक रेताथं करो तो मे सुखपेही अपने आभमको चला

|जाञगा ३५ पक्षी बोटे-जो देवताओंके अधीश्वर सवेव्यापी ओर अत्यन्त भरभावशांरी है, जो पुरुषहषी अर्थात्‌ आत्मा, अप्रमेय; शाश्वत ओर अव्ययरूपी ॥३६॥ जो वासुदेव, संकर्षण, भयुप्र ओर अनिर रप “चतव्यहातमक रहै" जो जरिगुण अथ गिगण है जो उरुतम ओर गर जो दणय अमृत ३७ यज्ञाङ्ग ओर निखिल चराचरात्मक रै वेदान्तशाशचमं जिनके स्वरपका कु थोडासा वणेन किया है सब जगते जिनकी अपेक्षा अन्य सूक | मेषने्हमहत्यायावस्देवोमदाबरः तीथयात्ाप्सद्धेनकस्माचकेदरायुधः।॥३३॥ कथंचद्रोपदेयास्तेऽकृतदारामहारथाः॥ पण्डुनाथामहात्मानोवधमापुर

नाथवत्‌ ॥२०॥ एतत्समैकथ्यतमिसन्दि्धभारतेपरति कृतयो ऽंसखंयेनगनच्छेयेनिनमाभमम्‌ २५ पक्षिणउचुः नमस्कृत्यसुरेशायविष्णेभभ विष्णवे पुरुषायापमेयायराईवतायाव्ययायच ॥३६॥ चतुप्यूदात्मनेतस्मत्रिगुणायाुणायच वरिष्ठायगरिषठायदेरप्यायामूतायच्‌॥ २७॥ यस्मादणुतरना

| स्तियस्मात्रासिब्हत्तरम्‌ येनिशवमिरवयाप्तमनेनजगदादिना ॥२८॥ आविभवितिरोभावहष्ाृष्टमिरक्षणम्‌ वदन्तियत्मृ्टमिदतथेवान्तेचसंहतम्‌ ॥३९॥ ब्रह्मणचादिदेवायनमस्कृत्यषमाधिना ऋकसामान्युद्िरलवकरेयःपुनातिजगत्नयम्‌॥ ०॥ प्रणिपत्यतथेरानमेकबाणविनि्ितेः यस्याुरगणेयं

ज्ञाविटप्यन्तेनयन्विनाम्‌ ५१ प्रवष्यामोमतकृत्संव्यासस्याद्रतक्मणः येनभारतयुदिर्यधमायाःप्रकटीकृताः ४२

|तर ओर बहतर नही दै, यह्‌ संपूण विश्व जिनके द्वारा व्याप ह, जो अन भोर नगतके आदि ३८॥ इस संसारम आवि, तिरोभावः दशन) ओर अदन इत्यादि सबकाप जिनके दारा संपन्न हेते रै, तथा जो उनसे अतीत, नगतके सृष्टि क्तं ओर संहार क्तौ कहे जति रै ( उन भगवान्‌ विष्णुको नमस्कार दै |॥३९॥ जो आदिदेव ओर जो चारो मुखस सामादि चारों षेद उतयन्न करके वीरौ भुवनोको पवि करते है; उन बरहलाजीको ध्यानके सहित नमस्कार ||ह १० असुरगण जिनके एकं बाणसे परास्त होकर याश्ञिकगणोंफे यज्ञ ठोप करने अशक्य हेते उन देवादिदेव महादिवनीके चरणकमलोमे रणाम करके ४१ अत्यन्त अद्तकर्मकारी जो महषिं बाद्रायणिके दवारा महाभारतके मिस धमोदि भगट हभ रै, एह व्यासदेवके मतानुयायी -सव विषय सम्यक्‌

दष्टिमकरणमं ताख्यारि योगाच प्रसिद्ध अहृकारा्ते इञ चतुव्यहकी उतत्ति कोई कों इस म्यलमे चतुय शन्दमे जायत्‌ स्वम सुति ओर तरीयरप फटे .किन्त॒ उसमे अका विरीष्‌ तात्पयं नहीं रःता।

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ज्वालामालासे जिसके सब अंग अवरुद हैः जो योगियोंका एकमा आश्रयस्वरूप है ४५ जे! नित्यूपरिणी ओर जो मृतति तीनों गुणोको अतिक्रम

| जपोनाराइतिप्रोक्तासुनिभिस्तत्वदरीभिः अयनंतस्यताःपू्वैतेननारायणःस्मृतः ॥४२॥ सदेवोभगवान्स्ैवयाप्यनारायणोवियुः चतुदधसस्थितो्रह्मन्

यामेसंस्थानकारिणी ४९॥ चतुर्थीनटमच्यस्थारेतेपत्नगतलपग रजस्तस्यागुणःसगेसाकरोतिसदेवहि ५० यातृतीयाररमृतिःग्रजापाठन | तत्परा सातुधमेन्यवस्थानंकरोतिनियतंभुवि ५१॥

प्ति मस्तकके उपर पृथ्वी धारण करती है वह दुसरी मूर्ति हे उसका नाम शेष अथात्‌ संकर्षण | रम्बन करी दै ॥४८॥ भगवान्‌ नारायणकी जिस मूके दवारा सैपृणं कम सम्यक्‌ प्रकार साधित रेते ह, जितके द्रारा परनापाठनादि भव कार्य सम्पादित हेति | ओर जो मतिं धर्मसेस्थापनकारिणी अथव धरमेकी रक्षा करनेवाठी है उस सखगणमयी मूर्भिका नाम युपरत है॥ ४९ चौथी मृतति प्रननगश्यापर जलमे |शयन करके वास करती है वह रजोयुणात्मिका है उप्के वाराही सदा सृटिका्ं संपन्न होता हे! इस मूर्भिका नाम अनिरुदमूिं ५० हग्कि भरनापाठनकारिणी

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(भकार आपके प्रति भकाशित करेगे ४२ तत्वदशी मुनि कहते हँ नार शब्दका अथं जल हेः प्रथम वह जही एकमात्र जिनका “अयनः अर्थात्‌ | ` हि १३ = मर्वे बर था, इससे उनको नारायण कहते ४३ हे ब्रह्मन्‌ ! वही अनन्तटीलानिधान भगवान विभु नारायण सगुण ओर निगणात्मक द्विविध हपते चार तिमे [अवस्थित ४४ उनकी एक मूरति जो अनिरदश्य अथौत्‌ वाणीके अतीतंहे पण्डितगण जिसको शुङवणे कहे है, चंदसरयादि समस्त तेजपेजमय पदार्रूप।

[करके दुर ओर निकट स्थित रहती है, उतत भधानस्वरूप पहि मूर्तिका नाम वाशुदेव मूत्तिं है. इसमे ममताका ठेशमा्रभी नहीं है ४६ उसके रूप वणं | शुणोनिशेणस्तथा एकामूरतिरनिरददयाशुङ्धपिर्यन्तितांडुधाः ज्वाछामारोपरुदाङ्गीनिष्ठसायोगिनांपरा ४५ दूरस्थाचान्तकस्थाचक्ि |

यासागुणातिग्‌। बासुदेवाभिधानोऽपतोनिमेमत्वेनहर्यते ॥४६॥ रूपवणीदयस्तस्यानभावाः कृट्पनामयाः | अस्त्येवसासदाश्चद्धापुप्रतिरेकषपिणी।॥४७॥ | द्ितीयाप्रथिवीमू्ारोषाख्याथारयत्यधः तामसीसास्तमाख्यातातिये्तंसमुपाश्रिता ४८ तृतीयाकमेङुरतेपनापाठनतत्परा पृ््ोिक्तातसन्ञे |

इत्यादि सव भाव कत्पनात्मक यह मूर्तिं सयैकालट विराजमान, परमपवितर स्वशूप ओर सदा एकरूप ४७ .पाताठ दशमे बास करके जो | ह, दम मूतिने तामसी होनेमे तिर्ग्योनि अव

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>$ $ $ $ $ $ $ $ $ $$$ $$$ $ $$ $$$ $$ $ $$ $ ॐ:

जो तीसरी भूतिं रै, उसके द्वारादी सदा पृथ्वीम धमेसंस्थापन दता दै ॥५३ धमेका विनाश करनेवाले उद्धत असुरगण उसीकि द्वारा मरते है ओर उसके द्वाराही धर्म |रक्षापरायण साध ओर दैत्य रक्षित हेति ॥५२॥ हे नमिन ! निस जिस समय धम की हानि होकर अथक वदि होती है, यह मृतिं उसी समय धका उदार करके [निमित्त उत्पन्न होती हे ५२ इसी पूर्मं पूरवेकार्मे वरादरूप धारणपुषैक दतिकिं अग्रपागदरारा जल हटाकर केवल दाढोसे सहनमेरी प्रथ्वीको निक [समान निकालकर पर्ववत्‌ स्थिर किया है ५४ उसनेही नृसिंह मूर्ति धारण कर दिरण्यकशिपुको मारा है ओर उने विप्रचित्ति इत्यादि दानवोंका श्री कध [किया है ५५ उसके वामनादि अन्यान्य सब अवतारोंकी संख्या नहीं कर सकते, वह्‌ इस समय जो उतपन्न हुई है. वह माथुरमूिं श्रीरुष्ण हैँ ५६ | इसप्रकार उस सत्यगुणातमिका पूर्तिके अवतीणे होनेपर प्रयप्मृत्तिं उसकी रक्षा करने स्थित रहती है ५७ वह देवत्व, मनुष्य, वा तिय॑क्‌ योनि इत्यादि| प्रोदूतानसुराम्दन्तिधमेविच्छित्तिकारिणः पातिदेवान्सतशान्यान्धमेरक्षापरायणान्‌ ५२ यदायदारिषमंस्यग्ठानिभवतिनैमिने अभ्य

त्थानमधमेस्यतदात्मानंसृजत्यसो ॥५२॥ भूत्वापुरावरदेणतुण्डनापोनिरस्यच एकयाद्योत्वातानटिनीववघधरा ॥५४॥ कृत्वानृसिदहप॑चरहिरण्यक , | रिषुरेतः विप्रचित्तियुखाान्येदानवाविनिपातिताः ५५ वामनारदीस्तथेवान्यात्रसंष्यातुमिरोत्सरे अवतारा तस्येदमाधुरःसा्रतेतवयम्‌ ॥५६ | इतिसासा्िकीमूत्तिरवतारान्करोतिवे परयुभ्रेतिचसाख्यातारक्षाकमेण्यवस्थिता ॥५७॥ देवत््ेऽथमनुष्यत्वेतियेग्योनोचरसंस्थिता गृह्ततितत्स्वभावंचवा

| सुदेवेच्छयासदा ५८ इत्यतत्तेसमास्यातंकृतकृत्योऽपियतप्रभुः मानुषत्वेगतोविष्णुःशृणुष्वास्योत्तरेपुनः ॥५९॥ इतिमाकण्डेयपुराणेचतुव्यंडा | वतार्तुथऽष्यायः॥ £ परक्षिणउचुः॥ त्वघ्पुतरतेपुवत्रह्ममनिन्रस्यतेनसः ब्रहमदत्याभिभूतस्यपराहानिरनायत तद्धमपविवशाथ | साक्रतेजोऽपचारतः निस्तेनाश्ाभवच्छकरोधर्मेतेजसिनिगेते ॥२॥ ततःपुर्चहतेशुत्वात्वशाद्धःप्रनापतिः अवटुंच्यनमेकामिदंव्चनमत्रवीत्‌ ३॥ | | अवस्थित होकर वासुदेवकी इच्छानुसार तत्तत्स्वभाव अवलम्बन करती हे ॥५८॥ हमने यह आपके निकट सव वणेन किया अव भगवान्‌ विष्णुने कतक ।रोकर भी जिस कारणसे मनुप्य देह ग्रहण किया है, इसका उत्तर किर कहते ह, सुनो ५९ इति श्रीमाकंण्डेय पुराणे मुरादाबादनिवाति कन्हयालाटमिभ | ।रतभाषाटीकायां चतुव्यूहावतारश्वतुर्थोऽध्यायः पक्षी बोटे-है ब्रह्म ! त्वष्टा नामक भरजापतिका पुर तिशिरा अधोमुख होकर तपस्या |करताथा) इन्द्रे उसकी तपस्यासे उरकर उसका वध किया त्वष्टपत्र तिशिराके मरनेपर बहमहत्याजनित पापे सुरपतिके तेजकी हानि हृदं अधम्माचरणके | ।कारण पाकशासनके इस तेजने धर्मम भरवेश किया; तव धर्मम तेजके चटेजानेसे शचीपति ( इन्द्र ) निस्तेज होगे ॥२॥ तदनन्तर त्वष्टा भजापतिपृत्रके मरनेक |

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[वातौ सुनकर अत्यन्त कोधित हए ओर महाक्रोधपूवेक मस्तककी एक जटा तोड़कर कटने गे ॥३॥ '“इस समय देवताओंफे सहित स्वगे ओर पातालवासी सव

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पाणी भेरा तेज देखें ओर भरे पएत्रका मारनेवाखा वरहमवाती दुरबदधि इन्द्रभी मरा वी देखे जिसने स्वकरममे निरत मेरे पुत्रको मारा है" यह कहकर उन्हने

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संधि करनेके निमित्त मरीच्यादि सप्त कषियोंकां भजा सव प्राणियोकि हितमं रत प्रसन्नमन कषियेनि वृ्रासुर ओर इन्द्रम परस्पर परतिज्ञा करानेके पठ अद्यपद्यन्तुमेवीर्थनयोरोकाः सदेवताः सचपर्यतुदुवुद्त्रह्हापाकशचासनः % स्वकमाभिरतोयेनमत्सुतोिनेपतितः इत्युक्राको प्रक्ताक्षनटामय्मचिहावतम्‌ < ततोवृ् सथुत्तस्थाज्वारामाखमहासुरः महाकायोमदादोभित्राञ्चनचयप्रभ 2 इन्द्रशद्चसे यात्मात्वष्ठतेनोपवंहितः अहन्यहनिमोऽवद्रदिषुपातंमदावटः वधायचात्मनोटश्चव्र्रंरकोमहाुरम्‌ प्रषयामाससपर्षीन्सन्धिमिच्छनभया तुरः ॥८॥ सख्यंचङ्कस्ततस्तस्यगेणसमयांस्तथा ऋषयः प्रीतमनसः सभूतदितेरताः ॥९॥ समयत्थितियुदटष्ययदारक्रेणवातितः वृोहत्याभिभ तस्यतदावरमश्चीयैत १० तच्छकदेहविभरष्टवरुमारुतमाविशत्‌ स्वैव्यापिनमव्यक्तंवटस्येवाधिदेवतम्‌ ११ अहल्यांचयदाशक्रोगोतम॑षूपमा स्थितः धषयामासदकेन्द्रस्तदाषूपमहीयत ॥१२॥ अद्प्रत्यङ्कखवण्ययदतावमनारमम्‌ विहायदुष्टदवन्द्रनापत्यावगमत्ततः १२ धमेणतेजपात्य क्तबटदीनमरूपिणम्‌ ज्ञात्वासुरेरदेतेयास्तनयेवङ्कुरूयमम्‌॥ १४॥रज्ञाुदिक्तवीयाणांदेवन्द्रविजेगीषवः कुरेष्वतिबरदेत्याभजायन्तमहाघुने॥ १५ मित्रता स्थापन कराई महासुर वृत्र परतिज्ञा मयोदा उद्धेषन करके दन्द्रके द्वारा जिस समय मारा गया तव उसी ब्रहहत्याजनित पापसे अभिरत होनेके का इन्द्रका बल नष्ट होगया १० उस बलने इन्द्रके शरीरसे भरष्ट होकर बठके एकमात्र अधिदेवता अव्यक्तं सवेव्यापी वायुम प्रवेश किया ११ ओर इन्द्रने जब गोतमका रूप धारण करके अहल्यामे रमण किया, उपर समय भी उनका रपहीन हुआ था १२ उस्र समय शचीपतिके अत्यन्त मनोहर अंग ॒परत्यंगका समस्त ठावण्य दुरात्मा इन्द्रको छोडकर दोनों अश्िनीकुमारोमं चला गया १३ तव ॒सुरराजको धरम ओर तेजकेदयारा त्यागा जानकर तथा दुबे ओर रीनरूप विचार दयेन उनको जीतनेके छि उयम किया था १४ है महामुने ! अत्यन्त बटशाठी

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||स कारण उनंसे कहने कमी १७॥ देवताभ ! अत्यन्त बख्वान्‌ निन सब _असुरोको आपने मारा रै अव न्ने भुष्यलोकमे रानाभेकि घर

| ||जन्म छिया है १८ पह दैत्यगण अरस्य अक्षोदिणीपरिमित इसकारण भे उनके बाक्षसे अत्यन्त पीडित होकर नीचेको शुकी जातीह, बस, मिरे को

|शान्तिलाप हो, देवताओं ! आप वही कौभिये ` १९॥ पक्षी बोले !. हे मुने ! अनन्तर देवता सब भरजाका उपकार ओर पृथ्वीका भार हरण करनके ल्थि अन अपे तेनोक्नागदवारा स्वगे पृथ्वीम अवतीणं हुए २० तब सख्यं धरमन इन्द्र दहसे उत्पन्न उस तेजको कुन्तीके गरम डाला) उसेही महातेजा राजा युधि | कस्यवित्वथकारस्यधरणीभ्रपीडिता नगाममेरुरिखरंसदोयजदिषोकसाम्‌ १६॥ तेषासाकथयामासभूरिभावषीडिता तुनात्मजेतयोतयं ||| सेदकारणमात्मनः ॥१७॥ एतेभवद्भिरसुरानिहताःपथ॒रोजसः तेसवमानुषलोकेनातगदेषुभभृताम्‌ ॥१८॥ अकषरिण्योसिवहटस्तद्वारत्तंबनाम्यः॥ |२|| तथाङुरुष्वनिदश्ञायथाञातिभेवेनमम १९॥ पक्षिणउ्खुः तेजोभगिस्ततोदेषाभवतेरदिवोमहीम्‌ प्रनानायुपकारयैभूभारहरणायच | | ‡| २० यदिनदददनेतेजस्तन्युमोचस्वयंवषः फुन्त्यांजातोमरातेजास्ततोरजायुधिष्ठिरः २१ बटंभुमोचपवनस्ततोभीमोव्यनायत शक्रवी ||| योधेतश्ैवजज्ञेपाोँधरननयः २२॥ उत्पत्नोयमढोमादर्यारक्ररूपोमहायूती पथचधाभगवानित्थमवतीणेःरात्क्रत्‌ः २३ तस्योत्पत्रामराभा | ||| गापत्ीकृष्णाहुतारनात्‌ २९ रूकरस्यकस्यसापत्नीकृष्णानान्यस्यकस्यचित्‌ योगीश्वराःरारीराणिकुषैतिबहुखान्यपि २५ पचानामे | || कपत्रीत्वमित्येतत्कथितंतव श्रूयतांबर्देवोऽपियथायातःसरस्वतीम्‌ २६॥ इतिमाकेण्डेयपुराणे इन्द्रविकरिया नाम पेचमोऽष्यायः | < ||िर उत्पन्न हुए २१ देवभरेष्ठ पवने इन्दरका जो तेज कुन्तीके गमं निक्षप किया उरसतीसे भीमसेनका जन्म हभ ओर इसी ऊर्न्ीके गमे सुरराजके आं बलद्वारा पाथं धनेजयने जन्म छिया २२॥ ओर इन्द्रके ठायण्यधारी दोनों अशिनीकुमारोके दरार माद्रौके गरभमे महाथुतिसम्पन्न जो यमलकुमार उत्प

[ हए, वह भी उन्द्रके तेजसे युक्त सुतरां भगवान्‌ शतक्रतु ( इन्दर ) ही इन पांच अंशम अवतीणं हए २३॥ आर उनकी पत्नी शची ही यज्ञपाग याज्ञसेनीरूपे |

|अग्निसे उत्पन्न हृदं २४ तो स्थिर हआ कि, एकं द्रोपदी केवल इन्द्रकी ही पत्नी है, अन्य किसकी नहीं क्योकि महात्मा योगीश्वर पुरुष अपने |

|शरीरको अनेक भागम विभक्त कर सकते हँ २५ हे महाभाग ! जिसभरकार पांचजनोंकी एक पत्नी हूैथी. वह आपके निकट वणेन किया अव वल्देवजी |

|जिसभकार सरस्वतीमे गयेथे वह सुनो २६ इति श्रीमाकेण्डेयपुराणे मुरादावादनिवासिकन्हेयालालामिभ् सेतभाषारदीकायामिन्द्रविक्रिया नाम प॑चमोऽध्यायः ॥५॥ || |

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पक्षी बोले-हटधर बलरामजी, अ्जनके भरति श्रीकृष्णकी अत्यन्त पीति जन श्या करनेसे भटा होगा दसीक अनेक भाँतिते चिन्ता करनेटगे १॥ भे श्रीरुष्ण |को विना संगलिये अकेला दुर्योधनके निकट नहीं जाञगा ओर पाण्डवो का पश्च अवम्बनकर अपनेही जामाता तथा शिष्य पृथ्वीपति दर्याधनको कैसे | मारं इस कारण राजा दुर्योधन वा अजुन इन दोनोमिं किसीके निकटभी नहीं जाऊंगा अत एव नवतक कोरवपांण्डवोका वस हो, तबतक आपद। आप ती्ौमिं रमण करके आत्माको पवित्र करं ”॥ ¢ बलरामजी मनमें ठम प्रकार स्थिर कर हृषीकेशः पार्थं ओर दु्यौधनको आमंत्रणपर्वक अपनी सेनाे वेत हा द्रारकाको चटेगये शोरि बलराम्ीने हृष्ट पुष्ट मन्याम भरी द्वारावती नगरी जाकर तीर्थयात्राके करनेका विचार किया ओर तादीका रस

पक्षिणजचुः रामःपार्थपराप्रीतिज्ञात्वाकृष्णस्यराङ्गटी चिन्तयामास्बहुधाकिकृतेसुकृते भवेत्‌ ॥१॥ कृष्णेनहिषिनानाहेयास्येदुयोधनान्तिकम्‌ | पाण्डवान्वाप्षमाभित्यकथंदर्योधनंनृपम्‌ २॥ जामातरंतथारिष्यंपातयिष्येनरेडवरम्‌ तस्मात्नपथयास्यामिनापिदुर्योधनेनृपम्‌ ३॥ तीरथष्वापुवयि ष्यामितावदात्मानमात्मना कषूणांपाण्डवानांचयावदन्तायकल्पते।। %॥इत्यामेत्यह्षीकेशंपाथदुर्योधनावपि नगामद्रारकांशोरिःस्वसेन्यपरिषारितः॥५॥ | गत्वाद्रारवतीरामोदटष्टपुष्ठननाङखम्‌॥ शोगन्तव्येषुतीर्थषुपपोपानंहटायुधः & पीतपानोजगामाथरेवतोद्यानमृद्धिमत्‌॥ इस्तेग्रदीतवापषमदायितीमप्सरो | पमाम्‌ ॥७॥ स्रीकदम्बकमध्यस्थोययोमत्तःपदास्खलन्‌ दद्रोचवनंवीरोरमणीयमवत्तमम्‌ ८॥ सवेतैफरपुष्पाद्ंशाखामृगगणाकुटम्‌ पुष्येपदमव | नोपेतंसपस्वरमहावनम्‌ ९॥ सृण्वन्प्रीतिजननान्दहून्मदकला्जयुभान्‌ ओरम्यान्समधुराभ्डब्दान्गमुखेरितान्‌ १० सवैतुफरुभारठया | न्सवेतुकुसुमोज्ज्वलान्‌ अपद्यत्पादपीँस्तत्रविहगेरननादितान्‌ ११ |

प्या वह पान करनेके पीछे अप्सराकी समान सगव रेवतीका हाथ पकड़कर अनेकं प्रकारकी सम्पति पूणं रेवत उयानेमं गये ॥७॥ वह मयपानते मत्त होर

हे, इसकारण शियोसि परिवेष्टित होकर गमन करनेपर भी पग पगमे उनके पैर डिगमिगातेथे अनन्तर वीरवर बलरामजीने ` उस॒ अतिउत्तम रमणीय रेवतक (वनको देखा यह उदयान समस्तकतुके उत्पन्न फठ ओर पृष्पेसि शोभायमान तथा शाखामृगो ( वदरो ) से व्याप्तथा. वह अत्यन्त पवित ्‌ युक्त, छोटे मरोवर ओर महावनद्रारा भटीभांति विराजित था बङरामजी रवतीके सहित वनमे प्रवेश करके आहादजनक ॒शुकसुचकं गंभीर कानके (सुखदायक ओर मधुर नानाभकारके पक्षियोंका कृजन श्रवण करने रुगे १० यह भी देखा किः वहाके वृक्षोमिं सबं ऋतुभकि फट ठगरहे उनपर भरसन्

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दयसे पक्षो चहचहारहे ‡, ओर मरे वमे सब ऋतुभंके फल एूलरहे भोति भोतिके हरे पीरे लार फल ठटकरहे है ११ आम्‌, अमरा,

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तिद, बेल, अंजीर, अनार, नीबू १२॥ कटहर, बहर, मोचरस्‌, कदम, पारावत, कंकर, निन, अमल्वेत १३॥ भिलावा, त! तिरः हिगोट, करो, हड, बहेदा १४ इन वक्ोको यदुनन्दन बलरामजीने वहां देखा ओर इनके अतिरिक्त अशोक, पृ्नाग, केतकी, मोटसिरी १५ चमा, सप्तपणै, कनेर |माठती, पारिजात, कोबिदार, मन्दारः बेर १६ पाटकः देवदारु, सुखुभा, तारः तमा, पलाश, वंनुल आदि अच्छे अच्छे फलफुलवलि वृक्ते वह वन संयु क्त है १७ ओर इन वृक्षोपर चकोर, शातपत्र गराः शुक, सारेका, कोकिला, कोयल) हेर, जीवजीवकं १८ गरियपत्र ओर चातक इत्यादि

आप्ानाम्रातकान्भव्याननार्किखन्सतिनदुकान्‌ आविर्वकांस्तथाजीरान्दाडिमान्बीनपूरकान्‌ १२ पनसंकुचानमोचात्रीप ्रातिमनोरान्‌ पारावर्तोथकञ्ञखात्रलिनानम्ट्वेतसान्‌ १३॥ भद्ातकानामरुकस्तन्दुकां धमहाफठान्‌ दंगुदान्करमदीश्वहरीतकविभीतकान्‌ ॥१४॥ एतानन्यां `

| असतरन्ददशोयदुनन्दनः तथवारोकपुत्रागकेतकीबुलानथ ॥१५॥ चम्पकान्सप्तपणीश्कणिकारन्समारुतीन्‌ पारिजातान्कोविदारममनदारन्बदरं | स्तथा १६ पाटटान्पुष्पितात्म्यन्देषदार्दुमांस्तथा सारांस्तारांस्तमारां अकिश्कान्वंलरान्वराम्‌ १७॥ चकेरिःशातपतरेगरने

स्तथारकेः कोकिठेःकल्विकेशरारीतैजीवजीवकेः १८ प्रियपुतेधातकेशथतथान्ये्विविधेःखगेः भरेषरम्यंसमधुरंकून द्विशवाप्यपिषठितम्‌॥१९॥

| सरांपिचमनोज्ञानिभरसन्रसङिखनिच इखुदैःपुण्डरीकै्तथानीरोत्परेः शुभैः २० कोरः कमरे्ापिआयितानिसमंततः॥ कादम्बेशक्रवाके्तथे

वनरकुद्कुटेः॥ २१॥ कारण्डवैः पुवेरैसेःकूमेम॑द्रभिरेवच एभिश्वान्यश्चकीणोनिसमन्तानरचारिभिः ॥२२॥ करमेणेत्थंवनंरोरि्वीक्ष्यमाणोमनोरमम्‌ जनग।माव॒गतःस्चीमिर्तागरहमत्तमम्‌ ॥२३॥ सददशद्विजांस्ततरवेदवेदांगपारगान्‌ कोरीकान्भागेवांश्ेवभरदरानान्सगोतमान्‌ २४

भो तिभ तिके पक्षी भवणमनोहर मधुर शब्द करते हुए इन सब वृकषोकी शासाओंका आश्रय करके वास करर १९ रवतक उदान निमेल जले शोभायमान

| सब सरोवर शोभित है किःजिनके देखतेही चित्त प्रसन्न हो जायः कुमुदः पृण्डरीक, नीलकमल २० कटार ओर कमल इत्यादि कुषुमसमूहसे सब ओर शोभा यमान ओर कलहंस चक्रवाक तथा जलयूर्ावी २१ पव, हंस ओर कारण्डवादि जलचर पक्षी भर कृ्महरियठ त्यादि जठचर जीवो ग्याप्र होकर अपू

शोभा धारण करे २२ ्ियोकि सहित शोरि बलरामनी मसे उस पनको देखते देखते अतिउत्तम ठतागृहमे गये २२३. वापर भ्या देखा कि,

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वैदवेदाङ्गके ज्ञाता नाह्मण कितने कशिकवंशी कितनेरी प्गुवेशी कितनी भरद्राजवेशी ओर किंतनेदी गोतमवेशंके थे २४ ओर भी कितनेही वेशके जाह्णण पवित्र आर उत्तम मनुष्य बेठे कथा सुनरहे थे २५ कोई मृगछालापर कोई वच्चपर कोई कुशासनपर ओर कितेही पुरुष घास इत्यादिप्र विरजमान है. ओर उनके बी चमे पुराणवक्ता सूतजी वेठेहुए कल्याणमयी कथा बाच रह है २६ उस पुराणकी कथा, निमे देवता ओर कऋषियोका वर्णन था | इतनेहीमं उन बाह्र्णोकी दृष्टि बलरामजीपर प्रदी तो देखा कि, मदिराके मदसे नेत्र लाल हो रहे रै २७ जव समस्त मुनियोने उन्हं मदोन्मत्त देखा, तव सूतजीके अतिरिक्त ओंर सवने अत्यन्त शीघताके साथ उठकर बडे अद्रसतकार से बठरामनीका पूजन किया २८ अनन्तर अशेष दानवोकि मारनेवाटे

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| विविधेषुचसभूतान्वरोषुद्रिनसत्तमान्‌ कथाश्रवणवद्रोत्काटुपविष्ठान्महत्सुच २५ कृष्णामिनोत्तरीयेषुकुरोषच्रसीषुच सूतंचतेषांमध्यस्थं | कथयानकथाःजुभाः ॥२६॥ पोराणिकीःसर्फणामायानांचरिताश्रयाः दषरामंद्विजाः सर्ेमधुपानारुगे्षणम्‌ २७ मत्तोऽयमितिमन्वानाःसमुत् | स्थुस्त्वरन्विताः पूजयन्तोहरुपगमृतेतंसतवशनम्‌ ॥२८॥ ततःकोधसमाविष्टोहरीसूतंमहावरः निनधानविवृ्ताक्षः्षोभितारोषदानवः २९ | अध्यास्यतिपदतराह्तस्मिन्सूतनिपातिते निप्कान्तास्तेदविनाःस्वेवनात्ङृष्णाजिनाम्बराः ३० अवधूतैतथात्मानेमन्यमानोदलायुधः चिन्तया | माससुमहन्मयापापमिरदकृतम्‌ ॥२१॥ वरह्स्थानगतोध्येपयत्सूतोविनिपातितः तथारहीमद्िाःसवैमामवक्ष्यविनिगेताः ॥२२॥ श्गीरस्यचमेगन्धोरोहस्य वायुखावदः आन्मानंचावगच्छमित्रह्मघ्मिवङकत्सितम्‌ ३३ पिगमपैतथामह्यमतिगानमभीरिताम्‌ येराि्ेनधमहन्भयापापमिदंकृतम्‌ ३४ `

महाबल पराक्रमशाटी बलरामरजीन सूतके दवारा अपना तिरस्कार अथौत्‌ निराद्र हुभा विचार अत्यनतक्रोधसहित ढा लाल नेत्रकर्‌ सूतको निहत किया |॥ २९ पुराणतचन्ञ सूतके मरने ओर बरहमलोकर्मं गमन करनेपर ब्रह्मपद मृग छालारओप्र वेठेहुए सव ब्राहमणही उस बने चठेगये २० तब बलरामजी,

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|जिनकं देहपर मद ्जलक रहाथा पछताने आर चिन्ताकरने लगे कि कर्यो मने एते महापापका अनुष्ठान किया १” ३१ भने जिस सूतका वध किया, वह ्राहस्थानमं चलागयाः ओर अव सव व्रा्मण मृञचको देखकर चे जति दँ ३२ मेरे शरीरे लोरेके समान असुरता जनानेवाठी गंध बाहर निकरतीरै

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ओर आत्मा भी ऋहहत्याजनित पापमं करलूभित बोध होता. हे ३३ रे अमृ ! तुश्रको धिकार रै. मयको भङ्कार, अत्यन्त मानको धिकार, ओर

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| अत्यन्त ससक भी पिक्ार रै सर्यकि इन्त सवम्‌ असिक्त, सोकर मेन फेम महापाप अनु्ान किय है २४ इस ब्रहहत्याजनित महापापको | | करनेके लिय बारह वषेतक बरत. करा भीर्‌ दस्‌ पापका सवच पिष्यात्‌ करके अतिउत्म प्रायभिन कग अथवा में जो दस तीथयात्राका उथोग | ।कररहाह, इस यातार्मदी भतिलामां सरस्वतीम जाऊगा॥ २६६ मुने ! यह्‌ कहकर वह्‌ यदकुलभूरभर बटरामजी प्रतिटोम। सरस्वतीम चेगये भव द्री पाण्डरे | |पत्रौकी कथा कहते हः सुनो ७॥ इति भमाकेण्डयपुराम मृगादाबादनिवासि-ङन्हेयाटालमिशररृतक्षषारी कायां वल्देव्रहहत्याकथने नाम पषरोऽ्यायः ॥६॥ | भमोत्मा पक्षी बोले-है जंमिनि ! पे चैतागुगम हरिन्दर नामक एकं धरामि राजा ये, पह अत्यन्त कीर्िमार्‌ पथवीके पालक ओर सुम्दर पुरुष थे १॥ | उन्‌ चपव्र हरिन पृथ्वीशासनकालम मारा दवा व्याधि या अक्राल मृत्युका फट वा अधमं कृष्ट नहीं था उस समय उनकी प्रजा धन, बल | तत्षयाेचरिष्यामित्रतेदरादशवापिकम्‌ स्वकमस्यापनङुवेनप्रायिित्तमरंत्तमम्‌ ॥२५॥ अथयेयेप्मारन्पातीथयाचापयाधुन॥एतामेवप्रयास्यामिप्रतिरो मांपरस्वतीम्‌ ॥२६॥ अतोजगामरामोऽसोपतिरमांस्रस्वतीम्‌ ततःपरशृणुष्वेमेपाण्डवेयकथाश्रयम्‌ ॥२७॥ इति माकंण्डयपुराणेवल्देवब्रहमहत्याकथनं नामप्ठोऽभ्यायः ॥६॥ धमेपकषिणञचुः र्रिन्दरेतिरानषिरासीतरेतायुगेपुरा धमोतमाप्रथिवीपाटप्रोहटपत्कीतिरुत्तमः।॥१॥ नदुर्िक्षनचव्याधिनीका रमरणेतृणाम्‌ नाधमेरुचयःपोरास्तस्मिःशासतिपाथिवे ॥२॥ व॒भूवृनेतथोन्मत्ताधनवीयेतपोमदैः॥ नाजायन्तचियभेवकािदपराप्योवनाः ॥२॥ सकंदा चिन्प्राबाहुररण्येऽनुसरन्मृगम्‌ \ शुश्रावश्ब्दमसकरत्ायस्वेतिचयोपिताम्‌॥९॥ सविहायमगंरनामाभेषीरित्यभाषत मयिडासतिदुमेथाःकोऽयमन्यायवर | त्तिमान्‌ ॥। < ततकन्दितानुसारीचसवारम्भविवातकरृत्‌ एतस्मित्रन्तेरोदरेवित्द्समचिन्तयत्‌ ।॥ & विशवागिमोऽयमतुरंतपञस्थायवीयंवान्‌ ६। प्रागसिद्धाभवादीनाव्विाः साधयतित्रती साध्यमानाःक्षमामोनचित्तसंयमिनाऽघुना तापेभयत्तो कम्दन्तिकथंकायमिर्दमया ८॥

|वा धर्मक मदस उन्मत्त नीं होती थी ओर धियं भी विना यौवन प्रापहुए अकाठमं सन्तान उत्पन्न नह करती थीं एक समय वह महावा नमं शिकार < | टृदतेथे उसी समयम रक्षा करो, रक्षा करो दसभकार कितनी यि कैठ का शब्द वारंवार उनके कानमे सुना दिया तव राजा हरिन मृग | | याको छोडकर डरो मत उरो मत शब्द उचारण किया ओर कहा, भरे एृथ्वीशासन करनेफे समय कोन दुवुद्धि अम्यायवृततिक। आचरण करता हं ! ५॥ | यह कहकर उस्‌ रुदनकरते हुए व्यक्तिका अनुसरण करियाः उशी समयमे संपूण क्योका विनाश करनेवाला भयंकर विशषराज चिन्ता करने ठगा ६॥ इत वने | महातेजस्वी मृनिवर विश्वामितजी वताटम्बनपू्वक अतु तपस्या करर पृं जिनफो नहीं साध सके, उन्हीं भवादिं सव पियाअकि साधन करो ॥७॥ क्षमा

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मोन ओर विसय करे भुनिषर जिन विवाभके साधनेकी वेट करते है वह मूं तव वरियनियते अत्यन्त रहो " सा करो) रक्षा करो ` कहकर रुदन

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| करती है, अव स्या उपाय करू क्योकि यह विश्वामित्र ुनि अमित तेजी ओर्‌ भँ इनके निकट अत्यन्त दुबेलहू' तथा यह सब विया | भय॑से अत्यन्त रोती सुतरं बड़ीही कठिन वातौ उपस्थित है ° अथक अब मृञ्चको किसी वातकी चिन्ता करनी नहीं पदेगी, याकि यह राजा ह्रिन्द्र वारवार"मत डरो मतदरो "शब्द करताहुआ यहां आगया है अतएव इस राजाके शरीरम प्रवेश करकेही अपनी अभिलाषा साधून करताहू ०॥ उस भयंकर विध्रराजने मनम इसप्रकार चिन्ताकरके राजाके शरीरमे प्रवेश किया, तब राजाने ओर भी अधिक कोधितहोकर कहा ११ कन पपी मनुष्य पञ्चके अंचलर्मे अधिको

बाधता हे! जव कि,बरूप उष्ण तेजसे देदीप्यमान यह मे पृथ्वीपति हरिशवन्द्र यहां भपहुंवाहू १२ दरस समय कौन मृट धनुषे टे दिशाभको प्रकाश करने

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| कश्रेष्टोवयमस्यसुद्षेटाः कोरन्तयतस्तथाभीतादुष्पारप्रतिभातिमे ॥९ अथवायंनृपःप्राप्तेमाभेरितिषदन्मुहुः इममेवपरविदयादचुसाप | पिष्येययेप्सितम्‌ १०॥ इतिरसचिन्त्यरोदेणविघ्राजेनवेततः तेनाविष्ोतृपःकोपादिदंवचनमंत्रवीत्‌ ११॥ केऽयवघ्रातिवश्चान्तेपवकेपापकृत्नरः

बलोष्णतेजसादीपेमायेपल्यावुस्थिते १२ सेऽयमत्काथकाक्षेपविदीपितदिगन्तरेः ररविभित्रवागिदीवनिदरप्रवे्ष्यति १२॥ विरवामिवरस्तत कुदः धुत्वातत्रपतेवेचः कुद्धचर्षिदेेतसित्ेशिवा्षणेनताः १४ सचापिरनातंहष्विदवापिवंतपोनिषिम्‌ भीतःप्रविपतात्यथैसदसारूवत्थपणे वृत्‌ १५ सदुगात्मत्रितियदायनिस्तिष्ठेतिचात्रवीत्‌ ततःसराजाविनयात्मणिपत्याभ्यभाषत १६ भगवत्रेष्थम्मोषेनाप्रधोममप्रभो नक्र

| द्धमदेतिसुनेनिनधमेरतस्यमे १७॥ दातव्यंरक्षितव्यंचधमज्ञेनमरीक्षिता चापंचोम्ययोदव्यधमंशाघ्रानुप्ारतः १८॥ विश्वामित्रखाच { दातव्यंकस्यकेरक्ष्याकेयोंदव्यचतेनृप क्षिषमेतस्समाचक्ष्वयद्यधमेभयंतव १९

| वारे मेरे बाणा मे समस्त अगाम विद्ध होकर योगनिद्राको प्राप्त होगा ३३ अनन्तर मृनिवर्‌ विश्वामित्र राजा हरिशवद्रक अगिमानयुक्त यह्‌ वचन सुनकर अत्यन्त | कोषितहुएः कषिके कोधित होतेही पह सब विया नष्ट होगद १४ पह राजाहारेधन्दर तपोनिधि विश्वामित्रको सहसरा देखकर अत्यन्त भीत हौ पीपठके परेकी | समानं कापिनेटगे १५॥ जव मुनिवर विश्वामित्रे दुरात्मन्‌ उहर ' यह कहा, तब राजा रणामपृषेकं विनयसदित कहन ठंग १६ हे भगवन्‌ ! भेरा यही

धम है, हे भ्रभां ! मेरा अपराध ग्रहण कीजिये, हे मुनिवर ! भने अपने धमेको नहीं छोड़ा है इस कारण भ्रति क्रोभित हूनिये १७॥ यां कि परमत रानां का यही कायं हं वह्‌ धरममेशाचवानुसार कशी गन करं रक्षाकरे ओर कशी धनुष धारण करके युद्ध करे १८ विथाभित्रने कहा-है ` राजन्‌ ! यदि तुं

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ह: | | अधरमका भय है, तो शीघ्र कहो किसको दान करना चाहिये किसकी रक्षा करनी चादिये ! आर किसके संग युद्ध करना चाहिये } १९ | कहा / |हे तपोनिधान ! जो सदा अतानुषटानमे तत्पर ओर वाह्णशरे् हे, उसको दान करना चाहिये, रेहृए पृरुषकी रक्षा करनी चाहिये ओर शगरुओकि संग युद | करना उचित हे २० विश्वामित्र बोे हे राजन्‌ ! तुम यदि संपृणं राजधमे जानते हो, तो मे मुमु बाह्मण हू मुञ्चको अिलाषित दक्षिणा दो २१ पक्षी | बोठे-रे जेमिने ! राजा हरिशवन्द्रने यह्‌ वचन सुन हदयसे आहादित ओर प्रफुषठितहोकर अपना नया जन्म बिचारा भर मुनिसे कहा ॥२२॥ हे भगवन्‌ ! आप अपनी | अणिलाषा किय मं उप्र देनेको प्रस्तुत हूं आर मं प्रतिन्ना करता हू किं-जो कठिन बाती होभी, तोभी पृणं करूगा॥२३॥ हे बहमन ' आपको सुवणं, रल, पुतराब्ी

| इि्न्दरडवाच दृतत्यवपरमुख्यभ्योयेचान्येक्रावृत्तयः रकष्याभीताःसदायुद्ेकततवयंपरिपन्थिभिः २०॥ विश्वामितरउवाच यदि राजाभवान्छम्यग्राजधमपवेक्षते निवष्ठकामोिप्रोऽददीयतामिष्टदक्षिणा २१ पक्षिणउचुः॥ एतद्रानावचःशरुत्वाप्रहषेनान्तरात्मना | पुनजातमिवात्मानमनेपाहचकारिकम्‌ २२॥ उच्यताभिगवन्यत्तदातव्यमविराह्ितम्‌ तमित्येवतद्रिद्धियदयपिस्यात्सुदुरेभम्‌ २३ हिरण्यं | वासुवणवापुत् पु्ीकटेवरम्‌ प्राणारान्यंपुरेक्ष्मीयेदभिपरेतमात्मनः २४ विश्ापिजउवाय राजन्प्रतिगरदीतोऽयेयस्तेदत्तःप्रतिग्रहः | | प्रयच्छप्रथमताहाक्षणारनसूायकम्‌॥ २< राजोवाच ब्रह्मस्तापपिदास्यामिदक्षिणांभवतेद्यहम्‌ व्रियतांदिनशादेखयस्तवेष प्रतिग्रहः २६ विश्ामे्रखवाच सपागरांधरमेतांसभूमृद्रामपत्तनाम्‌ रज्यंचप्तकरटेवीररथारवगनसकुरम्‌ २७॥ केष्टगारं चकोरंचयचचान्यद्वियतेतव विनाभायीचपुतरंचशरीरंचतवानघ २८॥

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| शरीर राणः राज्य) गांव धून) जिसकी इच्छा हो सो सीनेये २४॥ विश्वामित्र बोे-हेराजन्‌ ! आप जो दं गेसम्ञ ठीनिये कि) मेने |किन्तु अब प्रथम्‌ राजसूय यज्ञकी दक्षिणाद्‌ ॥२५॥ राजाने कहा-हे बरह्मन ! यही आपको दुगा दिजशादूढ ! राजसूय यज्ञकी दक्षिणास्वरूप जो आपकी रुचि हो आज्ञा कीजिये २६ विश्वामित्र बोटे-हे पीर ! दस समस्त नगरः माम भोर पवत इत्यादिके सहित ससागरा पृथ्वीम रथ अश्व गजादिपकुट सष | राजत्व २७ कृष्टागार ( अन्तरग्रह ) राजकोश इत्यादि तुम्हारी जो सव व्सुहै हे पापरहित ! विनका्या पुत्र भर अपनी देहके २८

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| ओर र्मेशाख्के अनुसार जो तुम्हारा अनुगमन करे ई, अधिक ओर क्या कटू हे धर्मत! तुम्हारा जो कुछ रै, वह सब युहञको दो २९॥ पृशषी बोटे-मुनिवरको | शिकके यह वचन सुनकर उन राजा हरिश्चन्द्र भरसन्नचित्त ओर विकारररित युखसे हाथ जोडकर कहा “जो आज्ञा” यही होगा ३० विश्वामित्र बटे- | पृथ्वी बल ओर्‌ धन इत्यादि सवैस्वही जव मुञ्चको दिया है तो भेरे तपस्वी होकर राजत्व करनेसे हे राजप ! इष राज्यम कि्तका प्रुत रहेगा ३१ हरिथन्क्र | कहा हे बह्म! मेँ ने जिस समय आपको यह ससागरा पृथ्वी दी है उस समयसे आपी इसके स्वामी हए है अव किर परशुत्वकी बात श्यं पूछते हो \३२॥ विश्व || मित्र बोठे-३े राजन्‌ ! तुमने जब यह सस्तागरा सव पृथ्व मुजञको देदी है तो अवभेरा स्वामित्व होगया, तुम इष राज्यसे निकट नाभो॥ २३॥ श्रोणी अोत्‌ | | धर्मचस्वधमेज्ञयोयान्तमनुगच्छति बहुनावाकिमुेनसवैमेतत्पदीयताम्‌ २९॥ पक्षिण उचुः प्रहटेनैवमनसासोऽविकारमुलोनपः | तस्यपेवेचनंशत्वातथेत्याहकृताननलिः ३० विश्ामितरउवाच सर्ैस्वंयदिमेदत्तरज्ययुषीवंधनम्‌ प्रभुत्वंकस्यरानर्र्यस्थेतापे | मयि २१॥ हरिश्दरउवाच यस्मत्रपिमयाकासे्रहनदत्तावमुन्धरा तस्मि्रपिभवान्सवामीकिषुताधमदहीपतिः ३२ विशव | मिजउवाच यदिराजंस्तवयादत्ताममसवावसुन्धरा यजमेविषयेस्वाम्यतस्मात्रष्कान्तमरति ३२ श्रोणीपूादिसकटुकताषणंयम्‌ तरुवल्कङमानध्यसहपल्यासुतेनच २४॥ प्षिणञचुः तथेतिचो्तकृत्वाचराजागन्तु्चक्रमे स्वपल्यारोन्ययासार्थवारकेनात्मने | नच २५ ब्रनतःसततारद्धापन्थनप्राहतनरपम्‌ कयास्यकीत्यदन्त्वामेदक्षिणांजपूयिकीम्‌ ३६॥ ह्रिभन्धरवाच भगवान्ये

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| तततदत्तनिहतकण्टकम्‌ अवरशिष्टमिद्र्तरदे्रयंमम ३७॥ विशवामि्वाच तथापिखलुदातव्यात्वयामेयकञदक्षिणा वररोषतो ब्राह्मणानािन््यदत्तेप्रतिशचुतम्‌ २३८

[करिकूृषण इत्यादि नो गृहने म्हारी पीके ओर तुम्हार पुत्रके शरीरम वतमान पह सब भी त्याग वृ्षोकी छाट पहर परली ओर पुत्रके सहित भेरे राज्यते बाहरहो ॥३४॥ पक्षी बोले-दे। जमिने ! राजा हरिन मुनिवर विश्वामित्रे उन वचनोकोस्वीकार कर उम्हीके अनुसार सव कायं किया ओर अपनी स्वी ैव्या तथा शिश (वालक) के संग जानम वृत्त हए॥३५॥ उसी समयमे कपिभे् विश्वामित्र उनके जानेका मा रोककर उने कहा-हे नृप ! राज्य यत्नफी दक्षिणा धिना | कहां जति हा ! २६ हरिष्न्दर बोठे है भगवन्‌ ! यह समस्त निष्कण्टक राज्य आपको देदिया है, अब इन तीन जनेकि देहको छोडकर मेरे प्स भर श्याह २७ विश्वामि् बोठे-हे तृपवर ! यथपि तीन देहके अतिरिक्त तुम्हारे प्त ओर समति नहीं रै क्रिस तो भी मृञ्चको यङ्क दक्षिणा देनी दी

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सूय यज्ञकी दक्षिणा है ३९ ओर तुमहीने तो यह प्रतिज्ञा केरी हे कि, अंगीकार करके दानं आततायी (श्र) के संग यदध ओर आतत परुषकी सम्पर्‌ | | भकारसे रक्षा करनी चादिये ॥४० हरिशन्द्रन कहा-हे भगवन्‌ ! हे विपे! साधृता अवठम्बन करके भरसन्न हूभिये इप्त समय ओर कछ नहीं कन्ु| |काठक्रमसे अर्थात्‌ दिन वीतेपर आपको दंगा ४१ विभ्रामित्र बोठे हे मनुजाधिप ! मै कितने समयतक प्रतीक्षा करं ! शीघ्र कह ! नहीं तो भेरी | शापाभिमे दग्ध होगा ४२॥ हारेथनदर बोठे-हे विमर्ष ! अब ओर कुछ नहीं है इस कारण अज्ञा दीजिये, एक महीनिफे बीचर्ेही आपकी दक्षिणाका धन दे, | याक्तोषोरसूयत्राह्मणानाभवेनप तापदेवतुदातव्यादक्षिणाराजसमि री ३९ भरतिशत्यचदातव्ययोदध्यंचाततायिभिः रक्षितव्यास्तथाचात्ती | | स्त्वयेवप्राक्पतिश्चतम्‌ ४०॥ हरिशदरउवाच भगवन्साम्पतंनास्तिदास्येकारकरमेणते ्रपादुरुविप्रषसद्वावमचिन्त्यच ४१४ वि्ामिचउवाच दिथमाणोमयाकाठःपतीष्यस्तननाधिप शीनमाचक्षवसापागिर्यथातां पक्ष्यति ॥४२॥ ह्शनदउवाच मतिनतव | 4 दिपरषप्रदास्थेदक्षिणाधनम्‌ साम्धरतनास्तिमवित्तमनज्ञादातुमरैसि ४२ विशामिनरवाच गच्छगच्छनपशरेष्स्वधमेमवपारय रिक्ते | शक्वाभवतुमासन्तुपरिपन्थिनः ४४ पक्षिणउनुः अलुन्ञातःसगन्छेतिनगामवसुधाधिपः ,पद्वयामनचितागनतुमन्गच्छततभया ४५ तेसभायनृपशरष्ठनियोन्तंससुतंपुरात्‌ शृषापरचुकुुःपोराराज्ञशवेवाययायिनः ४६ दानाथकिंनहास्यस्म्नितयाततिप्रिषीडितान्‌ > तवेषम | | तत्परोरानन्पोरावमरदकृत्तथा ४७ नयास्मानपिरानपैयदिथमेमवेक्षमे सूतेतिष्ठरनेन्दभवतोमुखपड्कनम्‌ ४८ पिवामानेनभमरःकदादरह्या | महेपुनः यस्यप्रयातस्यपुरोयान्तिपष्ेवपाथिवाः ॥४९॥ | . देगा ३॥ विष्वामित्र बोटे-रे रपशरेष्ठःनाओ जाओ! स्वधर्मं पाटन करो ! तुम्हारा मंगलहो ओर ठमहारे वघ दूरहो॥ ४४ ॥पकषी बो-दे मुनिवर! ओंमिने ! तदनन्तर | वह राजर्षिभवर पृथ्वीपति हरिशवन्द्र मुनिवर विश्वामित्रे दवारा जानेमं अनुमोदित होकर चटेगये ओर उन पैरो पैरों जानेवाठेके पीठे रानी शेभ्या उनके पीछे पीठे ग्द ४५ इधर नगरवासी भरना पुत्र कट्रके सहित राजाको नगरमे बाहर होता देखकर उचस्वरसे रोदन करते करते उनके पीठे चटी ४६ “ह महा| राज ! आप ध्म तत्पर ओर सदा ्रनापाठनमे अनुग्रह करनेवाटे है पो सदा अनेक उपदरवेसि पीडित इस प्रनाको किस कारण छोदते हो ४७ हे राजष | यदि पर्मकी ओर देखते हो, तो हमकोी सगरेच्यि हे रानेन्दर ! कछ काठ ठहारैये हम एक दार आपके मुखकमटको ४८ भमरकी समान पान कर,

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%। 99 * संतुष्ट . [] पमी दिशिषकर बाहमणके निकट भरतिनना करी हृ पतु देनेसे समस्त नष होता है २८ हे राजन्‌ ! राजधूयय्ञमं निरते ब्राहमण तंत हो वही राज | || भ*द०

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फिर आपका दशेन कव होगा हाय ! जिनके गमनकालमं पृथ्वीके मव राजा आगे पीछ चल्तेथ ४९ उन्ही राजा हग्शिन्द्रकी भार्या एकं वाटक सन्तानको| [देकर उनकारी अनुगमन करती रे, जिनके गमनकालमे हा्थीके मस्तकपर चटकर समस्त पूत अगे भगे दोडतेये ॥५०॥ आज व्ही यह राजेन्द्र हारिन्‌ स्वयं पैदल गमन करते ५१॥ हा राजन ! शोभायमान दोनों भो सुन्द्र नातिका ओर शोभायमान त्वचा इत्यादे शोभित अपका यह्‌ मुख मामं भूरिसे धूस्रारेत होगा, तव क्यार शोचनीय अवस्था धारण करेगा अत एव हे महाराज ! मत जाओ, मतजाओ ! अपना धर्म पालन

|करो ५२ विशेष कर अनृशंसता ( दया ) ही क्षत्रियका भधान धर्म॑हेःक्यास्लीस्यापुत्र क्या धन अथवा क्या धान्य हमको किसीकी आवश्यकता नही

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| तस्यावुयातिभाययंरीत्वाबारकुतम्‌ यस्यभत्याःप्यातस्ययान्तयत्रङजरस्थिताः ॥५०॥ सएपपद्र्यारनेनद्ोहरिथन्ोयगच्छति हरानन्मुकुमारं

तेषुभरसुत्वचमुन्नसम्‌ ५१॥ पथिर्पासुपरिष्िषठसुखंकीटग्भविष्यति तिष्ठतिषटनृपग्रेष्टस्वधमेमनुपाटय ५२ आनृरोस्यंपरोधमेशक्षमियाणांव्ि | षतः॥ किद्रिःकिसुतेनीथधनेधौन्येरथापिवा ॥५३॥ सवैमेतत्परित्यज्यच्छयाभूतावयंतव हानाथदामहारानदास्वामिन्किनहासिनः ५४ य्रत्वतच दिवयतत्सुसेयचरवेभवान्‌ नगरेतद्वान्यजसस्वगोयजनोनूपः ॥५५॥ इतिपोरवचः ुत्वाराजाशोकपरिषुतः अतिष्टत्सतदामागतेषामेवानकम्पया ॥५६॥ | विश्वामित्रोऽपितंदद्वापाखाक्याकडकृतम्‌ रोषामपेविवृत्तक्षःसमागम्यवचोऽत्रवीत्‌ ५७ पिक्त्वदुष्टसमाचारमनृतंनिद्मभाषिणम्‌ ममराज्यं | | चदत्वायःपुनःप्राक्रष्टमिच्छति ५८ इत्युक्तःपरुषतेनगच्छामीतिसवेपथुः वरुक्रषेययोशी्रमाकषन्दयितकिरे ५९ |

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॥५३॥ हम सभी वयागकर आपके छायास्वरूप हगि हा ना ! हा महाराज ! हा भरो ! हमको मत छाडिये॥५४॥अप्‌ जहां जार्थगे हम वहीं जागे पकं

9 भि (9 वै [+> 9 <= | जस स्थानम सुखंहमाराभी यहीं वेषवहं भप जिस्‌ स्थानम्‌ रहग वही हमारा नगर हमरे राज। जहां रग. वही हमार सगे ॥५५॥ महाराज हारिथन्द रजाके |इसमरकार वचन सुनकर अत्यन्त शोकम दूबगये ओर उनकी दया देखकर कछ काल मार्गम खदेरहे॥ ५६॥ उसी समय मुनिवर विश्वामित्र गजाको प्रवासिर्ो

|वचनंसि आकुल होता देख कर एकं साथ अये ओर रोषाम्ते दोनां नेत्र विपूर्णित करके कटने ठगे ५७ अदटमनिन ! मिथ्यावादिन्‌ ! इष ! यह सम स्तराजत्व मुञ्चको देकर अथर फिर प्रहण करनेक इच्छा करता तुको धिकार ह्‌ ५८ राजा हरिशयनद्र दमपकार गाधितनयके परप वचन मुनक जाता |

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नभ कहते काप हए भेल चखनेखगे आर वेगसहित शीध्र दयिता शेष्या देवीका हाथ सचा ५९ कोमल अंगवाटी शेगभ्यदिवी अत्यनश्रमातुर हो ३८९ मन कर सकनक कारण्‌ राजा हारे शोव शीध चटनेके हिये हाथ परकडकर उसको संचतेथे किन्तुतो भी विश्वामित्र मनि दण्डेसेरानीकी पीठम आषति |

रणे ठय ६० महापति हारेन््रन देवीको इसमकार ताडितरोता देखकर अत्यन्त दुःखी हौ अन्य कोई उत्तर नदीं दिया, केवटमात् यही कहा कि, भगवन्‌ !

ताहू ॥६१॥ यह काय दसकर पाचिजन खकपाङ विश्वदेवा देवतां ने असन्त दया वशहोकर कहा इस पापात्मा विश्वामित्रने यज्ञकरनेवालोमं भे नर पृते हार्न्दका राज्यते भट किया; इक्क कोनसा लोक प्राप्त होगा अथवा हम किसे यज्ञं भ्द्धापूत मंत्रसंस्कत पवित्र सोमपान करके आनन्दित इगि

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कपतस्ताततोभायासु्मारभ्रमातराम्‌ सहसादण्डकाठेनताढ्यामासफोरिकः ६० तांतथाताितां्शच्ोमहीपतिः गच्छरीत्याुः सतिनन्यत्कचदुदाहरत्‌ &१ अथविश्वेतददेवापंचप्राहुःकृपाखवः विन्वापि्ःसुपापोऽरोकान्कान्समवप्स्यति ६२ येनायंयज्वनां श्रेष्ठ स्वरान्यादवरापितः कस्यवाभ्रद्धयापूरतसुतंसोभमराष्वरे पीत्वावयंपरयास्यामोखुदंमन्वपुरःसरम्‌ ६२॥ पकषिणञचुः इतितेपावचः त्वाकारिकोऽतिरुषान्वितः शापतान्मनुष्यत्वंवयुयमवप्स्यथ ६४ प्रसादितथतःप्ापुनेरवमहाषनिः माुपत्वेऽपिभवतभिवितरनेवपन्त तिः॥ ६4 नद्रसंग्रह््वभवितानचमत्सरः कामक्रोधविनियेक्ताभविष्यथुरःपुनः ६8 ततोऽवतेरुरःसेदैवास्तुस्वेरमनि दर पदीगभं सम्भरताःपचरेपाण्डुनन्द्नाः॥&७॥ एतस्मात्कारणात्प॑चफण्डवेयामहारथाः नदारसंगरमाप्ताशापत्तस्यमहाएनेः ६८

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६२ ६३ पक्षी बोले-पांचों विश्वदेवाकि यह वचन सुनकर मुनिवर कोंशिकने अत्यन्त कोधितहो ““ रे पापात्माओं ! तुम सव मनुष्य होगे, पह शापदिया ६४ तव उन्हनि इनकी भार्थना करी ! अनन्तर विश्वामिनने विश्वदेवाआके दारा भरसन्न होकर फिर कहा-“हे देवताओं ! ययपि तुम मरुष्य देह धारण करोगेःकिन्तु तभी तुम बरीभ्रहण ओर सन्तान उपपन्न नहीं करोगे॥६५॥ तुम मत्सरी नहीं होगे ओर कामकोधारिपे मुक्त रहोग" ६६ तदनन्तर वह विश्वदेवा द्रोपदकि गरदवारा उत्पन्न होकर प्रच पाण्डुनन्दनम अपने अपने अंश सहित ुरवंशमे उतपन्न हृए ६७ है महामुने ! इन महपि विश्वामितके

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| _ || | शापक कारणही पांच महारथ पाण्डुके पूतरोका विवाह नही हभ ६८ हे जेमिन वाकं ' पए = || दम्दारे निकट वणेन किया अव ओर या सुननेकी इच्छा है? से २८ ॥९ ननि पण्डवाकय कथाका आभ्य करे इन चारो शनक उत्तर यथावत्‌ (१ > एक इच्छाह! सो कही ६९ इति श्रीमाकेण्डयपुराणे मुरादाबादनिवासिकन्हैयारालमिथकुतभाषाटीकायां $| सतनन्व्पायः ७॥ नेमिनिने कहा-हे द्विजोत्तम ! भेन जिस प्रकार प्रशन केमानुत्तार किये. आपने मारुत्तार उन्‌ सन्‌ भर्नाका यथावत्‌ उत्तर दिया है अव हरिश्वन्द्रकी कथाम मुञ्को अत्यन्त कोतुहल हुभा दै अहो ! उन महात्मान याही केष

दहिजो कछ न्त ^ पायाथा हे द्विजोत्तमो ! कया उन्हेने वैसा सुखशी प्रयाथा 1 पक्षी बोढे-राना हरिशन्द्र विश्वामित्रके वचन एुननेसे अत्यन्त दुःखी होकर धीरे रि गमन

एतत्तसवेमाख्यातंपाण्डवेयकथो श्रयम्‌ पश्चचतुषएटयंगीतंकिमन्यच्छोतमि तिश

जेमिनिर कथ्‌ रचत नयच्छतुमिच्छति॥६९॥ इतिश्रीमार्कण्डयपुरणद्रोपदेयोतत्तिकथनेनामसपमोपव्याथ

| _ मागरताच भवान्ारद्माख्यातंयथाप्रशनमनुकरमात्‌ महत्कोतूहलमेऽस्तिहसिथंदकथांप्रति अहोमहात्मनतिनपाेङच्छृमलत्तमम्‌ 0 _॥ विन्वामिजवचवतवासरानामययोसने हेव्ययानगतोदुःतीम्ययवारुुया ५म्‌ भपामनुष्यभेग्येतिशूखपाणेः परियदः 9 नगामपदव्ादुःसाततसहपल्यालकृय

| पुरा प्रवद नवि शधामिन्रपर्पा (> ® [५ | "सात्तःसहुपत | यद्दरविश्वामित्रमुपस्थितम्‌ तंटक्ठासमनुप्रापतंरिियावनतोऽभवत्‌ प्रह्चेवार्कित्वादरिशचदरोमहामुनिम्‌ | मणः

सुतायमियंपतीपुनेमम येनतेकृत्यमस्त्याहतद्रहाणाष्ययत्तम यत्कायमस्माभिस्तदरज्ञातमदैसि | पूणं $ समासोराजष॑रद 4 (नकर र< ^~. मू 9 स्‌ भि पि शामित्ररवाच्‌ | < “^ प्दयताममदान्नणा राजसुयनिमिततदिस्मयेतेस्ववचोयदि

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किया ओर बालकं पत्रक , धवीपति हारिथन्द मनो परमि गमे क्योकि यह

गये ओर वाराणसीमे पवेश करके समय देखा किःसुनिवर वरि भामि नमुख सड मकार (ववा कतो भक परति इति परति कहा॥६॥ हे भरो! मे सा कामुनिवर विश्वामित्र सन्मुख खडेहं ॥५॥ नरपति हरिशदने महामुनिको आयाहुभ। देख हाथ जोडकर विनीतभावसे (कहा॥६॥. मभा ! मरा यह भाण. यहं पुत्र ओर यह पत्नीमात् विमान है, इन जिसकी आपको रुचिहो, आज्ञा कीमिये, वही आपके अष्यसहप कल्मितहो |॥ आर इतत समय क्या करू ! यह भी अनुमति दीजिये विश्वामित्र बले-रे रा ! क्या राजसुय नैमित्तिकं अपना वचन स्मरण है ! एक महीना

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हरिशन्धने कहा बहमन्‌ } हे तपोधन ! आजहौ महीना पूरा होगा, अभी आधादिनि जौ शुष हे, आप उसी की नी नहीं पडेमी १० विश्वामित्र बोले-हे महाराज ! यहीोः मँ फिर आताहूं यदि आज मजञको दक्षिणा नरी दोगि। किरम विश्वामित्रजी यह कह कर चठेगये तत्र राजा चिता करनेखगे किः ^ इनको पूवं करीहुर दक्षिणा किस |

कहा ! ओर कहा मेरी अरथसम्पतति अर्थात्‌ धन प्रतिग्रहे युक्तं हभ मँ किसपरकार अधोगामी |

पूरा होगा हे. अव मरी दक्षिणा दा |अतीक्षा कीनिये, फिर अभिकं भतीक्षा कर तो निभसन्देह शाप दगा ॥११ पक्षियनि कह

प्रकारसे दुंगा १२॥ मेरे समृद्धिशाटी बन्धुवगं नहीं हमा १३ कुंडी तो पास

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नहीं है, किस दिशामं जाऊं ! कंथा पराणत्याग्‌ करं यदि अंगीकार करीं वस्तु ॒विनादिये प्राणत्याग कर

इस्थिदरडवाच वर्येपणोमातेऽम्डानतपीधन तिष्ठत्येतदिनाधेयततत्मतीक्षस्वमापिरम्‌ १०॥ विधामिचडवाच।॥ एवभस्तुम हाराजजगमिष्यम्यरैपुनः साप॑तवप्रदास्यमिनचेद्यप्रदूस्य ।११॥ पक्षिणउसुः इत्युक्ताप्रययोक्परोराजाचाचतयत्तद कृथमल्ये

प्रदास्याभिदक्षिणायाप्रतिश्चुता १२॥ इत पुष्टानिमित्राणिकुतोऽथेःसाप्रतंमम्‌ प्रतिगरः ्द्टमेनादेयायामधःकथम्‌ १३ कियुप्राणनिवुशचामि कादिरयाम्यकिंञनः यदिनाशंगमिष्यामिअप्रदायप्तिश्रुतम्‌ १४॥ ्ह्स्वटस्कुमिःपापोभविष्याम्यधमाधमः अथवप्रेष्यतां यास्येवरमेवात्सकिक्र यः ॥१९॥ पक्षिणञचुः राजानेव्याकुठंदीनचिम्तयानमधोमुखम्‌ ्रत्यवाचतदापत्नीवाप्पगद्रदयागिरा ॥१६॥ त्यजचिन्तांमहाराजस्वत्य हिष्कृतः १७ नातःपरतरंधमेवदन्तिपुरुषस्यत्‌ यादशपुरषव्या्रस्वसत्यपरिपारनम्‌ १८ अग्निर

मनुपाटय इमञानवद्रनेनीयोनरसत्यवहिषकतः. + ~ ्रस्वृसत्यपरिष | जमधीतवादानायाशाषिखाःक्रियाः भनन्तेतस्यवेफल्यंयस्यवाक्यमकारणम्‌ १९ पस्यमत्यन्तसुदितधमेराघेषुधीमताम्‌ तारणायानतं |

| तद्त्पातनायाकृतात्मनाम्‌ २० . _ - | ता १४ तो ब्रह्मश हरण करनेके पापमं ठि हाकर अत्यन्त तीचा्रम रमर जन्म ग्रहण करेगा, या आत्माक[ बचकरर संन्यासी हूगा * 1५ (बोदे-राजाको इसपरकार दुःखित व्याकुढ ओंग मीचेको मुखकिय चिन्ता करता हमा देख पत्नी सेग्यनि नेमिं आंसू भरकर गदर वचनसे कहा १६ : हेमहाराज ! चिन्ताका त्याग कीजिये अपना अंगीकार कियाहुभा वचन पारग कीजिये अस्यका भ्तिपाटन करनेवाला पुरुष श्मशानके समान्‌ सम्यक्‌ भक

से त्यागने योग्य है १७ हे पुरुषव्याघ्र पण्डितजन कलले है, अपने सत्य का पाटन करने मं जैसा धम होता रै, त्ता अन्य कसीमं नहीं हता १८ | (जिसका वचन असत्य होता है. उभके अभिहोतादि यन्न

नीना वरधणाणा णन्‌ -=-~ ~ कि

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वेदादिका पटना ओर दानादि सभी काम विफल हते १९ धर्मेशाक्मे पण्डितेनि कहा हं कि)

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|सत्य वचन्‌ जिसभकार तारनेके छ्यि सदा समथं होता हे मिथ्या वचनी उसी भरकर नीच गिरानका एकमात्र प्रधान कारण है २० हे प्ररथिव ! आपने |सात अश्वमेध यज्ञ करकं राजसुय यज्ञका अनुष्ठान करिया हैः तो इस समय क्या सामान्य एकमात्र असत्यके कारण सर्भसे भष होगे ! २१ हे राजन्‌ ! भेरे | सन्तान हृ " यह्‌ कहकर रोनेगी तव महीपति वाष्यते आकुलनेन हुई रानीसे कहने लग २२ हरेन्द्र कहा-“ भद्रे ! संतापको त्यागदो, यह म्हारी रिशुसन्नान वचतेमान ईं, हे गजगामिनि ! जो कहनेकी इच्छाहो, वह कहो २२ गाजपत्नीने कहा-“हे राजन्‌ ! मेरे पत्र संतान रोगई ३, संतानके लियिरी साधुपुरर्षौको पत्नीकी आवश्यकता होती है अत एवं अब मुञ्चे वेचकर ब्राह्मणको दक्षिणा २४ पक्षी बोटे-पुथ्वीपति हरिशन्दर पत्नीका यह

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सतत~वभधानाहत्यराजसूयंचपाथवः कृतिनीमच्युतःस्वगंदसत्यवचनात्सकृत्‌ ॥२१॥ रनजातमपत्यंमेदतयुक्ताप्ररोदह बाप्पम्बुतनेवांतास्वाचे ` दमहीपतिः॥ २२॥ हरिःदरउवाच विंचभदेसंतापमयंतिष्ठतिबाठकः उच्यताबङकामसियद्ातवंगनगामिनि २३॥ पत्युवाच रनजातमपत्यमसतापुनरफलाःचियः समादायवित्तनदेिक्ायदक्षिणाम्‌ २.॥ पक्षिणञखः एतदराक्ययुपशवुत्यययोमोहंमदीपतिः प्रति रभ्यचसंजञसविरुलापातिदुःसितः ॥२५॥ महटुःलमिदभद्ेय््मेव्रवीषिमाम्‌ कितयस्मिततैदापाममपापस्यविस्मृताः २६॥ हाहाकथंतयाराकय वमेतच्छधिस्मिते दवोच्यमेतद्रचनकतरावनोम्ंकथम्‌॥२७। इत्यकरासनम्रष्टोपिभ्धिित्यर्दूवन निपपातमरीपठमच्छैयाभिपरतः ॥२८॥ रायानंभुविर्तद ्वादरि्वद्ंमदीपतिम्‌ उवाचेदसकरणंरानपतीसुदुःखिता २९॥ |

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| वनच सुनकर मोहमे मूष्छित होगये ओर किर वह चेतना छाप करके अत्यन्त दुःसितचि्तसे इसधकार विलाप करने ठगे॥ २५॥ हे शे तुम जो कहतीहे,|| | यह बात अत्यन्त कषटदायक हं यह पापात्मा क्या तुम्हारा मुसकुराकर बोलना भरूटगया दै ! २६ हे शुचिस्मिते ! नहीं तो तुम्हारे खमे एसे दष॑चन क्या नि||१ |

कलते ! अथवा मँ किसभकार एसे काके करनेमं समथं होताः जो एसे वचन कह ता २७ नर्रे हरिथनद्र इसभकार कहकर निरन्तर “हा पिकं हा धिक्‌" || [कहतेहर पृथ्वीं गिरगये ओर तत्काल मृच्छका परा हए २८ महीपति हरिशन्द्रको पृथ्वीम शयन किये देखकर राजपत्नी शैष्यां अत्यन्त दुःखित दु

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जर करुणास्वसते कहने ठगी २९ पती बोरी-कि) हाय महाराज कपाही अचिन्तनीय अवसथा उपस्थित हुदै है जो हरिणके रोमी कोमल [पर शयन कते, वही आज ध्रातरमें पड ३० जिन्हे ७५४ काटि गोधन नासर्ोको सुहषे दान किया हैः वही भेरे स्वामी पृथ्वीनाथ हरिभन्द्र मिदि |ङप्र शयन कर रहे हँ ३१ अहो ! क्या कृष्ट है, हा देव ! इन्हेनि तेरा क्या अपराध किया ह, जो इन उमनद्रतुल्य राजाको इसमकार पापियोकी समान दुदैशा स्त कया ३२ हे जमिन ! वह सुभरोणी राजमहिषी शम्या इसभकार अनेक्‌ विखाप करती हुई स्वामीके असल दुःखभारसे पीडित होकर अचेतन अवस्थामें [पृथ्वीपर गिरगदं ३३ } इधर बाछक राजपृत्र.मातां पिताको इस अवस्थामं पृथ्वी पडा दुभा दे भंखसे अत्यन्त आतुर दुःखित होकर कहने लग | प्ल्युवाच हामहाराजकस्येदमपष्यानसुपस्थितम्‌ य्त्वनिपतितोभूमीराङ्वास्तरणोचितः २० येनकेटयग्रञोचततविपराणामपवनितम्‌

| सएषण्थिवीनाथोभूमोस्वपितिमेपतिः ३१॥ हाकष्कितवानेनकृतदेवमरीक्षिता यदिद्रोपदरतल्योऽयनीतःपापामिर्मादशाम्‌ ३२ इत्युक्तासापिसश्रो णीमूध्ठितानिपपातह भवैदुःखमहाभरेणासदयेननिषीडिता ३२ तेतथापतितोभूमावनाथोपितरोरिशः दद्वात्यतकषुपाविपरहवाक्यसदुः वितः ३९ ताततातददस्वातरमम्बाम्बभोजनेदद्‌ क्षन्भख्वतीनातानिहाग्रशष्यतेतथा २५॥ पक्षिणञुः॥ एतस्मि्नन्तर प्रात्िदिश्वामिोमहातपाः कारुकलपदवश्द्धोधनेसेमागितंतदा ₹ङ्ततेद्रिद्रः पतितोसुविमूच्छतः ३६ सवारिणासमभ्य्यराजान | मिदमव्रवीत्‌ उत्तष्ठोत्तष्ठरनेदरतांददस्वेष्टक्षिणाम्‌ ३७ ऋणधास्यतोदुःखमहन्यहनिवदधेते आप्यायमानःसतदादिमरीतेनवारिणा ॥३८॥ पुनमेरैसमापेदेसचकरोधेययोुनिः २९॥ ससमास्वास्यरानानवाक्यमादद्विनोत्तमः दीया दि ४० | [| |॥ ३४ तात ! तात ! मुञ्ञको भोजन दो माता ! माता ! मञ्चे भोजन दे मञ्को बहुतही भख खी है) भेरी जीभका अग्रभाग सूसा नाताहे |॥ ३५ पक्षी बेलि-हे जेमिने ! इसी अवसरमं धन लेको . कालक समान क्रोभित हृष्‌ महातपा विश्वामित्रजी हात्‌ आनकर भाप इए ओर्‌ राजा हरिश को मूच्छित अवस्था पृथ्वीम पदा हभ देख २६ जलके ठट देकर राजासि कहने रग है राजेन्दर ! उठकर दक्षिणा दो ३७ कयाकि ^$ करने दुख दिनि दिनं बद्ताहीं है तव राजा हरि्न्द्रने हिमकी स्षमान शीतठ नलतत (्िचित होकर ३८ चैतन्य ८७०५ किया; "ले रोह श्वामित्रको देखतेही किर -मूच्छित |होगये तव द्विजश्रेष्ठ विश्वामित्रजी अत्यन्त करोभित होकर ३९ राजाको समञ्ञाते ईए कह

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रजन्‌ ! यदि तुम धमकी ओर देखते हो, तो भेरी शक्षिणा देदो ४० दलो, सूर्य केवल सत्यकीरी सहायतासे ताप देते है पृथ्वी एकमात्र सत्यमेही भति शित हः सत्यही एकमात्र धमे कहागया टै ओर स्वगेभी एकमात्र सत्यमे ही भ्तिष्ठित रहता है, देखो ४१ हनार अश्वमेध यज्ञका फल ओर केवल सत्य यदि तराजू की दंडी रक्खा जाय, तो हजार अश्वमेधे फल की अपेक्षा सत्यही अधिक होताहै ४२ अथवा एसे अनाय पापमति करर स्वभाव ओर मिथ्या वादी इस गजासे इसप्रकार सामवाद प्रयोग करनेकी मुञ्चकां क्या आवश्यकता है ४३ हे राजन्‌ ! मै सरलक्नावंसे कहताहूं, सुनो, यदि इस ममय तुम

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मृ दक्षिणा नहीं रोगे ४४ तो सर्यदेवकरे अस्ताचल.पहुचतेही अथौत्‌ संध्या होते ही मँ निःसन्देह शाप दृगा। विवर विशवामिवजी यह कहकर चरेगये

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| सूत्येनाकंःपरतपतिसत्येतिषटतिमेदिनी सत्यंचक्तपरोधमेःस्वगैःसतयेपरतष्ठितः॥ ४१ अश्वमेधसह्तचसत्येचतटयाध्तम्‌ अश्वमेषसह्ादित्यमे वविरिष्यते ४२ अथवाकिममंतेनसान्नापरोकतेनकारणम्‌ अनार्येपापसंकस्ेकरेरचानृतवादिनि ४२॥ त्वयिशत्ञिप्रभवतिद्वावःश्रूयतामयम्‌ गवमदनाराजत्रदास्यतिभवान्यदिं ४४ अस्ताचरंप्रयतिऽकैराप्स्यामित्वांततोधुवम्‌ इत्युकासययोविप्रोरानाचासीद्रयातुरः ४५ कान्दग्धतोऽपनोनिःस्वोनृरतथानिनार्दितः भायांस्यभूयःप्रदिदं्रियतापचनमम ४६ माज्ञापानरनिर्ग्धःपचतवपुपयास्यसि सतयापोयमा। पत्तिरानापल्यापुनः नः ४७ परादभदरकरोम्येपविकयंतवनिषृेणः नृरीतरपियत्कतैनश्क्यंततकोम्यहम्‌ ४८ यदिभेशक्यतेवाणीवमी टक्सुदुक्चः एवसुक्ताततोभायागत्वानगरमातुरः वाप्पापिहितकण्डाक्षस्ततोष्चनमतरवीत्‌ ४९

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तब गजाश बरह्मशाप के भयमे अत्यन्त वरान ठग ४५ इधर हम सब अत्यन्त निर्धन ओर नीच दशाम पडहृए है उधर धनी पुरुष बडे कठोर श्या कर {क्या करे से १ला हागा ! ओर किंस ओर्‌ नार्थे इस्त बातमे कुछ स्थिर नहीं कर कसते इसी समयमे उनकी पर्नीनि फिर कहा हे महाराज ! गेन

हारै वही कीजिये ४६ उपाय रहते शापाधिमं दग होकर मृत्युको भाप मत होभो तब राजा हरिद्रे पतली रेग्यकि दवारा बरवार इस राति अनुरोध 6 भाप होकर ४७ कहा-े भद्रे ! प्रणाहीन होकर तमं बेचगा अत्यन्त निष्ठुर का, निके केकी सामर्थ्यं वही है. दही करेगा ४८ अच्छा द्वी एम कृठिने वचन कसक वा नहीं नरपति भायंमि इमपरकार कह अत्यन्त व्याकृल होकर नगरम गये भौर आंसुसि केठ रोककर यह वचन कहने को॥४९॥ | |

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$| ` भा०षु० | रे नगश्वासियो ! सब मेरी बात सुना आप्‌ क्या एछ तुम कोन हो! पे नृशमहू मनुष्य नरी ५० मे राक्षस वा उसकी अपिक्षात्ी अतिकठिन आर पापातमा | _ _ | २।हं्योकि भराणभिया पताक बेचनेके लिये भकग भरी मेग प्राण बाहर नरी निकटा ॥५११भ२ प्राणेसेती प्यारी दासोमं यदि आपका भोजन हो) तो जबतकं संध्या ` २२ ( [न के अर्थत भरे भ्रण रहो रहो शीष कहो ॥*५२॥ पक्षी बोले-अनन्तर किमी ढे बाह्मणने आनकर राजासे कटा. मे धन देकर दासी मोर अत एव मुञ्चको [३ [दो ५३॥ मेगे अनेक भरकारकी धनस्पनि ओर मेरी भरिया अत्यन्त कोमल अगवारी है. परे कायं करनेमे असम है!दइस कारण यह मुञ्चकोही देदो॥५४॥ | | तम पत्नीके कर्मद्षता ( चतुरता ) अवस्था रूप ओर्‌ स्दावके अनुरूप यह्‌ धन लेकर दस सको मुञ्चे दो ५५ बाह्मणे इसप्रकार कपर अत्यन्त

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| राजोवाच भोमोनागिकाः स्वेशृणुष्वेवचनेमप्‌ \ किमापृच्छथकस्त्वेभोनृ शेसोऽदममानुषः ५० राक्षतोवातिकाथ्निस्ततःपापतरोऽपिा क्कितंदयिताप्रप्ेयोनप्राणास्त्यनाम्यरम्‌ \ ५१ यदिवःकस्यचित्कायेदास्याप्राणिष्टयामम सृत्रवीतुत्वरायुक्तोयावत्मन्धारयाम्यहम्‌ ५२ | पक्षिणञ्चुः अथवृदधोदरिनःकिदगत्यादनराधिपम्‌ समपेयस्वेमदासीमरैकेताधनपरदः ५३ अस्तिमेवित्तमस्तोकंसुढुमारीचमेपरिया | गृदहकमेनरक्रोतिकततेमस्मातप्यच्छम्‌ कमेण्यताययोरूपरीरनतवयोषितः॥ अनुरूपमिरदवित्ेगृहाणपयमेऽलाम्‌ ५५ एवमुक्तस्य | गहरिद्स्यभूतेः व्यदीय्येतमनोदुःसातेनंकियिद्रमीत्‌ ५६ ततः सविप्ोनपतेेटकसन्तहदेधनम्‌ बद्धकेशेष्वथादायनृपपतीमकषे | यत्‌ ५७ रुरोदगेदितास्योऽपिषकृश तुमातरम्‌ दस्तेनवल्माकपेन्काकपक्षपरशिुः ५८ सुचा्थसुचतावन्मांयावत्परयाम्यहीरेश्चुम्‌ | दुरभेदरौनतातपुनरस्यभिष्यति ५९ पर्येदिवत्समामेवेमातरेदास्यतांगताम्‌ मांमास्प्राषीराजपुजअस्पररयाेतवाधुना ६०

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| दुःखके कारण राजा हरिशन्द्रका हदय विदीणं होन ठगा ओर उसको कृ उनर नदीं दिया ५६ अनन्तर वह बाह्मण राजाके वल्फठ वशम 1ह धन इढरीति | से बाध रार्नकि कश पकड़कर संचन ठगा ५७ काकपक्षधारी बाठक रोहिताश्व माताको आकषट होता देख. हायते उसके वच्चका अचल संचतादुभा रोने | गा ५८ राजपत्नी बोटी-दे आर्थ ! एकवार मृते ठोडदो ! एकवार इस बाटकं पुत्रका मुख देख हे तात ! फर मँ इको नही दससकूगी ५५५ (हे दत्त ! आओ, देखो पे तम्हारी मात दाशी हई हं ! राजपुत्र ! अब पृदक स्शं मत करना, अव मं तुहारे सशे करने योग्य नही रही ६०

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अनन्तर वालक महसा माताका आकृष्ट टता देखकर `मा! मा ! ' शब्दसे रोताहुभः आंख असू पर कर दाटुने टम्‌ ॥६१॥तव वृदे बाह्णने अत्यन्त कोधित हाकर

वैगसदहित वाटकके टत मारी. किन्तु बालक तो भीमा! मा! कहकर दोडनेटगा, जननीको क्रिसीपरकार भी नहीं छोडा ६२ राजपलनी बटी-हे नाथ! अनुग्रह कीजिये. ठस वाटकको भी करय करो अथात्‌ मोटलो क्या मेरे मोट ठेनेपर भी दम वाटकके विना मेँ किसीभरकार भपका कायं नरी करमकृग्‌ ॥६३॥ अत एव इस हतभागिनीकं उपर यही अनुग्रह कीजिये कि)वत्स संग पयस्विनी गायके ममान एम वाठके मंग मृश्चफो संयोजित कीजिये॥६४॥ ाल्मण काला-यह भन परहणक्गं बाटकका मुञ्च 2) धमशा्वेना षण्न ग्री ओग परप दानाकाही मृल्य शत) सहर. ठक्च वा कगेड मुद्रा निष्पत किया

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तत्‌-स्चङ सहसाः इक्र ्टातुमातरम्‌ समभ्यधवदम्बेतिरुदन्रस्राविटक्षणः ६१ तमागतं द्विजः कोधाद्रारममभ्याहनत्पदा वदंस्तथापिसोऽम्बेतिने दुचत्तमातरम्‌ ६२॥ राजपत्न्युवाच प्रषादृकुरुमनाथक्रीणीप्वेपंचवाटकम करीतापिनादमवतोपिनेनकाय्यंस्ाधिका ६२ इत्थ

| वनारपभाग्यायाप्रसाद्सुसुखाभव मसियोजयटिनवन्सनेवपयासिनीम्‌ 22 त्राह्रणउवाच गृदयतांवित्तमेतत्तदीयतांगारकोमम १| तानमराघ्शेःकतमवसवितनम्‌ सतेसरकैरक्षचकोरिमस्यंतथाफः &<« पर्तिणञ्चुः = तथेवतस्यत्रितेवद्ोत्तःपटेततः

चश्दवाद्कमातरासरकस्थमवन्धयत्‌ &8 नीयमानोतुतोहष्टाभास्याप्योसपार्थिवः रख प्ुढुःखातानःस्पाप्णपुनःपुनः 8७ अननवायुनचाद्‌त यनिन्दुने चष्थग्ननः हष्रवतःपुरापतासयदासोत्वमागता ३८ भूववरात्रमूत्यसुद्कपारकसगटः सप्रात्राक्क्रयबासायप र-मामस्तुसुदुमतम्‌ &३९॥ राप्रियहाराशोवत्सममानायेस्यदनयेः दवावानादयाप्रा्तननृतास्सतयापाध्च्‌ ७०

₹॥६ “॥ पक्षा बा तदनन्तर उम बटे ब्राह्मणने नम्पतिके इपद्रेमं वह धन भी पर्षवत बधकम वालक गजमाहुषीको एकत्र वाधरटिया॥६६॥ तव महीपति हरिश्वन्द्र भकार कृरका वाल्मणक संग जतिाहूआ दखकर कातग्तासहित वाग्वार दीर्घाप्ण वाम्‌ छोड हए अत्यन्त विलाप कमन ठगे ६७ कि) हाय ! जिमकरो वायु, दयः चनद वा अन्य पृरुषन पहिल की नहींद्खाह्‌ आजमेगी उसी पत्नीको दमीपाव अवटम्बन करना पटा ६८ हाय ' मर्यव॑शमं जिम] जन्म हं जिसके हाथकी मव्‌ अंगृटियं अत्यन्त सुकमार दै. उम शिशबाल्क को नी आज बेचन पठा, हाय ' दूमति हृ. मृ्मकर[ [धक्रार हं॥६९॥ हा प्रिये ' शिशो

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हे वत्स , भरेही अन्यायआचरणंके कारण तुमकं। यर देवदुदेणा मगन एडी हे, हाय ¦ तो पी भेरी मृत्यु नहीं दै, मू्रको धिक्कार हे ७० पक्षी बोदे-इस प्रकार राजा विलाप करतेरहे ओर वह ब्राहमणी शी्तामहित राजपुत्र तथा राजमहिषीको केकर अत्यन्त ञंचे वृश्च ओर महक अन्तरम लागया॥७१॥ [उसी समय म॒निवर वि्वामित्रने भी सहमा कग राजामे धन मांगातेब् राजा हरिश्वन्द्रने भी वह स॒ब धन उनको समर्पण किया ७२ | विश्वामित्र मुनि राजाके खी पुत्र विकनेका धन बहू डा. देख. अत्यन्त ऋोधित हा शोकितूत राजास कृष्ने ठगे ७३ क्षत्नियाभम ! इष सामान्य धनको यदि भरे यज्ञी उपयुक्तं दक्षिणा विचाग्ता

पक्षिणउदः॥ एैविरुपतोराजञःसविप्रोऽन्तरधीयत वृकषगदादिभिस्तेगेस्तावादायत्वरान्वितः ७१ विभ्वामिरस्ततःप्ा्तोनृपंवित्तमयाचत { तस्मेसमपथामासदरिशन्द्रोऽपितद्वनम्‌ ॥\ ७२ \ तद्वितस्तोकमारोक्यदारविक्रयसंभवम्‌ शोकाभिभूतंरनानंङुपितःकोशिकोऽत्रवीत्‌ ७२ क्षप्रष॑धो पमेमातवसदशीयज्ञदक्षिणाम्‌ मन्यसेयदितस्पिप्रेपर्यत्वेमेवरुपरम्‌ ।\98॥ तपसोऽसुतप्तस्यत्राह्मण्यस्यामटस्यच मत्प्रभावस्यचेग्रस्यशुद्धस्याध्य | यनस्यच ७५\\ रजेकच अन्यादास्यामिभगवन्कारःकशचितपती्ष्यताम्‌ साम्प्रतनास्तिषिकरीतापतरीपुतरश्चवाटकः ७६

| नि्ुरनिषृणंक्चः तदादायथनतूगीकुपितःकोशिकोययो ॥७८॥ विश्वमितेयतेरानाभयसोकादिमध्यगः स्वकिकरयेविनिभित्यपोवाचोचेरधोमुखः ॥५९॥

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इन सयका देख ७५ रजनि अत्यन्त विनीतभावसे कहा-हे भगवन ! कुठ काट अक्षा कीजिये शेष दक्षिणा दुगा इस समय ओर कृ नरी हे, यह देखो | पत्नी पृ्रतकको बेचदिया है ७६ विश्वामित्र बोले हे नराधिप ! यह जो केवल दिनिका चोथा भाग शेष हे भे इसकी प्रतीक्षा करंगा फिर तुम के उत्तर नहीं करना ७७ पृश्षी बोटे-मुनिवर कौशिक उन राजासि केधपूणं प्रणान ओर निष्ठर वचन कह उस धनको छेकर चे गये ॥७८॥ विश्वामिष्रके चटे ।जनिप्र नरपति हरिशव्द्र भय ओर भोकसागरम ममरहो, सथ भकारने निश्चय कर नीचेकं

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ह्‌ नौ अशी मेरीमहातपस्याका बख देख ७४ निमेल व्रहमतेन उग्र प्रणाव शुद्ध अध्ययन

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विश्वमिजरवाच चतभौगःस्थितायोऽयेदिवसस्यनराधिप एषएवप्रतीयोमिकक्तव्यंनोत्तरं्वया ७७॥ पक्षिणञदुः तेमवमु्तारनि्ं

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वित्तीतनयोद्यीमयपरष्यणमानवः सत्रवीतुत्वरयुक्तोयावत्तपतिभास्करः ८०

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| धनपरदानप्वेकं मुञ्चको मोल लेकर सेवकं बनानेकी इच्छा करे वह मयदेवके अस्त हेनेसे परिह मुञ्चे करै,॥ ८० अनन्तर स्वयं धर्मं चाण्डाटका रूष | धारण करके शीर अये -उस्तके गात्रम दुगेन्ध आतीथी उसकी मूत्तिं रुक्ष मुख दी ममि युक्त ओर बडा स्वभाव अत्यन्त भयंकर समस्त दात डवे ओर | उसका रूप अत्यन्त धृणाकर था ॥८१॥ वह रष्णवणे लम्बोद्र पिंगल अथ रक्षरोचन ओर कर्क॑शभाषी था उसके हाथ भे कितने ही पक्षी गे मँ मृतकों |का माला <२ एक हाथमे नरकपारः दूसरे हाथमे छाठीं खि, शरीर अत्यन्त छश ओर कितनेही कृत्ति परिवेष्टित होकर निरन्तर अतिशय जल्पना | भयोग करताथा <३ व्ह चाण्डाट रूपी धमं राजासे आनकर बोला तुमको मोल हंग थोडे वा बहुत किस मूल्यमे तुमको परापर करताहू, शीघ्र कहो॥

अथानगामत्वरितोधर्मशवण्डारशूपधृक दुगेन्धोविंक़ृ तोशस्षःरमथटोदन्तुरोषृणी ८१ कृष्णोठम्बोद्रपिद्गरकषाक्षपरषाक्षरः गृरहीतपकषषं | जश्वशवमाल्यैरंकृतः ८२॥ कपाठ्दस्तोदीषास्योभेरवोऽपिवदन्ुहुः इवगणाभिवृतोषोरोयाटिहस्तोनिराकृतिः ८३ ०२-.०५५्‌ | अदमर्थीत्वयारी्धकथयस्वात्मवेतनम्‌ स्तोकेनब्हुनावापियेनेरुभ्यतेभवान्‌ ८४ पक्षिणउद्चः तेतिरमथारक्ष्यह्रद्िसुनिष्टुरम्‌ ` वद्न्तमतिदुःशीटंकस्त्वमित्यापारथिवः ८५ चण्डार्उवाच चण्डारोऽहमिहल्यातःप्षीरेतिपुरोत्तमे विल्यातोषध्यवधकोमृतकम्बहा रकः ८६ हरिशवन्द्उवाच नार्दचण्डारुदासत्वमिच्छेयंसुविगर्हितम्‌ वरंशापाभिनादग्धोनचण्डारवरगतः ८७॥ पक्षिणरद्वः तस्यैववदतः मरातोविश्वामिजस्तपोनिषिः॥ कोपामषैविव्तकष्रादचेदंनरापिपम्‌ ८८॥ विश्ामिजउवाच चण्डारोऽथयनलपतेदातंवि्ुपस्थितः कस्पात्नदीयतेमह्यमरेषायज्ञदक्षिणा ८९

|॥<४॥ पक्षी वटे कि)अतिपरुपभाषी) ऋूरदषटि ओर कक॑शस्वभाव चाण्डालको एसी अदस्थासे आया देखकर राजनि कहा तुम कोन हो॥८५।॥ चण्डा बोढा चाण्डाठ | ओर इस शर्ट नगरमे मेरा वास है, मेरा नाम्‌ प्रवीर है भे भिद वध्य वधिक अथात्‌ वध करने योग्य पुरुषका वध करेवालाहं ओर रे हृए पृरुषका कम्बलौ हरण

करताहू ८६॥ हारिशन्द्रने कहा-चणण्डाठका दासत्व स्वीकार करना अयन्त निन्दाकौ बात है, अत एव भँ इतक इच्छा नरी करता यथपि शापानठमे दही |६' किन्तु तो भी चाण्डालक वृशीभ्रूत नहीं हंग ८७ पक्षी बोे-राजा इसंभकार केही थे, उती समय तपोनिभि वित्वमितर्जीनि सहसा आय, कोप | अमषद्रारा खाल ने्रकर राजति कहा ८८ विश्वामित्र वोके-हे राजन्‌ ! यह चाण्डाठ तुमको बहत धन देनेके दमि उपस्थित ३, तो फिर किस कारण भेर

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| यृजञकी दक्षिणा नहं तरते स्च ? ८९ हार्शन्द् बोटे-षिगघन केशिक ! मे अपनी आःमाको मृयवंशौतपन्न जानताहू! अत एव : धनके लोगे किंसमकृर चाण्डालके वशीपत हं ९० विश्वामित्रे कहा-पदि तुम मुञ्चको अपना शरार वचकरर इम चाण्डालक भन यथात्नमयम्‌ नहं दोगे) तो तुमको निःसर

शाप दगा ९१ पक्षी बोठे-तदनन्तर महीपति हरिशवन्द्रे चिन्तामाजमे जीवित हो भगवन्‌ भसन हूजिये ` कहं कर व्याकृल मनसे कपिवर दान चरण पकडलियि ओर कलहा ९२ आपका दासह, अत्यन्त भीत ओरव्याकृल हृभ दं ओर विशेष कर मँ आप्काही भक्तः इस कारण विपरषं। अनयह कीनिये, चाण्डाले वशीकत होना अत्यन्त कषटकी वाते ९३ हे प्रभा! मेरा धन शेष होगा ह. अतएव भभा

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हरिन्द्ररवाच भगवन्मूयेवेशोत्यमात्मानेषेधिकोरिक कथचण्डारुदासत्वगमिष्येवित्तकाुकंः ९० विश्वामित्रउवाच यदिचण्डाट वित्तत्वमात्मक्षकियनमम नपदास्यसिकाटेनकप््यामित्वामरायम्‌ ९१॥ _ पक्षिणउछः इरिश्रस्ततोरनाविन्तावस्थितजी पितः मर तिवदन्पादावपेनंग्ाहविहटः ९२ दासोर्मयात्तोऽस्मिभीतोऽस्मितद्रक्तचविरोपतः इरुप्राद॑विमर्पकषटश्ण्डाटसङ्करः ~र भवेयं वित्तरोषणसपैकमकरोवक्ञः तमेवभुनिरादैरपरप्य्ित्ालव्तकः ९४ विधामिचखाच यदिपिष्योममभवचिण्डाटापततामया दासभावं पनुप्राप्ोदत्तोषि्तदेनै ९५॥ दरि्ंद्उाच यवसोरक्यतेविपरःकोरिकःपरितोषितुम्‌ ततेोगदाणमामदमदतत्तकगम्बहम्‌ ९६ चण्डाछ्डवाच डातयोजनविस्तीणौनानाग्ामरखेकृताम्‌ भूमिरक्षामयीकृतादास्येदकोरिकंप्रति ९७॥ प्र्िणञ्छः एवछतदाप नर्वपाकोदधष्टमानसः विन्वापि्ायतद्र्यंद्॑वावद्धानरेःवरम्‌ ९८

कर्मकर दास हेगा, हे मृनिशा्दूख ! आप जो करगे वही करूगा आर सदा ठनहार हा चत र। अनुवर्ती होकर रहंगा ९४ विश्वामित्र बोट 1. यदि तमभेरे ही वशी होतेहो तो मँ ने एक अवद मुद्रां तुमको दस चाण्डालक हाथ भचा तुम इसकेही दस होजाओं ९५॥ हारिश्वन्द्रने कहा-कि यह बाह्मण विश्वामित्रजी संतुष्ट ॒हासकते ता मृञ्च बरहण करो, मेँ तुम्हारा दास बनकर सेवा करूगा ९६ चाण्डाट बीला-किः सो योजन की विस्तारवार्द अनक यरामेमि शोभित प्र्वीको रक्षावाटी करके मं विश्वामित्रजीके वेताहूं ९७ पक्ष बाट -तव राजाकृ पृक्त ` आग्ञा " यह वचन निकठते ही चाण्डाठ

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हपी धर्मं भरस्नवित्तसे विश्वामि् मुनिको वह्‌ धन देकर नरपतिको बांध अपने नगरमे गया ९८ राजा हरिश्न्द्र एकं ते पत्लीपुतरादि वूवियोगते अव्यन कातर होगयेये, इसपर भी फिर चाण्डारके दण्डे मारनेसे अत्यन्त सम्नान्त आर व्याकूठ होगये ९९ तदनन्तर हरिन चाण्डाटके घर वास करते हए भरत याह्न तथा सायंकाट इत्यादि सब समय मं ही इसपभकार गान करते किं ॥१००॥ दीनगुखी वाटा दीनमुख वाटकेको सन्मुख देखकर दुःखित वित्तसे दरसपक। चिन्ता करती होमी कि, राजा धन उपाजैनपूर्ैक बराहणको इससे अधिक धन दे हम दोनोंको दढा" किन्तु हाय ! वह मृगशावाक्षी यह नहीं जानती है कि, म॑ चाण्डालक दासत्वरूप पापदशामे निपतित हआहू १०१ १०२ राज्यनाश) सुध्त्याग, भायो प्रका बिकना ओर अन्तमं इस॒चाण्डाटपन करी प्राति, हाय ! दुःखके उपर दुःख उपस्थित होता १०३ जिनका सवैस्व हरण हीगया वह राजा इसप्रकार चाण्डाटके धर वास करते दण्डप्रहारसधान्तमतवन्याङ्कखन्छयम्‌ दप्रवन्धुवियोगातेमनयप्रेजपक्रणम्‌ ९९ टार्धन्द्रस्तताराजवस्शधण्डारपकणप्रातमधप्याहसपयप्तायचं तदगायत ॥१००॥ बाखांदीनसुखीद ्वाबाख्दीनमुखंपुरः मांस्मरत्यसुखाविष्टामोचयिष्यतिनतृपः ॥१०१॥ उपात्तविततोषिभायदत्वावित्तमतोऽधिकम्‌ नस्ामांमरगशवाक्षीवेत्तेपापतरकृतम्‌ १०२॥ रानज्यनाशः भद च्यागाभायातनयवक्यः प्रात्तचण्डालताचयमह।दुःखपरम्परा एवसानव् त्िव्यंस्ल्पारदयितसतम्‌ भायाचात्म्तमावष्हतसवेस्वमातरः > कस्याचत्वथकर्स्यमरतचखपह्मरकः दरथन््राऽभवद्रानारपशा नेतद्रशानगः चण्डदटेनानुरि्टमतचेखापदारिणा रवागमनमनिच्छग्रिहतिष्ठन्दिवानिराम्‌ & दर्दैरज्नेऽपिदेयञ्चपडभागन्तुरावप्रति जयस्तममभागाःस्य॒द्रोभागोतववेतनम्‌ इतिप्रितिस्मादिष्टोजगामरावमन्दिरम्‌ दिरतुदाक्षेणांयत्रवाराणस्यांस्थितंतदा इमशर्नषोरसं नादाशवाश्चतश्पाकटम्‌ दवमारसमकणदुगन्धवहुधूमकम्‌ हुए प्रतिदिन दुःखितचित्तसे भयतम पुत्र आर मनम वसी हृदं भायाको स्मरणं करते ॥१०४॥ फिर कृ दन वतनपर्‌ उस चाण्डाटफ वशवर्ती राजा हरिशन्द् मशानमं स्थित मृतकके वख ग्रहण करनवाटे हए १०५ ओर्‌ शववश्चापहारी चाण्डाटके द्वारा उमप्रकार आक्नाक। प्राम हए कि तुमदिनि रात उम्‌ स्थानम पासि करके कहा कान मुदा आता ह, इसी खोज करो ॥१०६॥ प्रत्येक शव (मुरदे ) मं जो प्राप हो) उसका छठा भाग राजाको गे) अवशिष्र पच नागमं तीन भाग भर निमित्त आर दो भाग तुम अपने वेतनमं रक्खा' ३०७ तव राजा ह्रिन्द्रने चाण्डाठकी दसमरकार आक्ना पाप वाराणमी की दक्षिण दविशामे

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स्थितं श्मशानं प्रव करिया १०८ उमङी चारां दिशा घोर्‌ शब्दे प्रतिध्वनित थीं संकट गीददि्यामे परिपणे) मूतकोके मस्तकरमि व्या तथा दर्भन

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| [मव बहुल धरते समाच्छनन था १०९ पिशाच) भृत, वना) डाकिनी, यश्च गृध, गोमायु इत्यादिमे भरा हृभा, तथा उनके शब्दत नादि था ओर उसमे ||& कते जहा तहां फिर रहे वह अस्थर्यामि परिपणे आर महादुमन्धमप था ११० १११ मृतपुरुषवाठे सम्बभियोे नादसे परिपणे होनेके | कारण अत्यन कोलाहलयक्त था हा पृत्‌! मित | हा बन्धो ! हा प्राता! हा वत्स! हा प्रिये! ११२॥ हा स्वामिन्‌! हा बहिन ¦ हा माता ! हा मामा हा पितामह ¦ हा मातामहं ¦ हा पित्‌ः ! हा पतर ! हा बाधव ! भान कहां गये ! एक्‌ बार आओ ११३ इसप्रकार ओर प्री अनेक भतिसे विठाप [कने हूए शर्षाका आतनाद्‌ उमके चाग रसे सुनाई आता था आं कीं कीं तक अनिमेष नेतरेसे अथात्‌ विनाही पलक मरे देख थे. जिनमे भय छ्गता था ११४ का आंख खोले बन्धुभंकीचिन्ता कर रहा था, माप्त मना आर भेद जनके कारण ठन छन

पिञञाचभूतवतारुडाकिनीयक्षरंकलम्‌ महागणमराभूतखकाराहखायुतम्‌ ११० गृभरगोमायुसेकीणेश्वृन्दपरिवारितम्‌ अस्थि वातस्कमणमराद्गन्धसेकुरम्‌ \ ११ नानामृतसुहत्रादगेद्रकाखारटायुतम्‌ हापएुवमिवहावन्धोभातेवत्सप्रियाद्यमे १२ हापतेभगिनिमातहीमा त॒रपितामह मातामरपितप्कगतोऽस्यदिवान्धव ।॥ १३ इत्येववदतांयत्रष्वनिःशरूयतेमहान्‌ यञनेमैरनिमिपेःरावाभयमिवाविरान्‌ १४ निमारूतेश्चनयनवधुचतापथास्थतः ज्वरन्मापिवसामेदशछमच्छमितपंश्रुम्‌ १५ अद्ैदग्पाःशवाःरयामाविकष्दन्तपंक्तयः दसेत्येवाभि पध्यस्थाःकायस्येयदशा त्विति १६॥ अगरेशटचटाशब्दोवयसामस्थपंक्तिषु बान्धवाक्रन्दरम्द्पुल्कसेषुप्हषनः १७ गायताभूतेतारपि शाचगणरक्षसाम्‌ श्रूयतेयुमरान्वोरःकट्पान्तइवनिःस्वनः ॥१८॥ मदामदिषकारीषगोराङृद्राशिसंकरम्‌॥ तदुत्यभस्मक्टेवृतंसास्थिभिरत्तेः॥१९॥ (शब्दमे उसकी चारों दिशा संकुल होरही थी ११५ शवन आभरिमे पडनेके कारण अधजटी होकर श्यामवणं धारण किया है ओर उषके दतिंकी पक्ति बाहर |होगई देखनेसे विदित होता है कि. उस देहकी देसी दशा ! यह विचार कर मानों उसका हास्य करती है ११६ अस्थिपंक्तियोके उप्र कदे दूए काकांके नाना प्रकारसे शब्द्‌ होने मृत पुरुषाके टियि वांधवजन आ्तनाद कर रहे थे. अपनिके चटचा शम ओर चाण्डालकी आनन्दपूचके ध्वनित षह परिपुण हो ग्हाथा ११७ कहीं भूत पेताल पिशाच राक्षसोके गाने नाचने का शद्‌ ुननेमे वह स्थान भयंकर प्रयकालकौ समान विदित होताथा ११८॥ | कहीं कहीं राखोके दे काले कले भैँमाभकिं गोबरके देर तथा गायो गोषरके टेर दिखाई देतेथे ओर उन राशा अस्थियोपर उड उड़ कर गिरना पहादकी |

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सुन्दरता दिखाता था ११९ किसी स्थानम काकबलिको उपहार दीहूदं माल्य ओर दीपमाला पदी हुई थी, करीं उल्कामुख शृगाल अमेगलजनक शब्दे | चारों दिशा पतिष्वनित कररहे थे जिससे वह रथान नरक दीस स्हाथा ॥१२०॥ किसी स्थानम गहरस्थ गारक भयंकर शब्द्‌ हो रहाथा अनक मनुष्योकी

| अनेक भकार कंदनध्वनिसे ओर भति भौतिकी भयंकर भ्रतिष्वनिसे अत्यन्त भयाकक उस नरककी समान श्मशानं बोध होतादे कि; स्वयं भयको भी अत्यन्त ||

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|भीत हीना पडताथा॥ १२१॥राजा हारिद्र उस दारुण श्मशानमे पंवकर चिन्ता करे गे कि हा विधाता ! वह पृत्यगण, वह मंत्ीगण. वह बाह्मणगण भर वह राज्य कहां गया ! ॥१२२॥ हा रैब्ये ! हा वत्स ! तुम इस भाग्यरीनफो छोड कर करां चठे गये ! हाय! एकमा विभामित्रनीके रोषसे भरा सर्वत्व चलागया ।॥ २२॥ नृपवर हरिश्वनदर उस श्मशाने इसप्रकार अनेक भोति चिन्ता करते चाण्डालके वचनकीभी वारंवार चिन्ता करतेथे,रक तो मरिन पेष. हक्ष देह) इसपर नानोपहारस्र्दीपकाकग्िपसंकुरम्‌ अनेकंान्दबहुंसमरानंनरकायते १२० सवदह्विगरभररवैःरिवासतेनिनादितेभीषणरावगहरम्‌ भयं भयस्याप्युपसंननेभेरोरमशानमाकन्दविरावदारुणम्‌ २१॥ सराजाततरसंपापतोदुःषितःशञोचनोदयतः हाभूत्या्मतिणोविपाःकतद्रा्यविभेगतम्‌ ॥२२॥ | इरन्यषुनदावारमात्यक्तमन्दभाग्यकम्‌ वि्वामिनस्यदोषेणगताःङुजापितेमम्‌ २३ इत्यचिन्तयस्त्रचण्डाणोततयुनएुनः मरिनोरकषसवी |: केङवान्गन्धवान्षवृजी २९ टगुड़ीकाखकल्पधार्वशवापिततस्ततः अस्मिन्डावदंमूल्यप्तपाप्स्यामिचाप्य॒त ॥२५॥ इ्द॑ममददराञयुल्यचं | 4 डालकैत्विदम्‌ इतिधाबन्दिहोराजाजीवन्योन्यन्तरगतः २६ नीणकपटसुग्रनिकृतकन्थापरदः चिताभस्मरनोरिपमुखबाहूदरां भिकः ॥२७॥ ||‡ नना “वसन्‌ नानाश्बोदनकृताहारतृपिपरायणः २८ तदीयमाल्यश्चषकरृतमस्तकमण्डनः नराभरोनदिवाहेतेहे यहुः २९ |भी फिर सवाज्ग मे केशवं गन्ध ओर ष्वजा॥ १२४॥तथा लाठी लेकर इधर उभर धूमना, अत एव मानों वह उस समय स्वयं यमतवरूप होरहेथे ओर मनम पिचातेये (कि) इत मृतक का इतना मूल्य हुआ, इतना मिला ओर इतना शेष है १२५ सुतरां यह भेरा; यह राजाका ओर वह गुरुप चाण्डाठका, जवं वह इकार | चिन्ता करते करते इधर उधर भमण करते, तब बोध होताथा कि, उनको जीषितदशामे ही मेतयोनि उपस्थित हुई है १२६ जीण वजे रथि देकर्‌ ||: ही उन्हेनि कन्था पहर रक्सीथी, मुख, बाहु, उद्र ओर दोनों रणं मे चिता की भरम ठेपन करीथी ॥१२७॥ हाथकी सव अंगुलियों नानाभ्कार मेद्‌, वसा [ओर म्ना लगी रहतीथी, अनेक मृतकोकि पण्डते बचेहए भातका भोजन कर कै तृप होते १२८ मृतके शरीर की मालासे ही मस्तक शोतित करके

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वाक हा हा शष्द्‌ उच्चारण करत ओर क्था एन, बयः राजि, किरी समय भी वह नीं सोतेथे १२९. उन्हे इसपकार उस्‌ मशानमें वास करके सो वृषं समान बारह महीने बिताये किर किसी दिन चृपशष्ठ हारश्वन्दर बन्धुवियोगसे भान्त हुए १३० रकष देह चेषटारहित रो शयन करके निदराभिरृत हृएये उसी समय उन्हेनि एक महाअद्त बात स्वम देखी १३१ र्मशानमं वास करनका भयास होनेके कारण अथवा देवकी बख्वत्ताके कारण उन्हेनि देवा कि, अन्य देह धारणपुवेक गुरुको दक्षिणा देकर १३२ बारह वषे दुःख भोगने के पीछे तब मेरा दुटकारा होगा फिर उन्हनि देखा कि, मेँ स्वयं मानों

ककसी ( डोमनी ) के गभे मे वास करताहूं १३२ उस ठोमनीके गेम वास्त करनेके समय वह चिन्ता करे लगे कि, इस डोमनीके गते नि।

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परमकः रगयःत = नकः जक ® ^

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एवद्रादङमाषास्तुनीताःरतसमोपमाः सकदाचत्रपश्रषठःश्रान्तोबन्धुवियोगवान्‌ १३० निद्राभिभतोषक्षाल्ञेनिशेष्ठःसप्तएवच तवापिङहायनीये | सदृषटवानट्तेषदत्‌ ॥\ ३१ इपशानाम्यारायेणिनदैवस्यबरवत्तया अन्यदेदेनदत्वातुगुखगुर्दक्षिणाम्‌ ३२ तदाद्रादशवषीणिटुःखदानाह निष्कृतिः आत्मानसददश्ोयपुर्कसीगभसंभवम्‌ ३३ तप्स्थश्चाप्यसाराजासोऽचिन्तयदिरदेतदा इतोनिष्कान्तपा्ोहिदानधमकरेम्यहप्‌ ३२४ अनन्त्रसनातस्त॒तदापुर्कसबारुकः इमश्ानम॒तंस्कारकरणेषुसदोदययतः ३५ प्रापततुसततमेवर्परमशानेऽथमतोद्रिजः आनीतोबन्धुभि दष्ठस्तेनतजाधनोगुणी ३६) मूल्याथिनातुतेनापिपरियतास्तुब्राह्मणाः उचुस्तेत्राह्मणास्त्विश्वापिस्यचेष्टितम्‌ ३७ पापिष्ठमुभकभेकरु त्वंपापकारक हरिशन्द्रःपुराराजाविश्वामिणपुल्कसःः ३८॥ कृतःपुण्यविनारोनत्राह्मणस्वापनाशनात्‌ यदानक्षमततेषतिःसरपोरुषातदा ॥३५॥ |

करती भँ दानधममेका आचरण करेगा” १३४ इतनेही मे क्यादेखा कि) मँ उस गस उतन्न होकर उसी जातिका कमं अथात्‌ श्षशा || नमे मृतकसंस्कार करनेको उयत रहता हं १३५ जब वह चाण्डाटके बाटकवेषमें सात वषेकी अवस्थाके हए, तव किसी गुणवान्‌ अनाथ बाहमणके | मृत देहको उसके वध॒वगे ्मशानमं ाये १३६ तब वह निन बाह्णण शब्द दाह करनेका मूल्य देनेमँ असमथ होकर उनसे अत्यन्त तिरस्कृत हए कह्ने किं, हाय ! विश्वामितच्रका क्या अशु पापमय कायं है रे पापकारक ! तु दस भकारके अशुभ कायेही करता रहता हैत पूवं जन्ममे राजा हरिशन्द था, विशा मिज्ने तुचे चाण्डाल किया है १३७ १३८ ब्रह्मस्व नाशसे पुण्य विनाश होनेके कारणदी विश्वामित्रके द्वारा चाण्डालरूपमं जन्म प्रहुणं किया जवं

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वह बाह्मण मूल्य देकर शवके दाह्‌ करनेमे समथं नरी हुए, तब अत्यन्त कोधे राजाको शाप दिया १३५ कि रे नराधम ! तू इसी समय घोर नरकमे जा नाहमणोके यह वचन करतेही स्वमद्शी राजान ॥१४०॥ देखा कि) अत्यन्त भयंकर यमदूत हाथमे फांसी ल्मि रहे ओर फिर बलपूवैक भेरी आत्मको || बांधकर छे चे है १४१ तब वह अत्यन्त खेदे ' हा माता ! हा पिता ! आज मेरी यह दशा हद, इस ति अनेकं भकारते विलाप करे रगे) उती समय |यमदुतों ने उनको नरककी तेलदरोणीममे गल दिया १४२ फिर तीक्ष्णधारवारे आसे चीरे जाकर अन्धतम नरके गिराया ओर दुःखीहुएको राद ओर रुभिरका भोजन कराया १४३ इसपरकार सात वपैतक मृत उस आत्माको चाण्डालतवम देखने खगे कि) दिनं दिनि नरकमं कीं दग्ध होता ह, करी षच्य अर्थात कोल्टूमे पेडा जाता हूं १४४॥ कभी चिन्न ओर कशी श्ब्ध होता कभी माराजाता, कभी पाडाजाता कणी सारं डलाजाता, कभी बााजाता गंच्छत्वंनरकंवोरमधुनैवनराधम इत्यक्तमावरेक्चनेस्वपस्थःसनृपस्तदा॥१४०॥अपदयघमदूतान्ेपाशदस्ताभभयावहान्‌॥ ते.गहीतमात्माननीयमानंतदा बलात्‌ ।॥१॥ पश्यतिस्मभृरीलित्नोदामातःपितरयमे एवैवादीसनरकेतेर्ोण्यानिपातितः ॥४२॥ क्रकचैपाटयमानस्तु्ुरधाराभिरप्यधः अन्धेत मतिदःखात्तःपूयशोणितभोजनः ४२ सपतवर्षैमृतात्मानंपुल्कसतवेददरोद दिनंदिनंतुनरकेदह्यतेपच्यतेऽन्यतःः॥४९॥ सिदयत्ोभ्यतेऽन्त्रमार्यतेष टयतेऽन्यतः क्षायंतेदीप्यतेऽन्यवीतवाताहतोऽन्यतः ॥४५॥ एकंदिनवषेदातपमाणंनरकेऽभवत्‌ तथावषेशतंततश्राषितंनरकेभटेः ॥४६॥ ततोनिपा || वितोभरमोविष्ठाीश्वाव्यनायत वान्ताञ्ी्ीतदग्धश्चमासमव्ेमृतोऽपि्तः ॥४७॥ अथापरृयत्वरदेदंहस्तिनंवानरपडुम्‌ छगंमिडाठकद्चगामर्विपकषि || | णेकमिम्‌ ॥४८॥ मत्स्य॑र्मवरादंचश्वाविधडकटं शुकम्‌ शारिकास्थावरांथेवसपेमन्यां देदिनः ॥४९॥ सििननभरािन प्राणिनस्तदा भप इयहुःखसन्तप्तोदिनवषेडातंतथा १५०

|ओर कशी शीत तथा वायुसे आहत होताहू १४५ वहां एक एक दिन उनके क्षम मानों सो वषंकी समान बीतने टगा इसमरकार दुःख भोगे भोगे नरकं की रक्षा करनेवाटोकि भुखसे सुना कि, उनके सौ वष उत्तरणं होगे है १४६॥ तब यमदु्तेनि उनको पृथ्वीम गिरादिया ओर उरन्हेने दिषठाभोजी कुततके हप मे जन्म छिया, फिर विष्ठा ओर वमन भोजन करते हए अत्यन्त शीतम व्याकुट़ होकर एक महीने प्राणत्याग किया १४७ किरि देला कि) भने गपेकी || योनिम जन्म छया है, इसके पीठे कमशः हाथी, बन्दर; छाग, विलाव, कक, गौ भेष, पी, कमि॥ १४८॥ मछली, कए, भरः मृगः मुरो तेते, भेन शादि | ्‌ (ओर अनमर सर्प इत्यादि नानामकाररे भ्ाणियो १४९ दिन दिन जन्म ठेताहूः इसपकार हेश भोगे वह एक दिनक सो वषकी समान अनुष्वं करे | 4

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खमे १५० इस भाति नानाभकारकी योनिम जन्म रहण करके दुःख भोगते भोगते पुरे सोवषं बीतगये फिर देखा कि; मानँ किसी समय बह पृनवार | भागी ।अप्ने कलमे जन्म ठेकर राजा हूए १५१॥ षह वहां वास करते हुए किसी समय नुभ खेलने राज्य, श्री ओर पएूत्रको हार कर अकेले वनम गे र| |`

१५२ वहां देखा कि) एकं भयंकर सिंह शरभके सहित मुख फलाय उनको भक्षण करनेके स्थि आरहा है १५३ फिर उसके दारा भक्षित होकर हा भ° < शेष्ये! इस दुःखित मनुष्यको छोडकर तुम कहां जाती ! इत्यादि भरकारसे शोक करते रते ज्योंही उयत हुए १५४ उसी समय देखा, मानो रानी रेष्या पुत्रके सहित हा महाराज हरिथन्द्र ! हमारी रक्षा करो हे प्रभो ! भपका जु सेरनेसे कया प्रयोजन दै १५५ देखो, तुम्हारी भाया शैब्या | अपने प्के सहित केस शोचनीय दशाको प्राप हुई इत्यादि भकारे विलाप करती ह, तब वह मानँ वारंवार इधर उधरको दौड, किन्तु फिर उसको नदीं देखा | एवेवषतंपणेगतंततरङ्कयोनिषु अपरयचकदाचित्सरनातत्स्वङुखोद्धवम्‌ ५१॥ त्ञस्थितस्यतस्यापिभ्यधूतेनहापितम्‌ भाग्योहताचपुत्शचसंे | काकीवनेगतः ॥५२॥ ततरापर्यत्ससिदेषेव्यादितास्येभयावदम्‌ भिभक्षयिषठुमायांतंररभेणसमनितम्‌॥५२॥ पुनश्भक्षितःसोऽपिभावीसोधितयुवतः॥ { दारेव्येकगतास्यदययमामिदापास्यदुःखितम्‌ ५8 अपर्यत्पुनेवापिभायीस्वादतपुजकाम्‌ जायस्वत्वहरिथंदरकिुतेनतवप्रभो ५५ पुत्रस्ते रोच्यर्तापराप्तोभाय्येयारेग्यया्ह सनाप्र्यत्पुनशपिधावमानःपुनःपुनः ५8 अथापर्यत्पुनरपिस्वगेस्थःसनराधिपः नीयतेसुक्तकेशीसादीनावि वसनाबसात्‌ \॥ ५७ दारावाक्यप्रमुचन्तीजायस्वेत्यसकृत्स्वना अथाप्र्यत्पुनस्तत्रधमेराजस्यरासनात्‌ ५८॥ आक्रन्दन्त्यन्तरिक्षस्थाभगच्छे हनराधिप विश्वामित्रेणकिज्ञपोयमोराजंस्तवाथेतः ॥५९॥ इत्युक्तासषैपारेस्तुनीयतेबख्वद्िभुः शराद्धदेवेनकथितंवि्वामिजस्यचेषटितम्‌ १६०॥ ततरापितस्यविङृतिनांधमोत्थान्यवद्धेत एताः सवोदङास्तस्ययाःस्वपेसम्प्रदरिताः ६१ | | | ।१५६॥ राजा हरिश्न्दरने फिर देखा कि) वहं स्वगेमं वाप्त करते है वहां वास करते करते उर्हनि देखा कि, मानां दीनवल्नहीन ओर सुरे केश रानी शेग्या किसी पुरुषे दारा बलपुवेक हरी जाकर १५७ हा महाराज ! रक्षाकरो, हा महाराज ! रक्षाकरो” कहकर निरन्तर चिष्ठाती दै उन्दने फिर देखा कि, मानँ यमदूत यम || राजके शासनम १५८ आकाशमा्गमे स्थित हुए ' हे राजन्‌ ! यमराजको आपके निमित्त विश्वामित्रजीने सूचना दी है, अत एव आप दस स्थानम आदये, यह कहकर महाशब्द करते १५९ उन्होने फिर देखा कि? यह बात कहकर मानों यमके अनुचर मे नागपाशं हृदरीतिते बांधकर ठेचरे है, ओंर यमराज ह्‌ दिश्वामित्रका चरित्र कीर्तन करते हँ १६० ययपि महाराज हरिशवन्दर दस भति नाना प्रकारकी येत्रणा भोगे थे, किन्तु तो णी उनके मनम कों अधम

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हआ \ दस भांति अनेक प्रकारकी दशा जो जो उनको स्वभमें दिखाई दी थीं १६१ जो दस बारह षके समयतक निरन्तर वरीं | उन्हेनि शोग कीं थीं बारह वष बीतनेपर जव वह यमटूतोके द्वारा बटपुवेक लाये गये ॥१६२॥ तथ उन्हनि यमराजका दशन किया, यमराजे उनसे कहा-दहै | महराज ! यह महात्मा विश्वामित्रजीके दर्निवायं॑कोपका फल है १६३ अधिक क्या ! वहे कौशिक मुनि आपे पुत्रकी शरी मत्यु सपरित कराेगि। एव्‌ आपि भनुष्य ठक जाकर रेष दुःख भोग कीनिये हे राजन्‌! वहां जानेसे तुम्हारा कल्याण होगा १६४ वहां बारह वेषं वीतनेषर खका अन्त होगा यमराजके इसमकार कहनेपर यमदूतेनि उनको आकाश से गिरा दिया १६५ वह यमखोकंसे गिरेही भय ओर भमक्शतः हाव जाग गये ओर मनम चिन्ता करने ठेगे कि, हाय ! घाव नमक ठगने की समान यह ओर क्या हभा ! १६६ स्वमर्मे निषपकार महादुःख देसे; उनकी एवौस्तास्तेनकषम्थुक्तायावद्रषीगेद्रादञ्च अतीतेद्रादशेवषेनीयमानोभवेवैखत्‌ ६२ यमंसोऽपरयदाकाराटवाचचनरापेपम्‌ .विश्वामि्स्यको

पोऽयैदुर्निवाय्योमदात्मनः ॥६३॥ पुरस्यतेमृत्यमपिप्रदास्यतिसकोशिकः गच्छरत्मावुषंलोकंदुःखरोषच्ष्ववे गतस्यतत्ररजेन्रभरयस्तवभविष्य

ति ॥६५॥ व्यततेद्रादशेवषहुःखस्यान्तेनराधिपः अन्तरिक्षाचचपतितोयमदूतेःप्रणोदितः ६५ पतितोयमरोकाचचदिषुद्धोभयतभमात्‌ अोकष्टमि

| तिष्ात्वाक्षतेक्षारवकेवनम्‌ ६६ स्व्रदुःखंमहदष्रयस्यान्तेनोपरभ्यते स्पपरेहष्टमयायचकिन्तुमेद्राद्शीःसमाः ६७ गतेत्यपृच्छत्ततरस्थानपु

| त्श स्त॒ससंभरमात्‌ नेव्युचुःकेचित्त्स्थाएवमेवापरेऽहवय्‌ ६८ शरुत्वादुःखीतदाराजादेवास्शरणमीयिवान्‌ स्वस्तिक्घवन्तुमेदेवाःशेग्यायाबार

| कृस्यच ६९॥ नमोधमायमहतेनमःकृष्णायवेधसे परावरायञजुद्धायपुराणायाग्ययायच ॥१७०॥ नमोवृहस्पतेतुभ्यंनमस्तेवासवायच एवमुक्ता | जातुुक्तःपुल्कसकमणि ७१ शावानांमूल्यकरणेपुनने ्स्मृतियेथा मरिनोनटिःकृष्णोखगुडीविहवखोनृपः ७२॥

तो सीमा नहीं है म॑ने जो स्वममे देखा) तो कया बारह वषं बीतगये है ! १६७॥ यह कह भमवशतः निकटके चाण्डाठपि पूषा उनम किसीने कहा नही तुम्हारे | || बार्ह वपे नहीं वीतं किसीने कहा वीतसकते रै १६८ तव राजा हरिन उनके यह वचन हुन अत्यन्त दुःखित चित्ते देवतारभोकी शरण हए भर || कटने ठे कि) हे देवताओं ! आप मेरा शेत्रया ओर बालक का मंगर कीजिये १६९ समैपरधान धमेको नमस्कार दै विधातास्वरूप रष्ण को नमस्कार है जो ससे पवित्र ओर्‌ अव्यय है उन पुराण पुरुषको नमस्कार ॥१७०॥ हे बृहस्पते ! तुमो नमस्कार है हे वासव तुमको नभस्कार्‌ इसषकार कहकर || राजा हरिशवन्द्र फिर चाण्डाटके कार्यरूप १७१ शवमूल्यनिद्धीरणमं निरत हए ओर फिर उसीपरकार स्मृति मटिनवेषी, जटाधारी) कृष्णवर्णं, लकुटं ||

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| घारी ओर विह्वल होगये १७२ तब भायां वा पुत्र कोदे भी उनके स्मृतिगोचर होनेके कारण उत्साहहीन | श्मशानमे वास करते १७२ इसी अवसरं उन नेन्द्की भायो अपने पु्रको जो कि सपके उसनेसे मरगयाथा जठानेके रिय उसी श्मशानं रोती हर ठेभईै। १७४ वह स्ली जो कि. अत्यन्त कश वदन) महा दुःखी विमना ओर जिसके शिरमे धूरि भररहीथी, वारंवार हा बत्स ! हा पुत्र ! हा शिशो ! कहकर रुदन | | करतीथी १७५ राजपत्नी बोरी-ह राजन्‌ \ एक बार देखो, आप पृ्वीके चन्द्रमाकी समान जिस बाटकको परिे सिते हुए देखते ये, हाय! आन आपके [उसी बालकने सके उसनेसे भाणत्याग किया हे १७६ राजा हरिशन्दर रानीकी यह विलापध्वनि सुनकर जान पडता रै, इसी स्थाने पृतक

| नैवपुत्रोनभाय्योतुतस्यवेस्मृतिगोचरे नशोत्साहोराज्यनाशा्छरश्ानेनिवसंस्तदा ७३ अथानगामस्वसुंतमृतमादायलापिनी भायोतस्थनरे | न्दरस्यसपेदष्दिवाखकम्‌ ७४ दावसहापुज्रशिरोहत्थंवेवदतीषुहुः कृशाविवणोषिमनाःपाष्वस्तरिरोरुहा ७५ राजपल्युवाच | दाराजन्नरथबारुत्वेपरयसीमेमरीतरे रममाणेपुराद्दषेपुष्टाटिनामृतम्‌ ७६ तस्यापिरापराब्दंतमाकण्यैसनराधिपः नगामत्वरितोऽ | तिभवितामृतकम्बरुः ७७ सतारोरूयतीभायीनाभ्यजानाततपाधिवः चिरवाससन्तपां एनजौतामिवाबखम्‌ ७८ सापितंचारुकेशान्तं

| श्वरः॥ १८० तस्यास्येचंद्रविवाभेसुशरुरम्यंसमुत्रसम्‌ नीला केशाःैचिताश्वसमादीवोस्तरंगिताः ८१ राजीवने्रशूर॒लोभियोष्ुटतंबृतः | चतुष्र्तुःकिष्कुदीांस्योदीषबाहुकः ८२ चतुरेखःकरोमत्स्ययवयुक्चैकपवतः रिराछपादोगेभीरःसृक्ष्मत्वकूरवटीधरः ८२

वच्च मिङेगा यह्‌ विचार शीता सहित वहां गये १७७ बहुत समयके भरवाससे सन्त हूं मानो फिरही भगहुदेके समान उस रोती हृदं अबला भायांको | नहीं पहिचान सके १७८ नपसुता शेब्यनि भी राजाको परिे मनोहरं केशयुक्त देखा था, इस कारण जटिल ओर सूस वक्षकी समान उन ॒राजाके पहिचान नेम समर्थ नदीं हई १७९ तव राजा हरिन स्के विषसे पीडित बालक को काठे पञ्चमँ लिमा भा रानरक्षणयुक्तदेखकर्‌ चिन्ता करे ठगे १८० | जिसका मुख चेदभाकी समानः सुन्दर भौ, ऊंची नापिकाः नर परवाले बाल, समान ओर दीष तरगोषाडे १८१ कमठकेते दीना आढ, चार दिशो | यमान दीर्ेभुख; ओर बदी भुजा १८२ हाथमे मत्स्य, यवयुक्त आओ पव॑त की रेखा है, गेके पीठेकी नाडी भौर चरण गभीर पटी त्वचा ओर उदर कठ

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जिवठी रेखा देख पड़ती रे १८३ हा ! इस बारकने किस राजकुले जन्म प्रहण किया रै, दुरात्मा काखने इसकी कैसी दशा करदी है १८४ अनन्तर माताकी गोदीमें सोयेदुए उस बालकको भटी भांति देखनेसे फिर उस पय्मपटाशलोचन रोहिताश्वको स्मरण किया १८५ तव वह सोचने टगे किं; यदि दुरात्मा काटने अपने वशीफत किया हो तो मेरा वह रोहिताश्वभी इतनेही दिनोंका हुभा होगा ओर यही वयोवस्था प्रा हृदं होगी १८६ इधर राजपत्नी बोटी-हा वत्स! किस पापकी अनिष्ट चिन्ताके कारण यह असीम घोर महादुःख उपस्थित हृभा १८७ हा नाथ ! हा राजन्‌! इस दुःखिनीको आश्रय देकर निष्ठुर चित्ते कहां किसप्रकार वास करतेहो॥१८८॥ एकं तो राज्यनाश इसपरभी वंधवियोग ओर फिर भायां तथा पुत्रका विकना, हा विधाता ! ते ने राजर्षिं हारथन्द्रका

अहीकष्नरेन्दस्यकस्याप्येषकुटेशिञ्जुः जातोनीतःकृतान्तेनकामप्याशांद्रात्मना ८४ एवदृष्ठाहितंबारं मातुरुत्सद्वशायिनम्‌ स्मृति मभ्यागतोवाखोरोहिताशोग्नरोचनः ८५ सोऽप्येतामेवमेवत्सोवयोऽवस्थामुषागतः नीतीयदिनवोरेणकरृतान्तेनात्मनोवश्चम्‌ ८& राजपल्युवाच दावत्सकस्यपापस्यभपध्यानादिदंमहत्‌ दुःखमापतितंवोरंयस्यान्तोनोपरभ्यते ८७ हानाथराजन्भवतामामनाश्वास्यदुःखि ताम्‌ कापिसन्तिष्ठतास्थनिविश्रन्धंस्थीयतेकथम्‌ ८८॥ राज्यनाशःसुहत्यागोभास्यांतनयप्करियः इरिशन्द्रस्यरजेःकिविधेनङृतेत्वया ॥८९॥ इतितस्यावचःश्रुत्वारानास्वस्थानतश्युतः प्रत्यभिन्ञायदयितांपुंचनिधरनेगतम्‌ १९० केषानामगरेयुक्ताममयोषिद्रराभवेत्‌ बाङशथसपृतः कःस्यादितिरानाविचारयन्‌ ९१ कष्ंग्येयमेषादिसबाखोऽयमितीरयन्‌ ररोददुःखसन्तपोमूच्छोमभिजगामच ९२ साचतंप्रत्यभिज्ञायतामव स्थामुपागतम्‌ मूच्छितानिपपातातीनिशेष्ठाधरणीतरे ॥९३॥ यचेतःतंपराप्यरनेनद्रोरनपत्रीचतोसमम्‌ विडिपतुःसुसन्तपतोरोकभारातिपीडतो ॥९४॥

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क्या स्वेनाश नहीं किया १८९ राजा उसका यह वचन सुन, स्री ओर मृतकं पुत्रको पटिचान स्वस्थाने निपतित हए १९० यह किसकी धरी है क्या यह मेरी भायां है ! ओर यह ` मृतक बाठकं कौन है ! इसप्रकार राजा विचारने ठग ओर व्याकुल हृए १९१. हाय ! क्या कष्ट है ! यही वह शैब्या ओर यही तो वह बाखक है इसभकार करते कहते अयन्त दुःखत सन्तप्हो रुदन करने रुगे ओर मृच्छितहोकर पृथ्वीप्र गिरे १९५२ रानी शेब्या भरी इसभकार अवस्थान्तर भप्त राजाको पहिचानकर मूच्छित है एवं आत्ते ओर निशे होकर पृथ्वीम गिरगदं ॥१९३॥ फिर कुछ समयके पीछे राजा

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इरिथन्द्र ओर रामी शेव्या दोन चैतन्यहेकर भोकारसे पीडितो अत्यन्त विप करने रुगे १५४ राजा बोटे-हे वत्स ! तुम्हारे वह रुन्दरनेष

| दनो नुसिका ओर अलकंसि शोभायमान सुकुमार वदनको इसभकार मरिन भेरा हदय क्यो विदीणै नही होता! ९५ हा! मर स्वरसे |८ तात ! तात ! ? कहता हृआ भेर निकट अव कौन आविगा ! ओर अव किसको ेहसहित गोदी ठेकर वत्स ! वत्स ! कहता , हभ कारगा ! | १९६॥ अब किसकी जानुमे लगी हृद धूरिसे मेरा इषट़ा ओर अंग भेटा होगा ! १९७ हाय ! तुम मेरे अंग प्रतयगसे उतयन्न तथा मन ओर हदयके आनन्द | जनक होकर भी इस कपिताने तुमको सामान्य वस्ुकी समान बेचा था ॥१९८॥ हाय ! देवरूपी दष्ट सर्षने मेरा महत्‌ राज्यः साधन ओर धन समस्तही हरण करके | राजोवाच हावत्ससुक्मातिस्वकषिष्नापिकालकम्‌ पयतोमेष॒संदीनेहदयकिनदीयेते ॥९५॥ तातततितिमधुरहवाणंस्वयमागतम्‌ उपगुद्यवदि | | प्येक॑वतसवत्ेतिसोहदात्‌ ॥९६॥ कस्यनातुपरणीतेनपिद्वनकषिरिरेणुना॥ ममोत्तरियमुतसङ्गतथा्॑मरमेष्यति ॥९७॥ जब्गमतयङ्गसम्धूतोमनोडदयनन्द्‌ | नः मयाकुपित्राहावत्सविकरीतोयनवस्तुवत्‌ ॥९८॥ इत्वारन्यमहषमेसवांधवधनमदत्‌ देवाहिनानृरसेनदष्टोमेतनयस्ततः ५९ अैदेवाहिदष् | स्यएवस्याननपङ्कनम्‌ निरीकषत्रपिषोरेणपिषेणान्धीकृतोऽधुना २०० एवसुकतातमादायवारकबाष्पगहदः परिष्वग्यचनिश्ेष्टोमृच्छया

| निपणातह राजपल्युवाय अथेसपुरुषव्याघःस्वरेणेोपरक््यते विद्रननमनशचन्रोहरिशन्द्रीनसंरयः ००५५. - तथास्यनातिकातुङ्गाभग्रते | ऽपोध्वंगता दन्ताश्वय॒कुरुप्ल्याःख्यातकीत्तमेदात्मनः इमशानमागतःकस्मादेषसनरेश्वरः अपहायपुतरशोरकपापरयः ४॥

| अन्तये तुम सरी पुत्रको भी हसा ॥१५९.॥ हाय! देवरूपी सेके उसे इस पुत्रका मुखकमल देखे देखते मं भी भव भयंकर विषे अंधा हुभा ह॥ २० ०॥ राजाने बाष्प गृहरद स्वरसे इसभकार कह, उश वाटकको ग्रहण कर गोदे ठेिया ओर तत्काल मृच्छौसे चेष्टदीन हो पृथ्वीम गिश्गे २०१ राजपत्नी बोटी-स्वरके द्वारा | जानाजाता है कि, यही वह पुरुषसिंहं विद्रलननेकि मन ॒सिटानेको चन्द्रमा राजा हरिथन्द्र इस्म सन्देह नह २०२ उनकेही समान इनकी भी नासिका की भौर अग्र्यम अपोभख हृई है उन स्यातकीरिं महात्माके समान इनके दातोकी पककिभी मुकुल (कठी ) की सश है ॥२०२॥ किन्तु वह राना हरथ्‌ आज श्मशाने क्या उपस्थित है यह कह रानी शेग्या पएत्रशोकको त्याग मूषित भवस्थामं पडेहए पतिको देखनेटगी २०४ |

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।उस्‌ दुबठे अगवाटी दीनवदन आश्वयेयुक्त हुदै राजमहिषी शेब्याने स्वामी ओर पुत्रजनित मनकी पीडासे पीडित हो इधर उधर देखते देखते स्वामीका वह मिन्दनीय चाण्डाल ||‡ | दण्ड देखा २०५ भँ चाण्डाठकी पत्नी हई" कह कर वह दीधेनेत्रवाटी रानी मोहको भाप हुई फिर धीरे धीरे चैतन्यता लाभ करके गदर स्वरसे कहने ठगी | २०६ रे नृशंस मयादहीन ! निन्दितदेव ! तुद्चको विहार है तमे इन देवताकी. समान अमरपतिको चाण्डाटपना दिया है २०७ राज्यनाश, | सुहदत्यागः भायां ओर पृत्रको बिकवाकर भी शान्त नहीं हभ, अव चाण्डाठपेनेको प्राप्त कृराया है २०८ हा राजन्‌ ! इस भकार सन्तापमें परी मुज्ञको पृथ्वीसे उठाकर आज पटँगपर बेटो' क्यों नहीं के ! २०९ हाय ! आन आपका वह छत वा शगार क्यों नीं दिखा देता ! आन आपका | वह चामर कहां हे ! वह पंखा कदां है! हाय ! देवकी याही विपरीतता है॥ २१०॥ परहिठे जिनके गमनकालं राना ठोग प्यके समान अपने दष्टेसे पृथ्यीकी | प्रष्टविस्मितादीनाभरेपुजाधिषीडिता वीक्षन्तीसाततोऽपरयद्धतरदण्डंनगुम्तितम्‌ शपाकारैमनोमोनगामायतटोचना प्ाप्ययेतश्वरानकैः

| सगद्रदमभाषत पिक्त्वदिवात्यकरुणंनिेयोदंलगुम्मितम्‌ येनायममरपस्योनीतोरानारवपाकंताम्‌ ७॥ राज्यनाराुहत्यागेभायौतनयवि

| कयम्‌ प्रापयित्वापिनोक्त ्ण्डाङोऽृतोनृपः दारानभाततन्तापामित्थंमांधरणीतलात्‌ उत्थाप्यनाधपयेङ्कमारोदतिकिषुच्यते | नायपर्यामितेच्छ्शद्धारमथवापुनः चामर्यजनंचापिकोऽयविधिविपयंयः २१० यस्यमित्रनतःपरमरानानेोमत्यतांगताः स्वोत्तरयेरङुवैन्तनी | रजस्कंमरीतलम्‌ ११ सोयंकपाठमंरग्रवटीषटनिरन्तरे मृतनिमोल्यसुतान्तगरढकेशेसुदारणे १२ वसानिष्यन्दसंशुष्कमरीपुटकमण्डिते

| भस्माद्गाराद्वदग्धास्थिमनातेषट्भीषणे १३॥ गधगोमाय॒नादात्तनषशुद्रविरंगमे विताधूमायतिरुचानीीकृतदिगन्तरे १४ कुणपास्वाद

| नयुदासंपरष्टनिराचरे चरत्यमेध्येरानेनद्रःशमरानिदुःखषीडितः १५

धरि हटाते थ; वही यह राजा हरिथन्द्र आज असह्य दुःखंस पीडितहो एसे भयंकर अपवित्र श्मशाने अकेठे विचरण करते २११ जहां मृतकेकि कपाठसि मिटे हये घट ओर छोटे घडंमि चारों दिशा. परिपूर्णं हृदं है गरतकोफे निमांल्य भूत्रके भीतर बहुतसे केश पडे रहनेसे जो अत्यन्त दारुण हृभा है॥ |॥ २१२ मृतकोके देहसे टपकतीहुई वक्षा ओर बहुत सारे मूसे काष्ठसे जिसकी चारो दिशा व्याप्त दै, भस्म, अंगार) अदद अस्थि ओर मजला इनं सवके | होनेसे जो अत्यन्त भयंकर हआ है २१३॥ छोटे छोटे पक्षी, गृभ ओर गोमाधुके शब्दको सुन जि स्थानसे भागते चिताके उठतेहुए धसि निसकी दिशा

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विदिशा गीटी होई ई॥२१४॥ ओर निशाचरगण मांसके भक्षण करनेसे भानन्दित होकर जिसमे इधर उधर भमण के है; उसी स्थानम इह राजेनद्र हरिभन्द्र

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दुःखे पीडित हो अकेठे विचरे हैँ २१५ नृपसुता शेग्या इसप्रकार कह राजाके कैठसे लिपट कष्ट ओर सेक शोकका आभधारखरूप हो वचनों विलाप करने लगी २१६ राजपत्नीने कहा-हे राजन्‌ ! जो देखती हू, यह क्या स्वम दहै वा सत्य ! आपको जो ज्ञात हो सो किये हे महाभाग ! मे तो मोहसे विचारशक्तिहीन हृदं ॥२१७॥ हे धर्मज्ञ! यदि यह सत्य हो, तब धर्मेकी तो सहायता नहीं, तथा देवता ओर बाह्मणके पूजनसे भी फल नरी अथवा प्रथवीका पाटन करनेसे ही क्या फल है २१८ अत एव धर्म नहीं, सत्य नही, सरलता नहीं ओर ॒सदयताकी तो बातही नहीं है, क्योकि केषटमात्र धर्थही अापका प्रम बट है, किन्तु तो भी अपने राज्यसे च्युत हृए २१९ राजनन्दिमी शेभ्याके यह वचन सुनकर राजाने उष्ण श्वास छोड्‌ अपने चाण्डालपनेके प्राप होनेका यथावत्‌ वृत्तान्त गद्रद स्वरसे कहा २२० तव रानी शग भी उनका वृत्तान्त सुनकर दुःखिपेचित्तरे बहुत देरतक रोदन किया ओर ठम्बी एवयुक्ासमाषिष्यकण्ठराज्ञोनृषात्मना कष्टरोकशताधाराविरुखापात्तेयागिरा ॥१६॥ रानपल्युवाच राजन्स्वप्रोऽथतथ्यवायदेतन्मन्यतभवान्‌ तत्कथ्यतांमहाभागमनोवैषह्यतेमम १७॥ यथतदेवैधमज्ञनास्तिधमसदायता तथेवविपरदेवादिपूननेपारनेथुवः १८॥ नास्तिधमेःकुतःसत्यमाने वंचानृशेसता यतत्वंधमैपरमःस्वराज्यादवरोपितः ॥१९॥ इतितस्यावचःशरुत्वानिःश्वस्योष्णंसगद्रदम्‌ कथयापासतन्वेग्यायथाप्राप्तावपाकत्‌ा॥ २२०] रुदित्वासापिसुविरंनिःश्वस्योष्णचदुःखिता स्वपुजमरणंभीरुयैथावृततन्यवेदयत्‌ २१ शुतारजातदावाकय॑निपपातमदीतडे मृतस्यपएरस्यतदा निह्वयारेटिदन्युखम्‌ ॥२२॥ नोवाच यमस्यभिकषांयाचा्वकृपणोपुञगदिनो तस्माच्छीभवनवोयुपएतरोयनरगरियोगतः २२॥ प्रिय नरोचयेदी्विकारुञ्रासुपाितम्‌ नात्मायत्तचतन्वद्गिपश्यमेमन्दभाग्यताम्‌ २४ चण्डाठेनाननु्ञातप्रवेकष्यन्वर्नेयदि चाण्डर्दापता यास्येपुनरप्यन्यजन्मनि २९५ नरकेचपतिष्यामिकीटकः कृमिभोजनः वेतरण्यांमहापूयवसाक्सायुपिच्छरे २६ श्वास ठेकर निसपकार रोहिताश्वकी मत्य हृ थी, वह सब वृत्तान्त उनसे आनुपूिकं निवेदन किया २२१ राना हरिथन्् रामी शेम्याके यहं वचन सुनकर पृथ्वीम गिरगये ओर मरेहुए प्रका मुख जीभसे चाने गे॥ २२२॥ राजा बोठे-हम दोनों कपण एत्रके ठोभी यमसे शिक्षा मा. अव शत्र नहा भिय पुत्र गया ह, वहां चर ॥२२३॥ हे भिये ! अव बहुत काठतक डश सहनेकी इच्छा नहीं करता, किन्तु तलङ्गी ! देखो, पा मंदभाग्हूं कि, भती भाता भेरे अधीन नहीं है २२४ यदि षिन बाण्डालकी आज्ञाके अविमं भवेश करू, तो फिर दररे जन्म चाण्डालका दास्‌ होना पडेगा २२५ अथवा मि खानेवाला कीड़ा होकर नरके गिरना होगा वा वैतरणी या पीवः वा रक्त ओर नतकी विकनादते यक्त नरकं यत्णा भोगनी पेम २२६

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अथवा असिषन्र बमम जाकर दारुण छेदन करनेकी येरणा भोग ॒करुगा या महारौरव वा रोर नरकमे दुःसह ताको प्राप हूगा २२५ नो दुमखरपी||ई समुद्रम -दबत। हो, केवलमात प्राणत्यागही उसकी पार भरमि है देखो मेरा जो एक बाठकं वैशका वदनिवाटा था २२८ वह भी बलवच्‌ दैवरूपी नठमे|| | हृ गया इधर असीम द्गति भोग रै, पराधीन हनेके कारण प्राण कैसे त्याग २२९ अथवा आतपुरषको पापके भरति क्या देखना रै !र|| ९, वियोगे जिसभकार असद्य दुःख है, तिथ्योनिमे, असिपत्र वने २३० वापैतरणीमम ्ी वैसा दुःख नहीं है, भत एव भे पदे संग नठती इदं अग्निमं॥ २२१॥।२ | गिरूगा हे तन्वङ्गी ! भने तुम्हारे निकट जो अन्याय आचरण किया है, वह सव क्षमाकरो हे शुचिस्मिते ! तुम मेरी आज्ञासे उसी बाह्णके षर चरीनाभो २३२ है|

असिषजवनेपराप्यकेदपराप्त्यामिदारुणम्‌ ताप॑प्राप्त्यामिवाप्राप्यमहारौरवरौरयो २७ मग्रस्यदुःखनरोपारःप्राणवियोजनम्‌ "॥ एकोऽपिबालकोयोय |‡ | मासीदरकरःसुतः २८॥ ममदेवाम्बुवेगेनम्नःसोऽपिबरीयसा .कथंप्राणान्विसुंचामिपगयततोऽस्मिदुगेतः २९ अथवानातिनाषकिष्टोमरःपापगवे ||२। षते. तियक्तेनास्तितडःखंनासिप्रवनेतथा २३० वैतरण्यांङतस्ताटग्यादरपुत्रविषवे सोऽ्दसुतसारीरेणदीप्यमानेहतारने ॥.३१॥ निष |३ तिष्यामितन्वद्गिसन्तव्यडकृतंमम _ अतज्ञताचगच्छत्ववपेदमडयचिस्मिते २२ ममवाक्यंचतन्वद्गिनिबोधाहतमानसा यदद्तयदिहतं | शुरवोयदितोषिताः ३३ परतरसद्गमोभूयायुतरेणसहचत्वय इदरोकेकुतस्तवतद्भविष्यतिममेद्गितम्‌ २४. त्वयासहममभ्रयोगमनंपुतमागेणे ॥|ई | ` यन्भयाहसतारकिचिद्रस्येवानिस्मिते ३५ अभ्टीरमुक्त॑तत्सवैशन्तव्यंममयाचतः.॥ ाजपतीतिगवेणनावज्ेयःसतेदविनः सवेयतेनतेतोष्यःस्वामी ¢ | देवतकच्छुभे ३६ राजपल्युवाच अहमप्यवरानपेदीप्यमानेहुताराने दःखभागसहायेवसहयास्यामिवैत्वया २७॥ [4 पुनजन्ममे मिटगा, अव इस लोकम भरे इस अभिपायके सिद्ध होनेकी सावना नरी है॥ २२४ अथवा भेरे संग तुञ्चको भी पुत्रके मागंका अनुसरण | { | करना चाहिय रे शुचिस्मिते ! चैने हास्यके मिस निर्जन भी २३५ कछ अश्टीर कहा हो, भाथना करता सव कषमा कना ठुम रानषानी| 4

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तन्वङ्गी ! जो कहता सो आदरयुक्त मनसे सुनो यदिरभे दानकियाहै वा होम किया दै अथवा यदि गुरुननको संतुष्ट किया है ॥२३३॥तो पुत्र भौर रेरे संग, होगेके मर्थसे उस ब्राह्मणका .निराद्र नहीं करना हे शुभे ! स्वामी वा देवताकी समान उसको अतियलसे संतुष्ट रखना २३६ राजपत्नीने कहा-हे राज !॥| | ` 6 | |

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मे भी अब यह दुःखभार नहीं सहसकती इस कारण अब इस जलतीहुरे अभि मेँ ही आपके संग चटृगी २३७ वहापर

थानमे रहकर स्वगे वा नरक भोगे रानीके यह वचन्‌ सुनकर राजा बोटे-हे प्रतिव्ते ! अच्छा यही करना २३८ पमो जापज पी हरिथनद्रने चिता बनाय, अपने पुत्रको उसके ऊपर रख ॒भायांके सहित हाथ जो ज्योही २३९ परमात्मा, ईश, वासुदेव, सुरेश्वर, प्रब्रह कृष्णवर्णे) पीताम्बरधारी, शुभभद, हत्कोटरगुहावासी, अनादिनिधन) नारायण, हरकी चिन्ता करी २४० चिन्ता करतेही उसी समय इन्द्रादि देदता पको आगे करके शीघरतासहित उस्‌ स्थानम आये २४१ वह सब आनकर कहने ठगे-हे राजन्‌ ! सुनो यह साक्षात्‌ ब्रह्मा यह साक्षात्‌ भगवान्‌ धर्मं २४२

धः ओर

|ओर॒साध्यगणः _ विश्वदेवाः मरद्रण सव लोकपाल) नागगणः सिदधगण गेवोके सहित रुदरगण, दोनों अश्विनीक्मार २४३ ओर अन्यान्य | सदस्वगैचनरकंसुहेवाबादियु्वे शत्वारनातदोवाचएवमस्तुपतित्रते मलिन ३८१ ॥२८॥ . पक्षिणउचुः॥ तत्‌ःकृत्वायितांरानाभरोप्यतनयस्वकम्‌॥ भार्ययासहितःथासोबद्धांनरिपुरस्तदा ३९ चिन्तयः हत्कोटरगहासीनंासुदवसुरे्वरम्‌ अनादिनिषनत्रह्मृष्णं

| पीताम्बरशुभम्‌॥ ४० तस्यचिन्तयमानस्यसवदेवाःसवासवाः धरमभरुखतःकृत्वा्मानग्ुस्त्वरन्िताः ॥४१ आगत्यसो्स्तभोभोरान्शृु | भमो अर्यपितामहम्साकादमेनचभगवान्स्यम्‌ ४२॥ साध्याश्विन्वेमर्तारोकपाराःतचारणाः नागािद्ाःसगन्धवीरग्रभेवतथाभिनो ४३॥ एतेचान्येचवहवोविधामियस्तथेवच विश्चजयेणयोमिनकरैवेनारकत्परा 9९॥ विधामिनस्ततमेीमिष्टचाहतैमिच्छति आर्रोहततःप्ा पोषमेःशकोऽथगाधिनः ४५ धमेउवाच माराजन्सादरंकाषीधैमोऽदत्वाएपागतः तितिकषादमसत्यायेःस्वगुणःपरितोषितः ४६॥ | इनद्रउवाच्‌ दरि्न्दरमहाभागुपा्तःरक्रोस्मितेऽन्तिकम्‌ त्वयासभायो त्रेणनिताटोकाःसनातनाः ४७॥ आरोहनििवंरानन्भायोपु्समनितः | सुदुष्प्रापंनरेरन्येनितमात्मीयकमेभिः ४८

(सब देवता? सभी अपने अपने वाहनसहित आये हँ ओर जो तीनों विश्वके संग मित्रता नहीं कर सकते वह विश्वामित्रधी स्वयं उपस्थित है २४४ [सबही आपके संग मित्रता ओर इष्टता ` रने आये हँ तदनन्तर धरम इन्द्र ओर विश्वामित्र यह तीन जने उठकर राजाके निकट आये २४५ प्रभे कटा- हे राजन्‌ ! एते साहतिके कासे विवृत्त {-जेये, मे हू. तितिक्षा, दम ओर सत्य इत्यादि अपने गुणेति आपने गुञ्चको संतुष्ट किया है) मं स्वयं आपके निकट आया हं २४६ इन्द्र बोटे-हे महाभाग! हरिथन्द ! इन्द्र ह, ओर आपके निकट आयाहूं आपने भायां ओर पुत्रके सहितं सनातन सब लोकोको जीता रै

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| २४७ अत एव जो दूसरे मनुष्यको द्भ है उसरी अपने कर्मे जतिहुए स्वममें भायां ओर पुत्रके सहित आरोहण करो २४८ ||{

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पक्षी बाे-रिरि चिता स्थान जाकर प्रभु इन्द्रे अपमृत्युविनाशक अमृतकी वषा करी २४९ तव देवताओंनि वतमान सन्नाम फूल व्रसये ओर देवदुन्दुभी बजने र्गी २५० अनन्तर उन महात्मा राजाका सुकुमार अंगवाला पुत्र रोहिताश्वभी स्वस्थ ओर प्रसननेन्दिय मन होकर वेढा २५१ फिर राजा हरिशवन्द्र क्षणकाल पुत्रको आिगनकर दिव्य वच्च ओर माल्य धारण किये भायांके सहित शोभा पने लगे २५२ ओर भटी भोति स्वस्थ होकर अत्यन्त आनन्दितं हए? तव सुरपति इन्द्रे उनसे फिर कहा २५३ हे महाभाग ! आप भायां ओर्‌ पुरक सहित परम सदत प्राप्त केरे, अत एव अपने क्मैफठसे स्वर मे निवा

[अ ४.६

करो २५५४ हरिश्वन्द्र बोठे-हे देवराज म॑ प्रषु चाण्डाटकी अनुमतिसे बिना छुटकारा पाये स्वगं मं नहीं नाऊगा २५५ र्भ कहा हे राजन्‌

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पक्षिणञ्खः॥ ततोऽमृतम्यवरषमपमृत्युविनासानम्‌ इनद्रःपरासृनदाकाशाचितास्थानगतःप्रभुः ९९ पुष्पर्षचसुमहदेवडन्द॒भिनिः स्वनम्‌ ततस्ततोवतंमानेसमाेदेवसंकुे ५० समृत्तस्थोततःपुवोगज्ञस्तस्यमहात्मनः स॒ुकुभारतवःसस्थःप्रषत्रनदियमानततः ५१ ततोरानाहशिशद्र सभाय्यःसुन्रियायुक्तोदिव्यमाल्याम्बरान्वितः ॥५२॥ स्वस्थःसम्पणेददयोधुदापरमयायुतः वभृवततक्षणादिन्धोभूयशेनमभाषत ^२॥ सभायत्तसपुनशचपरप्त्यसेसदरतिपराम्‌ समरोदमहाभागनिजानांकमंणांफठेः॥५४॥ इरिशचदडवाच॥ देवरानानलन्ञातःस्वापिनाश्वपचेन अगत्वानिष्कर्ितस्यनारोकषयऽदसरारयम्‌ ५५ धमेउवाच तवेनंभाविनेञेरमकवगम्यात्ममायया आत्माश्वपाकरतानीतोदरितंतचचचापटम्‌ ॥५६॥ इन््रउवाच भराथ्येतेयत्परस्थानंसमस्तेमेननेभुवि तदरिदहसिथन्द्रस्थानपुण्यक्ृतंतृणाम्‌ ५७ दसिथिद्रउवाच देवराननमस्तभ्य॑वा कयचेत त्रिवोयमे प्रसादसुसुखंयत््ातरवीमिप्रश्यान्वितः ५८ मच्छोकमय्रमनसःकोसलानगरेननाः तिष्नि न्तितानपेद्या्यकथंयास्याम्यहंदिवम्‌ ५९

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भने आपका इसप्रकार भावी समज्ञकर अपनी मायासे चाण्डालका दप धारणपृवेकं रसा चाण्डाटपना दिखाया था २५६ इन्द्र बोटे पृथ्वीके संपूण मनुष्य जिस परम स्थानम जनेके लिये सदा भाथना करे है हे हरिथन्द्र ! पण्यकरनेवाले मनुष्यादिकोके उसी स्थानम जाथ २५७ हरि न्द्र बोटे-हैः देवराज ! आपको नमस्कार है, मेँ नम्रतपर्ैक प्रसन्न हूए आपसे जो कहताहू) सो सुनिये २५८ कोशल नगरके संपुणे मनुष्य मेर शोकमें मथ मन होकर वहां वास करते मँ उनको छोडकर किंसभकार स्वम नाङं २५९

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बहहत्या, मरुहत्या, महत्या, वा खीहत्या करनेसे जो परप होता है) भक्तका व्याग करनेसे ५; पा होता ०॥ जो मेरे भक्त है ओर सदा मेरा भजनं |

| उनको छोडनेसे इस रोक वापरटोक मेक्या सुख है अत एव हेशक्र ! आप स्वगेको जादे ॥२९१। है दवता द्र ! यदि पह भी मेरे संग स्वभे { | | जाय तो भी स्वरम नासकता हं नदीं तो उनके संग नरकमेही रहंगा॥ २६२॥ इन्द्ने कहा-हेराजन्‌ ! उन्हीनि अनेकं भरकारके पृथक्‌ पृथक्‌ पाप पुण्य किये हतो फिर||१।अ०

उने संग आप किस पकार स्वम ना सकतेरै॥ २६२॥ हरिशवन्द्र बोठे-हेशक्र !राजा कुटुम्बियां के प्रभावसेरी राज्य भोगता हैतथा महा यज्ञसाधन ओर वापी कूषादि ||

निमण करतारै॥ २६४ मेने जो कुठ धर्मकायका अनुष्ठान किया हैवह सव*उन ठोगोँ के प्रभावसे अत एव सामान्य सग॑के लाटचसे उन उपकारि्योको नहीं छोड ्हमहत्यायुरोषौतोगोवधःस्ीवधस्तथा तर्येमभिमेहापाभक्तत्यागेऽप्युदाहतम्‌ ॥६० भनन्तभक्तमत्याज्यमदषठत्यनतःसखम्‌ नेदनासु्रपर्यामित स्माच्छक्रदिरव्रन ६१ यदितिषिताःस्कीमयायान्तिसुरेर ततोऽहमपियास्यामिनरकंवापितेःसह ६२ इन्द्राच वहूनिपुण्यपापानिते

पामित्रानिविपथक्‌ कथंसंवातभेग्यंतभूयःस्वगेमवाप्स्यसि ॥६२॥ हरिश्द्रउवाच स॒करथुकतनृपोरायप्रभवेणकटुम्विनाम्‌ यनतेचम्हायत

केपोत्तैकरोतिच ॥६४॥ तच्तेषाप्भवेणमयावैमयुष्टितम्‌ ।। उपकर्रसन्यक्ष्येतानदंस्गेटिप्सया ६4 ॥तस्मायन्ममदेवेाकै विदस्तसुचेष्ितम्‌॥

दत्तमिष्टमथोजपंामान्यतेस्तदस्तुनः॥ ६६ बहुकाटोपभोग्यंदिफटेयन्पमकमेणः तदस्तुदिनमप्येकतेःसमततसरपतादतः ६७ कषिणजः

एवेभविष्यतीत्युक्तारकश्चियुवनेश्वरः परसत्नचेताधमश्विधामित्रश्चगाधिजः ६८ गत्वाशुनगरसवचातवण्यसमायुतम्‌ ₹्मत्स्याितिततूतच

विबुधाधिपः ६९॥ आगच्छंतुजनाःशीघरस्वगेरर्केसदुरभम्‌॥ धमेप्रसादात्सपासवयष्मामिखत्‌ ॥७०॥ विमानका(सम्दवस्कालकान्मरातरम्‌॥

गत्वायोष्याननेप्राहदिविमारुद्यतामिति॥ ७१ रू २६५ मेनेजोकृषपुण्य किमाह ओर नो कुछ जय वा दान किया हे) वह्‌ सव उनके सहित समान हो २६६ जो भर कमेका फल बहुत समयतक भोगने योग्य हो, आपके प्रसादे वह उनके संग एकही दिनम्‌ भाग करं २६७ पक्षी बोटे -है जिन होगा ` भ्र तीनां भवनके श्वर इन्द्र ओर प्रसन्नचित्त धमं तथा गाधिनन्दन विश्वामित्रनी ॥२ ६८ सवने उप नगरम्‌ जाय च्‌ वणक लोकि ह्रिश्न्दरकै सहित कराय इन्द्रे कहा २६९ हे मतुप्यो ! भाओ तुम सवने जो परमके भरसादते दी सगंटोक पराप किय वह चा करदं विमान परटोकमे आये भीर अयोध्यावासि्योमि बोटे किः सगं चलनेके निमित धीवरी विमारनोपर वेगे २७१

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फिर गाधितनय महातपा विश्वामित्रजीने राजाको भसन करके टिम देवराज इन्द्रका वचन सुन रोहिताश्व को खाय॥ २७२॥ मनोहर अयोध्यानगरीमें राजपुत्रको अभिषिक्त किया, तब भयोध्यावासी हृष्ट पुष्ट बेधुगण सबनेही सिद्ध मुनि ओर देवतांके सहित राजाको अभिषिक्तं करः, भार्या, पुज ओर सेवको मिठितहो राजा हरिन्द्रके सहित स्वगे मे गमन किया॥ २७२।२७४॥ उस्‌ समय वह पग पग मे एक विमाने दूसरे विमानप्र जाते थे.उस काट राजा हरिशन्द्र भी अत्यन्त प्रसन्न हुए ॥२७५॥ ओर विमान मँ चदृने की अतुल विभूतिको भाप ओर बलयाकार परकोरेसे युक्तहो स्थिति करने लगे॥ २७६॥तव संपूण शा्चोका तरव जाननेवाठे शैतयोके आचाये महाभाग शुक्राचायेने राजाका रसा रश्वयं देखकर यह श्टोक गाया २७७ शुक्र बोठे-जगतम हरिशवन््रके समान दुसरा राजा हुभा ओर

तदेन्द्रस्यवचःशुत्वाभीत्यातस्यचश्रपतेः॥ आनीयरोदिताशवंचविश्वामित्रोमदातपाः ७२ अयोध्याख्येपुररम्येसोऽभ्यधिचन्नपात्मनम्‌ देवेशवयुनिभिः

सिद्धेरभिषिच्यनराधिपः ५५७०० ७२ राज्ञासहतदा्वहषपुष्टसुदनाः सपुत्रभृत्यदारस्तेदिवमारुरुहुेनाः ७४ प्ेपदेविमानाततेषिमानमगमं

रः तदारतभूतषासोहरिशदरथपानिवः॥ ७९ संप्ाप्भूतिमत॒लांविमानेःसमहीपतिः आसांचक्रे पुराकरेष्रपरकारसतृते ७६ ततस्तस्य्िमा

खोक्यशकतेारनाजगे देत्याचार्यमदाभागःसवेशाघ्ाथैतत्ववित्‌ ७७॥ शुक्रउवाच हरिद्रसमोराजानभूतानभविष्यति यश्रतच्छृणुयाद्रत्तयानैरन्त्ैणमानवः १, ७८ तेनवेदाःपुरणानिसवेंनाःसुपंगहाः पृष्टास्युःपुष्करेतीर्प्रयगेसिन्धुसागरे ७९ देवागा “न विषुवद्वदणेचेवयत्फटंनपतोरभेत्‌ २८० तत्फरुद्वियणंचेवसंयतात्माश्ृणोतियः शुत्वातुपूनयेद्रक्तयापुराणहं

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आगेको होगा जो तितिक्षा ओर दानके फरुसे अपने नगरवासियों सहित स्वगं मं गये जो मनुष्य इन राना हरिषन्द्रकी कथाको भकतिसहित सुनेगा॥२७८॥ वह दे || पुराण ओर सब मंोके फलको भाप होगा जो पृष्कर, याग, सिंधुसागर, देवाटयः कुरुक्षेर ओर काशी इस कथा का पाठ करेगा उसके विशेष-फल होगा || $ विषुवती ( विखोती ) ओर ग्रहणम जो जप करका फल होता है २७९ २८० उसुते दना फल जितेन्द्रिय होकर इसके सुनेसे होता है ओर || यह्‌ कथा सुनकर पुराण . जाननेवाछे बाह्मणशरष्ठको संतुष्ट करे .८१ ||

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(4 डे जेमिने उसको गोमि सवणव ओर अन्न दे जो इससे पुण्य होता उसे भँ नरीं कहसकता॥२८२॥ अहो ! तितिक्षा ओर दानका वडा फृठ जिसके प्राक्स ||

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| हरिभनद्रदन््रत्वको भाषो नगरीनिवाियोसहित स्वर्ममे गये॥ २८२ ॥पकषी बोरे-ेमुन!इसमकार यह आपके निकट हरिथन्द्रका सव वृत्तान्त पणेन कया इसके नेसे दुःखारं भनष्यको महासुस प्राप होतादै॥२८४॥ खगंकी इच्छा करने वाको स्वगेपुतरकी अभिलाषा करनेवाटेको पत्र, भायाकी कामना करनेवाले के भार्यां ओर राज्य |का आकांक्षा करनेवाले मनुष्यको राज्य मिरताहे॥ २८५।।हमनिस्म ! अव प्वक्षपका कारण राजसुय यकञका विपाकं ओर उस विपाक के कारण महत्‌ आिवकं |

| नोपहिरण्यवदधतयेवातिननेमिने येनवयतकतंपण्यतच्छक्यनमयोदिहम्‌ ८२ अदोतितिक्षामाहात्यमोदानफंमहत्‌ यदागतोहरिशदः

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| `पुरीचेन्धत्वमापवान्‌ ॥८२॥ पक्षिणउल्ः॥ एतततेसवैमाख्यातंहरिःदरविचेषटितम्‌ यःशृणोतिसुदुःलाततःसषसंमहदाधुयात्‌ ८४ स्वगौ | प्राघ्रयातस्वीपुत्ाथीएजमा्यात्‌ भायोरधीपाधुयाद्धायीरान्याथाराभ्यम्यात्‌ ८५ अतः परंकथारोषःश्रयतांुनिसत्तम विपाकोरानभूयस्यपुथि | | वीक्षयकारणम्‌ तद्विपाकनिमित्तचयद्रमािवकेमरत्‌ २८६ इति श्रीमाकंण्डयपुरणेहरिशदोपास्यानंनामा्मोऽप्यायः ८॥ पक्षिणउदुः॥ | रान्यच्युतेहरिशवन्द्रगतेचारिद्ाखयम्‌ निक्राममहातिजाजरवासात्ुरोदितः १॥ पपिषठ्रादब्दन्तेगङ्गापयषितोयुनिः शुश्राव्चसमस्तन्तु | | विन्वामिजवििष्टितम्‌ २॥ हरिथनदरस्यनाराथरज्ञशोदारकमैणः चण्डारेप्रयोगथभायोतनयविक्रयम्‌ सशत्वाएुमहाभागपरीतिमानवनी | | £ वसिष्ठडवाच ममपुतररततेनविश्वामित्रेणातितम्‌ तजापिनभवत्कोधस्ताहशो | | या ९॥

| युद्धस्वरूप शेष कथा वर्णेन करते हे.सुनो ॥२८६॥ इति भ्रीमाकण्डेयपुराणे शाषाटीकायामषटमोऽध्यायः पक्षी बोल-हे जेमिने ! जव राना हरिथनद्र रज्यते | छूटकर तिदशालय (स्वग ) मँ चटेगये, तव उनके पुरोहित महावेनस्वी वंरिष्टजी नते निकेठे ॥१॥ मुनिने बारह पष पीठे जलवाससे निकलकर विश्वामित्रजी | का सब वानत सुना ॥२॥ उदार कमं राना हरिन जिसभकार राज्य नष्ट होनानेपर चाण्डा लपनेको प्रात हए आर जेते उनके बरी पत बिके॥ २॥उन महाभाग |

| तेजस्वी वशिष्टजीने यह सब सुनकर विश्वामित्र कपथिप्र बदा क्रोध किया कारण कि यह राजसे अत्यन्त भसन थे ॥४॥ षसिष्ठजी बोरे-इस समय महात्मा महा |

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नाग देदता ओर बाहमणोंकी पूजा करनेवाटे राजाको स्वराज्यसे . च्युत हुआ सुनकर मुद्चको जितना कोध उत्पन्न हभ हे उतना कोष उसी विश्रामित्रके हाथ ।से अपने सो प्के मरनेपर भी उत्पन्नं नहीं हुभा था £ जब कि, भरे आशित सत्यवादी शके भति भी मत्सरताहीन अथात्‌ शङ्चुसे भी शब्ुता

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रखनेवाठे, निरपराधी, धमात्मा ओर अभम राजाको पत्नी एत्र ओर भेवकोंसदित अंत दशाम प्रा कराया है, निज राज्ये भट करके) अनेकं भकार

सेदुःखीकियाहे॥ < इस कारण वह दुरात्मा बहदरेषी मूढ) यज्ञ करनेवाकि यज्ञका नाशक विश्वामित्र भेर शापे हत होकर ति्गूयोनि अथात्‌ | बगेके देहको भ्रात हो पक्षी बोठे-दधर कुशिकरवंशोत्पनन महातेजस्वी विश्वामित्रजीने भी इस शापक! वत्तान्त सुनकर वरिष्ठजीको प्रतिशाप दिया तरू भी

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| अत्वानराधिपमिभेस्वराज्यादवरोपितम्‌ महात्मानमहाभागंदेक्राह्मणपूनकम्‌॥ €॥यस्मात्ससत्यवाक्छन्तःशजावपिविमत्सरः अनागश्थिवधमात्मोभप्रम |

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| त्ोमदाश्रयः॥॥७॥ सपत्नभृतयपुजस्ठभापितोऽन्यादसं वृपः सशन्याच्यावितो>ेनवदुङा्षिरीकृतः॥८॥ तस्मारतमात्रह्दइयन्विनामवरोपकः॥ ‡|| मच्छागोपरतोभूढःसवकत्वमवाप्त्यति ॥९॥ पक्षिणरछः शत्वाशापंमदातेनािश्वामिबोऽपिकोशिकः त्वमप्याडि्भवस्वेतिप्रतिरापमयच्छत ॥१०॥ ||

| अन्योन्यङापात्तोम्रप्तोतियंपरमचयती विष्ट समहातेनाविन्वामिवश्वकोरिकः = ३१ अन्यनातिसमायोगेगतावप्यमितोनसो युपतिऽतितं रन्थोम्हावर्परकरमो १२॥ योजनारनसहेदरेभमाणेनाडिरच्छितः पण्णवत्यधिकंतरह्महसत्रितयंमकः १२ तोतुपकषपहारभ्यामन्योनयस्योर = किकिमो प्रहरन्तोभयंतीतरपरनानांचक्रतुस्तदा १४ विधूयपक्षाणिबकोरक्तोदरतताक्षिराहनत्‌॥ आडिसोऽप्यत्नतग्रीवोबकेपद्धयामताडयत्‌ १५॥

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आडि ( चीलयकषी ) की योगिको प्राप्त हो” १० महातेजा विष्ट ओर कुशिकनन्दन विष्वामित्रनी) दनोद अवन्त तेजस्वी थ, अत एक दूरके शाते | [परस्पर पक्षीकी योनिको परा दए ११ वह अमिततेजस्वी महावटवानू पराक्रमशारी दोनों अन्यजातिको ्रा्होकर भी अत्यन्त कोधसहित युद्ध करो ||‡

खगे १२ हे बहन्‌ ! आदिकषी दो हजार योजन ॐचा ओर वगा पीन हनार छयान योजन .ॐचा उदा १२ उन उरुकिकिम पराक्मशारी || || दोनों पकषियोके आपस मँ पक्षपहार करनेसे भरनाको अव्यन्त भय उपस्थित हभ १४ बगटेने फलाये हए लट काठ नेषि समस्त परखोको केपाएमान

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करे आदिप्ीङो आहत किया, तव उती समय आनि भी गदेन $ची करके बगहेको पेते तादित कियां ५॥ उनके पैकी पवने | होकर अनेक पैत भूमिं गिरने खगे ओर उन प्वैतौके गिरनेमे अभिहत होकर पृथ्वी कापिनेटरगी _ १६ ओर भूमिके कने समुद्रका जठ उछल्ने गा तथा कोपती हृई पृथ्वी भायः पाताल जनेकी इच्छा करके एक पाश्वं गदं १७ तव पृ्धवीके सव प्राणी, कोद तके गिरने, कोटे समु्के | जलसे ओर को भरमिके कंपने नाशको भाम होने ठगे १८ इस भकार सव जगत्‌ अत्यन्त रसित हो) हाहाकार करने ठगा मृच्छित ओर संभास्त हेगया, पृथ्वीमण्डलकी विपरीतता उपस्थित होनेपर १९ पथ्वीके समस्त पुरुष अत्यन्त व्याकुलचितसे हा वत्स ! हा कान ! हा शिशो ! भागो; यह देखो, कैसी अदस्थामं हं ! हा प्रय दय कान्त ! यह्‌ देखो पयैत गिरते शीघ्र भागो २०॥ अत्यन्त भीत चित्ते वह इस भकार कहने रगे ओर परस्पर एक दृ तयोःपक्षानिखाषास्ताःप्पतुरगिस्योयवि गिरिप्रपाताभिहताचकम्पेचवसुन्धरा ॥१६॥ ्माकम्पमानाजर्धीवुद्रताम्बू्कास्च ननामचेकपा्वेनपाता लगमनोन्सखी १७ केयिद्विरिनिपातनेकेविदेभोधिवारिणा केचिन्मरीसेचरनात्प्ययुःप्राणिनःक्षयम्‌ ॥१८॥ इतिसवैपरिस्तंहाहाभूतमचेतनम्‌ जगदासीत्सुभांतपयैस्तक्षितिमण्डम्‌ १९॥ दावत्सदाकांतकिशेप्रयाद्येषोऽस्मिसेस्थितः दापरियकातशैरोऽयैपतत्याश्पखयताम्‌ २० इत्या कटीकृतेखकेसंभासविशखेतदा सुरेःपरिवृतःसर्वेशनगामापितामहः २१ प्रत्युवाचचविशेशस्ताबुभावतिकोपितो युदधवांविपतेतहटोकाः स्वास्थ्यंव्रनन्तुच २२॥ शृणवन्तावपितोवाक्थेब्रह्मणोऽव्यक्तनन्मनः कोपामषैसमािषोय॒यधातेनतस्थतुः २३॥ ततःपितामहोदेवस्तंःश्चारोकैस क्षयम्‌ तयोशहितमनिच्छंल्तियगभावमपादत्‌ २४ ततस्तोपएवदेहस्थोपराहदेवःप्रनापतिः व्युदस्तेतामसेभावेवसिष्ठकेशिकपभो २५ जहिवत्सवपिष्ठतवतवंचकोशेकसत्तम तामतेभावमाभित्यहहगयुदधंविकीषितम्‌ २६ | विमुख अथात्‌ अठग्‌ अग होगये, तय स्वयं पितामह बहमाजी सव देवतांस युक्त होकर उस स्थानमं आये २१ ओर अत्यन्त कोभित हए दोना पक्ष योम बोट कि,-तम्हारा यद्ध निवृत हो ओर पवी सव भाणी स्वस्थ हेवं २२ दोनों पक्षी अव्यक्तजन्मा बह्मानीका यह वचन सुनकर कोप ओर || अमर्षे वश हो अत्यन्त युद्ध करने टगे, किरी भकारे स्थिर हुए २३ तव पितामह बहाने इस पकार प्रनाका क्षय देखकर) उसके हितसाधनकी | ३४॥ इच्छाते दोक पक्षीभाव हरण कर दिया २४ उम दनां कपियोको परिल देहकी भाति होगे उनका तामस पाष दूर हभ तव दिव्य शक्तिमान्‌ | ब्रह्मानि वसिष्ट ओर कौशिक कपिसे कहा २५ पल्स वसिष्ट ! है सनम कौशिक ! तुम तामसभाव अवलम्बन करके जो एसा युद्ध करते थ| ई।

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षिन षिरीःणिणगिषपरीीतषप पौषो मिष ्री/र४म

उसको त्याग दो २६ तुम पृ्वीको क्षय करनेवाला जो युद्ध करते भे, वह राजा हरिथन्द्रके राजसुय यज्ञ करनेका विपाक ( फल )है २७ | इन कोशिक्ठ विश्वामितरीनि राजाका कोर अपराध नहीं किया है, त्युत हेनहन्‌ ! उपकारे पदमे स्थित होकर उनको स्वग परार कराया | | तुम काम ओर कोध के वशीशरत होकर तपस्यामे विघ्रकारक हुए हो, अतएव इन दोनोंको त्यागदो तुम्हारा मंगल हो बहमत्वकी अपेक्षा अन्य वल नदीं है | २९ तव प्रजापति बल्लाजीका इसभकार वचन सुनकर वह दोनों बहुत टन्नित हए ओर परमे पणं हो परसर आगन कर षमा प्रार्थना करी ३०॥ इस

| पीछे लोकपितामह बल्ाजी देवतासिं परजित होकर ब्ह्मढोकमें चठेगये ओर वसिष् तथा विश्वामित्र इन दोनों ने भी अपने अपने स्थानको प्रस्थान किया

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| राजसुयविपाकोयंहरिनद्रस्यभूषतेः यवयोर्पिरदायपृथिवीक्षयकारकः २७ नचापिकोरिकभरेषठस्तस्यरज्ञोऽपराष्यति स्वगप्रातिकरोवरहघ् | पकारपदेस्थितः २८॥ तवोविन्नस्यकक्तरोकामकोधवरंगतो परित्यनतम्रवोन्रद्महिदुरंवम्‌ २९ एवसुक्तौततस्तेनरनितोतावुभाव | पि क्षमयामासतुः्त्यापरिष्वन्यपरस्परम्‌ ३०॥ ततःसुरवन्यमानोत्रह्ारोकंनिजययौ वसिषठोऽ्यात्मनःस्थानैकोरिकोऽपिस्वमाश्रमम्‌ २१॥ एतदाडिवकंयुदधहरिशंदकथांतथा कथपिष्यन्तियेमत्यौःसम्यक्ोष्यन्तिचेवये ३२ तेषा -पापनोदेतुतदयवकरिष्यति नयैवविधका | योणिभविष्यन्तिकदाचन ३३॥ इति माकैण्डेयपुराणेढिविकयुद्धकथनेनामनवमोऽष्यायः॥ ९॥ नैमिनिरुवाच पशयंद्विनशादराः ¡ भ्रतममण्च्छतः आविभोवतिरोभावोभूतानांयतरसंस्थितो १॥ करथस्नायतेजन्तुःकथवासविवधते कथवोदरमष्यस्थस्तष्ठत्यद्निषीडितः ॥२॥ निष्कान्तिमुदरात्प्राप्यकथवावृदिमृच्छति उत्कान्तिकारेचकथंचिदधविनवियुल्यते २॥ |॥ ३१ जो मनुष्य यह आड्विकुद् ओर हरिशनद्रकी कथा करेगा, पा भीति सुनेगा २५ उसके स॒ पाप दृर होगे ओर जो इको सुनकर काये करेगा, उसके कायम कभी विद्र नरी होगा ३३ इति श्ीमाकंण्डयपुरागे भाषादीकायां नवमोऽ्यायः॥९॥ ॥| | जेमिनिने कहा-दे दिजशादूखगण ! प्राणियों की, ` जिसमे जन्म ओर शृत्यु संघटित होती ३, उस विषयमे ञे सन्देह दै अत एष पुता हूं, आप किये | |॥ प्राणी किस भ्रकारते उत्न्न होता है ! कैसे वदता है ! ओर किस भति देहम ¶ीडा सहकर उदरं वास करता ! २॥ उदस्त बाहर निकठकर ||

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ऊेते बढता ३, शृत्यकारमे किसपकार उसका चैतन्य वियुक्त होता हे ! प्राणी कालकवलम कषटित होकर कितपकार पुण्य ओर पापका फर भोगता है| | तथा पाप पुण्य किसपरकारसे अपना अपना फठ सम्पादन करे ॥४॥ भोर जबं अनेकं गुरुपाक भोजनकी वस्तु जठराशयमें जीणं होती ई, तो सामान्य पिण्डीर्त जी | ब्ीकि जटरमे किस स्यि जीणं नही होता! ॥५॥ जिस जठराभिमे भोजनकीहुर सव वस्तु जीण होती अथात्‌ पचजाती है वहां यह छारासा जीव कैसे नष्ट हीं होता | ओर किसपरकार सब सुत कमोको भोगता हे ! हे दिजगण ! जिससे मरा संदेह दूर हो, उसी प्रकार यह सव विषय वणेन कीनिये. कंयोकि यहः | | अत्यन्त गुप्त विषय है, भाणी सीमे मोहित होति ईह पक्षी बोढे-हे मुनिसत्तम ! आपने प्राणियोके भाव अपावसे युक्त यह प्रश्र किया यह बडा

| छत्सरोमृतस्तथाश्नातिरभेसुकृतदष्कृते करथतेचतथातस्यफसम्पादयन्तयुत्‌ कथनजीयेतेतपिण्डीकृतइवारये स्त्ीकोठेयभ्नीयने | युक्तानिसुयुषूण्थपि भ्याणितजनोजन्तुनीध्येतेकथमरपकः कथभोक्ताससतैस्यकमेणःसुकृतस्यवे एतन्पे्रतसकरसन्देदोकतिथिव | जितम्‌ तदेतत्परमंगु्यत्रमह्यन्तिजन्तवः॥ ७॥ पक्षिणउचुः प्रश्रभारोऽयमतुरुस्त्वयास्मासनिवेशितः दुभोव्यःसवेधूतानांभावाभासमा | | भितः तंशृणुष्वमहाभागयथःप्रादपितुःपुरा पुजःपरमधम्मात्मामतिनौमनामतः व्राह्णोभागेवः केथित्स॒तमाहमहामतिः कृतो | | पनयनशान्तंसर्मातिनडरूपिणम्‌ १० वेदानधीत्यसुपतेयथाुक्रममादितः ग॒रुरुश्रषणेव्यगोभेकषतरकृतभोजनः ११ ततेगाह | | स्थ्यमास्थायचेष्ठायज्ञानलत्तमान्‌ इष्टयुत्पादयापत्यमाश्रयेथावमेततः १२ वनस्थश्चततोवत्सपणिराहनिष्परिग्रदः एवमाप्स्यपितद्रद्मयतर | | ृत्वानश्ञोचसि १३ पक्षिणउचुः इत्येवमुक्तोबहुशोनडत्वातराहकिश्न पितापितसुषहुशःपराहपीत्याएुनःएुनः १४

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शोनक नमथ

गद अतुरमश्चभार हमर ऊपर डला है ॥८॥ जो हो हे महाभाग! पूष कालम सुमति नामकं परम धमता पुतन अपने पितासे जिभप्रकार कहा था, वही |२| कंते है, सुनो किसी समय भार्गववशीय मृहामतिनामक किसी बाह्मणने अपने शान्त जनेऊकियेहुए जडरूपी पुत्र सुमते कहा १० है वत्स | | सुमते ! गुरुकी सेदा् रत होकर भिक्षाके अननद्रारा जीवनधारणपूेक कमानुस्ार पिरे सव वेद पढ. ११ षि गृहस्थधम अवटम्बनकर यज्ञानषठानपूवेक |२| अभिलाष पुत्र उत्पन्न कर ओर फिर दनम चाजा १२ हे वत्स ! वनम वास करनेपर निष्परिग्रह संन्यासी होनेसे. बहज्ञान भाप करेगा) जिसके भ्ाप||‡ | | करसे किर सोच करना नहीं पेमा १३ पक्षी बोठे कि-इसमकार पिताने शुमतिसे बहत कुठ कहा, ङिन्तु उस्ने चडताके कारण कोद उत्तर नहीं| |

दिया तो भी पिता शेके वश हो उससे वारंवार कर्ने रंगे ५४ जब पुतसे कहवश पिताने एसे भरोभी मधुर वचनंसि. वारंवार कहा, तब मति || कुछेक रसकर पितासे बोला १५ हे तात ! आप मुक इस समय जिस विषयका उपदेश देते हँ मेने अनेकवार इसका अभ्यास किया दै || ओर अन्यान्य नानाशाल्र ओर बहुत भकारसे शिल्यशाश्गका भी भेने अभ्यास किया है १६ कु अधिक दशहजारवरधकी बात मुञ्चको स्मरण ह) मे| अनिक.वार दुःख पाया है.ओर अनेक वार संतुष्ट हुआ हू ओर अनेकं वार क्षय वृदधिके उदये रत हभ है जब ज्ञान भाप रै, तो वेदसे क्या प्रयोजन रै !॥९७॥ | 4 भेरा अनेक धार शर मित्र ओर कलवके सहित मिलाप तथा तरियोग हुआ है अनेक माता ओर अनेक पिता रेखे १८॥ हारो षुख दुःख अनुभव कि ||‡

इतिपित्रा॒त्नेदात्परेभिमधुरक्षरम्‌ सचोदयमानोबहुसःप्रदस्येदमथात्रवीत्‌ १५॥ ततितद्रहुोभ्यस्तंयत्वयायोपदिश्यते तथेवन्धानिशाघ्णि शिर्परानि विविधानिच १६ जन्मनामयुतंसामंममस्मृतिपथंगतम्‌ उत्पप्नज्ञानगधस्ययेदैःकिमेप्रयोननम्‌॥ विरवदाःपरितोषाशक्षयवृदधशुदेरताः ॥१७॥ श॒ञ्चमितरकट्वाणांवियोगाःसङ्गमास्तथा मातरोविविधादश्टाःपितरोविविधास्तथा॥१८॥ अवुभूतानितोस्यानिदुःखानिचसदघ शाः बान्धवाय |/3 | हवःप्राप्ताःपितस्थप्रथग्विधाः १९ विण्ूत्रपिच्छिलेन्लीणांतथाकेष्ठिमयोषितम्‌ पीडाशयरेप्रप्तरोगाणाथसदन्तशः २० गर्भदुःखान्यने || | कानिनारुत्वेयोवनेतथा बृद्तायांतथाप्तानितानिसवौणिसंस्मरे २१ ब्राह्मणक्षत्रियविशांयद्राणाज्चापियोनिषु पनपडयकीटानामृगाणामथप ||4 | क्िणाम्‌ २२ ॥तथेवराजभेत्यानांरज्ञाचाटवशाछिनाम्‌ सत्पत्नोऽस्मिगेदेषुतथेवतवेेदमनि २२ भृत्यतांदासताचवगतोऽस्मिबहशोनरणा्‌ | स्वामित्वमीरवरत्वचदख्दरितवंतथागतः २४॥ हतेमयादतश्वान्येहैतंमेषातितंतथा दत्तममान्येरनयेभ्योमयादत्तमनेकञञः॥ २९ | | ह, अनेक वान्धव पाये ओर पितापी अनेक भकार देखे हे १९ मल मूत्रे शरे शकि जरम मेने अनेकवार वास किया है, सहस सहत रोर्गोकी दारुण यपरणा ||4 | भोगी हे २० गृभयंत्णा वा बाल्य योवन ओर वृद्ध अवस्थामें जितनी बार जैसा दुःख भोगा है, वह सव गुञ्चके स्मरण है ॥२१॥ पँ ने कितनीही वार बाह्ण, |$ | कषत्रिय वैश्यः शुद्ध पशु, कीट, मृग ओर पक्षी योनि जन्म ग्रहण किय। है २२॥ भिसपरकार आपके षर उतपन्न हभ हं पे ही अनेक अनेक्रवार राज ||: | सेवक ओंर अनेकानेक योधाओंके षर जन्म खिया है २३ पँ अनेकषार अनेक मनुष्योंका भृत्य ओर दाप दभाहं, अनेक वार स्वामित्व भधानंतव ओर्‌ || | दारेढता भोगी हे ५२४ भने अनेकवार अनेक मनुप्यको मारा है, तथा अकवा कितनेही मन्येन मुञचको ओर मेने उनको मारा है, पनि अनेकवार दान |

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1 1 * ~ == न॑ श्ण्न छवा) ५८०९. ५. ११. ^ , ता 9 --" ,~ +~ ती =: -बविकदययण्योिगोिनििनषिगकयियेक्निक्दोेियण्यायानिग्यागदानििविििदोदोधयोकनेयकणम्यििोकान्ेोोयािभनयमिनयगयाणयेीयनिोिोि ोदागदोननिमिोगियोनोिगोनयनोिोयननोो के ो्योननयिणयिनकदोोिन्ययोकिि

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किया है ओर अनेकवार मेने ओरों से छिया है २५ पिता, माता; सुहत्‌, भाता ओर शी इत्यादि से भँ कितनीरी पार संतुष्ट आहं ओर अनेकवार दीन दशा को भ्रा होकर आंसुओंके जसे मुख धोया रै २९ हे तात ! मेने इसभकार सेकटमय ससारचक्रमं॑निरन्तर भमण करते करो मोक्ष देनेवाला ज्ञान. राप किया दै २७ इसप्रकार ज्ञानलाभ करनेसे ऋक्‌, यजुः ओर साम नामक समस्त क्रियाकलाप मुञ्ञको विगुण ओर असम्यक्‌ विदित . होती रै.॥ २८ अत एव जवः मुञ्चको ज्ञान पराप्त होगया है ओर गुरु विज्ञानम तृप होकर देष्टारहित ओर सदात्मा. हआ, तो फिर भेरा वेदज्ञानसे क्या भरयोजन . है ! ॥२९॥ सुतरां छह प्रकारकी क्रिया, सुखः दुःख, हषे, रस ओर गुणरीन आह परमपदको मँ निःसन्देह. भाप हंगा ३० ओर रस) हष) भय) उदरेग, कोधः

पित्मातसद्द्धातकल्ादिकृतेनच तुष्टोऽपकृत्तथादेन्यपश्रुषोताननोगतः २६॥ एवेषषास्चकरेऽस्मिन्धमतातातपङटे ज्ञानमेतन्मयापराप्मे कषसम्प्रात्तिकांरकम्‌ २७ विज्ञातेयतपव्वोऽयमूग्यजुःसापसंन्ञितः क्रियाकरूपोविगुणोनसम्यकप्रतिभाकिमि २८॥ तस्मादत्पत्रमोधस्यवेदेः क्रिमेपयोजनम्‌ -गुरुविज्ञानतप्तस्यनिशीदस्यसदात्मनः २९ ।षट्प्रकारक्रियादुःखसुखदषैरसेश्चयत्‌॥ गुणेशव्वाभत्द्मतत््राप्त्यामिषरंपदम्‌॥ ३०॥ रक्षहषेभयेद्वेगक्रोधामषजवाग॒रा बिज्ञातातृमृगग्रारसंपपाशशताङ्क। ३१ तस्मायास्याम्यरेतातत्यक्तेमादुःखसन्ततिम्‌ अयीधमेमधमोल्ं किंप़पफटस्ततिभम्‌ ३२ पक्षिणउचुः तस्यतद्रचनंश्रुत्वादषविस्मयगद्रदम्‌ पितप्रादमहाभागःस्वसुतद्टमानसः ३३॥ पितोवाच किमेतद्रदसेवत्सकुतस्तेज्ञानसम्भवः केनतेनडतापूवमिदानींचपरबुद्धता ३४ कि्ुश्ापविकारोऽयंसुनिदेवक्ृतस्तव यत्ज्ञानं तिरोभूतमाविभासुपागतम्‌ ३५

कि कक्कर

छोडकर जाऊंगा जयी वियाका धर्म अधर्मता दीखता है, इसको त्याग ॒निःसन्देह बाहमपद भ्रात करूगा ३२ ॥' पक्षी बोठे-पुच्रका यह वचन सुन महाभागपिता ने परसन्नवि्त ओर हष॑षिस्मययुक्तं गद्रद वार्णीके द्वारा अपने पुत्रसे फिर कहा ३३ भिता वोले-हे वत्स ! तुम यह क्या कहते हो ! कहास तुमको "हस ज्ञानं मिला पाटे तुभ जडस्वभाव थे, अव कहांसे देसी ज्ञान बुद्धि उत्पन्न हुई ! ३४ तुम्हारा छिपाहुभ ज्ञान जो सहसा प्रगट हुआ यह कया किसी

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अमष ओर बुढापेके दारा सदा नितान्त आकुल तथा मृग श्वानके पकडनेवारे सैकडं बंधनं व्याप ३१ इस कारण हे पिता ! इस दुःखहूप

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२६॥

मुनि वा देवताके शापका विकार था ! ३५५ पत्रे कहा-हे तात ! भेरा यह सुख दुःखप्रदायक परिखा वृतान्त तथा म. अन्य. जन्ममे जो था ओर जो जो [हुआ था, वह सब कहता हृं, सुनो ३९ मे पूवे जन्मे एक बाह्मण था, तवमे ने परमात्मामं निरन्तर आत्मको टीन करके आत्मवियामें परमनिष्ठाखातन करी थी ३७ सदा योगयुक्त रहनेसे साधुता अभ्यास, सत्संयोगः सत््वभावःविचार, पिधिशोधन अथात्‌ विधि्ोका उद्धार ३८ ओर निरन्तर प्रमा- त्मामे युक्त रहनेसे उस जन्ममे मे अत्यन्त प्रसन्न था ओर शिष्योंका सन्देहनिवारण करनेवाला होकर आचायेकी पदवीके। पाप हुमा था ३९ कुछ काठ वीतने प्र रेकान्तिक होगया ! फिर अन्नानसे आकृष्ट स्वभावहो प्रमादके कारण ययपि व्याकु होगया ४० किन्तु तो भी उस मत्युकाटतक मेरी

पु्रउवाच -यृणुतातयथावृत्तंममेदंसुषदुःखदम्‌ याहमास्मन्यस्मिन्मन्यस्पत्परन्तुयत्‌ ३६ अह्ासपुराविपोन्यस्तात्मापरमा त्मनि आत्मविद्यािचारेषुपरानिष्ठामुपागतः ॥३७॥ सतरतयोगयुक्तस्यसतताभ्यातसद्गमात्‌ सत्सयोगात्स्वस्वभावाद्विचारविषिोधनात्‌ ३८॥ तस्मितनेवपरप्रीतिमेमासीचयंनतःदा आचायतांचतेप्रा्तःरिष्यपन्देहहत्तमः ३९ ततःकटिनमहताएेकान्तिकसुपागतः अज्ञानाक्ृष्टसद्रावोि पत्र्चपरमादतः ४०॥ उत्रान्तिकाटादारभ्यस्मृतिखोपोनमेऽभवत्‌ यावदग्दंगतंचेवजन्नास्मृतिमागतम्‌ ४१ प्रवाभ्यासेनतेनेवसोऽतात जितेन्द्रियः यतिष्याभितथाकर्तुनभविष्येयथापुनः ४२ ज्ञानदानफरंद्येतथनातिस्मरणंमम नदयेत्राप्यतेतात्रयीधमाधरतेनेरेः ४३ सोऽदपूवोश्रमादेवनिष्ठाधमंयुपाशितः एकान्तितवमुपागम्ययतिष्याम्यात्ममोक्षणे ४४॥ तदघरहितमहाभागयततांापिकंहदि एतातापित्ीति मुत्पाद्यानण्यमाघ्रुयाम्‌ ९५॥ पक्षिणः पितप्राहततःपु्॑श्रहपत्तस्यतद्रचः भवतायद्रयपृ्टातमसासयदणाश्रयम्‌ ४६

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स्मृति छोष नदीं हई, अतएव जन्मके समयसे जितने वप बीति वह सव मुद्चको स्मरण हे ४१ इस कारण हे तात ! मं पूवापयासके वसे जितेन्द्रिय होकर [फिर वैसाही यतन करंगा ४२ जिससे मे इस ज्ञान ओर दानका फलस्वरूप जातिस्मर हुआ हूं अथात्‌ सबजन्मकिा वृत्तान्त मञ्चे स्मरण है हे पिता ! ्यी- धका आश्रय करनेवाडे मनुष्य इसभकार जातिस्मर नरी होसक्ते॥ ४३॥ मे पूवेजन्मानजित निष्टा धर्मक आश्रयसे एकान्तकत्व लातकरके भत्ममोक्षमे यत्वाद्‌ हणा

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५९ जीवक ~= ~> 4 है उुन्टनि | अनन्तर उसके पितनि उसका यह्‌ वचन सुन श्रदधायुक्त हो, जीवोके जन्ममूत्युविषयमं आपने मुहञसे जिस भकार पृछा हउन्हेनि भी पतसे उसी पकार पृछा था ॥४६॥ |

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|॥ ४४॥अबएव हे महाभाग ! आपके हदयमे जो कर संशय रे वह किये, मँ एकमाजउपायसेही उससविषयमं भापकी प्रि उतपन्न कराकर उकण हूगा ४५ पक्षीवोदे-|| < |

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पुने कहा-हे तात ! भने वारंवार जो अनुभव किया रै, वह यथात्व कहता हूं सुनो, यह जो संसारचक्र है, इसकी जरा भी कटीं स्थिति नहीं है॥४७॥ह पिता! || आपकी आनज्ञासे वह सब वृतान्त कहता हूं ओर कोद भी मृतयुकाटकी सम्यूणेघटनाओंका वणेन करोमे समर्थ नरी रोगा ४८ देहे स्थित हृभा पित्त पित होकर ईैधनके विना भी तीव वायुके संचारनेसे दीप्यमान होता है ओर सव मर्मस्थानको भेदन करता रै ४९ ओर उदान नामक शरीरस्थ वायु

उसके उप्र वतेमान होकर जलीय समस्त शैक्ष्य वसतुकी अधोगति निरोध करती है सुतरं उस समय प्राणीके आत्माका वियोग होता हे ५० जिसने जर वा अन्न, रस दान किया है, वही उस मृत्युरूप आपत्काले भरसन्न हेति ॥५१।जिन्हेने भरद्धासरित पवित्रमनसे अन्नदान किया वह विनाअन्न

पुत्रउाच शृणुतातयथातत्वमनुभूतंमयाऽसकरत्‌ सेसास्चक्रमजरस्थितियेस्यनविद्य ते ४७ सोऽहंवदामितेषैतेवाज्ञयापितिः उत्का न्तिकालादारभ्ययथानान्योवदिष्यति ४८ उप्मापकुपितःकायेतीत्रवयुहमीरितः भिनत्तिममस्थानानिदीप्यमानोनिरिन्धनः ॥४९॥ उदानोनाम वनस्ततरोष्येषवत्तेते युक्तानामम्बुभकष्याणामधोगतिनिरोधकृत्‌ ५० ततोयेनाम्बदानानिकृतान्यत्ररसास्तथा द्ताःसतस्यआहादमाप दितिष्यते॥ 49 अत्रानेयेनत्तानिश्रद्परतेनचेतसा सोऽपितृपतिमवापरोतिषिनाप्यत्नवैतदा ५२ येनानृतनिनोक्तानिप्ीति भदे नच आस्तकःजहानश्ससुखमृत्युमृच्छति ५३ देकत्राह्मणपूनायायेरतानोनसुयवः शुङ्खावदान्याहीमन्तस्तेनराःसुखमत्यवः 48

योनकामात्ररम्भात्नदवेषादमेसुतसृनेत्‌ यथेक्तकारीसेोम्यश्चसषखंमृत्युमृच्छति 4 अवारिदायिनोदाद्धाानत्दायिनः पराषवन्तिनरः काठेतस्मिन्भृत्यावुपस्थिते ५६

शी उसस॒मय तृषिठाभे करे है ५२ जो पुरुष कभी मिथ्यानहीं बोठते, किसीकी श्रीतिमे भेद नहीं करति, आसिक ओर श्रदवावान्‌ उन्दीकी सुखसे मृत्यु होती हे ५३ जो देवता ओर ब्राह्मणकी पूजाम रत ई, जो असूयाहीन श्धवित्त, सृप अर्थात्‌ ्रष्वोटनेवारे ओर ठजावान्‌ हः वही सुखपूरवैकं भ्ाणत्याग करते हे ५४ जो काम) कोध वा द्वेषे वश होकर कभी धर्मको नहीं छोडते, जो कहते है वही कसे भर सोम्यगूर्त वही सुखसे भराणत्याग करे हँ ५५ ओर जिन्हे कभी प्यासते आंहूए मनुष्यको जठ ओर शूखते दःखी हएको अन्न नहीं दिया, वह

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भाग्य° अ० १०

२७॥

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~ व्नगःरयररगीरमयस्यमयरोरे ष्म पकः

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|उस मृत्युकाटके उपस्थित होनेपर गाह्‌ ओर श्चधाको प्राप हेते है ५६ ॥जो काष्ठदान करते ह, उनको मृत्युकामँ शीत नही. सताता, चंदनदान करते है वह ताप नरी पाते ओर जोःसदा प्राणि्योको भयभीत करते ई, उन्दीको मृत्यु-काटमें कष्टदायकं प्राणघ्री वेदना भोगनी पडती है ५७ जो अधम मनुष्य नुष्योंको मोह ओर अज्ञानकी रिक्षा देते हँ वही भाणत्यागके समय अत्यन्त पति हँ ओर महादुःखसे पीडित हेति ५८ जो श्षुठी गवाही देते [मिथ्यावादी वेदनिन्दकं ओर बुरा शासन करते है, उनकी अनज्ञानसे मृत्यु होतीरै ५९ ओर उनके मूत्युकालमे पूतिगंथमय कूट मुद्ररं हाथमे छ्यि अत्यन्त [भयंकर दुरात्मा यमदूत आते ६० ज्योंही यमदूतगण नेत्ोकि सामनेभति है, उसी समय इह कापिते हए शरीरस भादं माता ओंर पुत्रको पकारकर सीतेजयन्तिधनदास्तापंचन्दंनदायिनः प्राण्रविदनांकष्टयेचानुद्रेगकारिणः ५७ मोदाज्ञानपदातार्राषुवन्तिमदद्भयम्‌ वेदनाभिरुदग्राभिः

| प्रपीच्यन्तेऽधमानराः ॥५८॥ कूटसाक्षीमृषावादीयासदुशञास्तिवे॥ तेमोदमृत्यवःसवेतथान्येवेदनिन्द्काः॥५९॥ विभीषणा पूतिगन्धाःकूटमुद्ररपाणयः

| आगच्छन्तिदुरात्मानोयमस्यपुरुषास्तदा ॥६०॥ प्राप्तषुदक्पथतेषुनायतेतस्यवेपथुः ऋन्दत्यविरतंसोऽथभातमाततानथ ६१ सास्यवागस्फुयता

| तएकवणोविभाव्यते दिः्घराम्यतेजासच्छसाच्छुष्यत्यथाननम्‌ ६२ उप्वैभ्वासान्वितःसोऽथदष्टिभद्धसमन्वितः ततःसवेदनाविटस्तच्छरी

| रविुचति &२॥ वाय्वम्रसारीतदरपदेदमन्यत्पपद्यते तत्कमेजयातनाथैनमातपितृसम्भवम्‌ तत््रमाणवयोवस्थासंस्थानेःप्रभवंयथा ६४ ` ततोदृतोयमस्याञ्चपाडबेधातिदारुणेः दण्डपदारसंभरान्तंकषतेदक्षिण्रादिङ्चम्‌ ६५ कुराकण्टकवल्मीकरंकुपाषाणककेरो तथाप्रदीप्तन्वखनेक ` चिच्छरभ्ररातोत्कंटे &&

निरन्तर रोते हे ६१ उस समय उनका वचन ठीक समम हीं आता, एकवणेमय होता रै दृष परमे ठगती है ओर चास तथा श्वासके कारण गल सूस [जाता है ६२ अनन्तर वह उष्वैश्वास ठेतेहुए दृष्टि भेगयक्त हे वेदनासे भसित रेति रै ओर वह शरीर छोड देते ॥६२३॥ किर ायुके आगे होकर कर्मननित || | यंभणा अथात्‌ नरककी यातना भोगनेके रिये विना माता पिताके उत्पन्न अन्य देह धा-रण करते ओर वह देह पैकी समान वयसः अवस्था ओर संस्थाने संयुक्त होता है

६४ अनन्तर यमदूत उनको दारुण पाशे बांधकर दण्डके ्रहारसे .सेभान्तकसते हए दक्षिण दिशम खेंचते ६५॥ कुशः कटि, वल्मीक) शक्‌ ( कीर ) |

माश्पु ° ३८

[थ

शकरुककरकककुरकरकरकररकररकरुककुरकककरुरकरुरुककरुलरुककेककककः

ओर पत्थरोसे क्कश, करीं जलती अधिसे व्याप, करीं सेकं गद पदे 'हृए॥ ६६ करीं सूयंकी महा उष्ण कर्णेभि जरतेहुए ओर कही भेक गीददी

| भाग्वीर १०

ब्द करतो करीं यमद सच रे ६७ पे घोर उस भाणीको सचे हं ओर सेकडा गीदड़ उएको साते ३) इहभकारके दारुण मागि पापीपरष युमलोकको जति है ६८ जिन म॒नु्योने छत्री, जूता, वल वा अका दान [कया षह सहनम्‌ हा सुसपूषक उस मागेमं नापतकते ह। | ६९ जिन म॒यि मिका दान किया रै, वह उज्वल विमानोमिं बैठकर जत पापपीदित अथात्‌ पापात्मामनप्य इसमकार्‌ डेशातुसे िश होकर बारह दिनि धमराजके नगरभं परचते ७० जव शरीर जलता है, तव वह महादाह भोगते हँ ओर देहके ताडित वा छेदितं होने दारुण वेदना भोगृते दै ॥७१ यह्‌ दह जव जलम गीला होता प्रीपतादित्यतततेनदह्यमानेनदंराभिः कृष्यतेयमदूतेशरिवासप्नादभीषणेः &७ िङृष्यमाणस्तेवरभक्ष्यमाणःरिवारातेः .॥ प्रयातिदरुणेमा पापकमायमक्षयम्‌ ६८ छोपानत्पदातारोयेचवघ्प्रदानः तेयान्तिमवनामागतंसुखेनतयातनद्‌ः ६९ पिमानःसोज्वख्यातिभ्रमिदानप्रदनराः॥ एव्राननभवन्नवरपापपीडितः॥ नीयतेद्ादशादेनधमेरानपुरनरः ७० केवरदद्ममनिमरन्तदाहमृच्छाि त्ब्यमनितथेवातिखियमनि चदारुणाम्‌ ७१ छ्ियमानेविरतरन्तुदःखमवाघरुते स्वेनकमेविपाकेनदेदान्तरगतोऽपिसन्‌ ७२ तत्रद्रून्यवास्ता्यप्रथच्छन्ततिर-तह यञ्चपिण्डंप्यच्छन्तिनीयमानस्तद श्रुते ॥७३ तेकाभ्यद्गोषान्धवानामङ्गसंबादनंचयत्‌ तेनचाप्यायतेनन्तुयच्ा्चन्तस्ववान्धवाः ७० भरमा पद्वि्नोत्यन्तंेशमापरोतिबान्धैः दानंददद्भि्तथानन्तुरप्याय्यतेमृतः ॥७५॥ नीयमानःस्व्केेददादरापर्यति उपथुङ्कतथादत्ततोयपिण्ड दिकंभुवि ७६ द्रादशाहात्परंघोरमावासंभीषणाकृतिम्‌ याम्येपरृयत्यथोनन्तुःङृष्यमाणःपुरततः ७७ गतमातराऽतिरक्षभत्राजिनचयप्रभम्‌ मृत्युकाटान्तकादीनांमध्येप्यतिवेयमम्‌ ७८॥ है तब देहान्तर अवलम्बनं करनेपर भी अपने कर्मकेफलसे सदा दुःख अनुभवकरना पड़ता हं ७२ वाधिवगण उकं उददध्यमं जा पलपताह्त जल ब्र ०६ || देते है! उस समय वही उसके निकट पचता है ओर वृह उसीको भोजन करता ॥७२॥ बाधरवाको तेल ठगूना! वदन मठना, वर्त कारण क! उस मूत | के पोजनको यही वस्तु भाप होती है ७४ आर वाधक मिमं शयनकरनेते उपक दर हाता दान कप जव भवत हता €॥०१। | वह बारह दिन फिर अपने धर पवता हे ओर उर्तके उद्यमे जो जल तथा पिण्डादि दियाजाता पह उत्का सातां हं ७६ वाष्ट ( बीतन $ पर फिर यमदूतोके द्वारा आकपिति हो अत्यन्त बरत भरीषणाकार लोहमय यमपुर देखता हं ७७ वहां नाष पृषु, काठ, अनका पाव यतस

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रक्तलोन ओर अंजनपंजकी समान छष्णवर्णं यमराजको देखता है ७८ वह डाढ ओर भकूदीभंग अतीव कराल वदन तथा विरूप भीषणाकार ओं वक्राङति सेकडों व्याधिके द्वारा चारों ओरसे धिरे दृ ७९ वह महाबाहुयम दण्ड ओर पाश धारण करते इसमे उनका आकार बडा भयंकर ₹ै भणी उन्हीं यमराजकी निद की हृदं अच्छी बुरी गतिको भाप हेते ८० जो मनुष्य मिथ्यावादी ओर मिथ्यासाक्षी देत, हँ बह रोरव नामक नरकमें गिरे ह. नाह्मणकी हत्या करनेवाले, गोकी हत्या करनेवाटे, पिताका घात करनेवाठे ८१ खेत, ची, सीमा, धरोहरके हरनेवारेः गुरुकी श्री वा कन्यास भोग करनेवाठे उसी रौरव नरकर्मेःजाति है ८२ हे तात ! उस रोरष नरककास्वरप कहता हू सुनिये-वह रोरव नरक दो हनार योजनपरिभित लम्बा चोडा

दंष्ठाकराख्वदनंध्कुटीदारुणाकुतिम्‌ विद्पेर्भीषणेकैकेवतंव्याधिशतेःप्रथुम्‌ ७९ दण्डापक्तमहाबाहुंपाशदस्तंसुभेरम्‌ ततनिदिं्ंततोयातिग तिजन्तुःज्ुभाञ्भाम्‌ ८० रोखेक्टसाक्षीतयातियश्चानतीनरः॥ ब्र्मघ्रोदत्ययादष्टोगोघरश्पितवातकः ८१ क्षदारपहारीचसीमानिक्षपदारकः॥ गुरुपत्न्यभिगामीचकन्यागामीतेथेवच ८२॥ तस्यस्वहूपंगदतोरोखस्यनिरामय योननानांसहस्दरेरोरवोश्िमाणतः नानुमापरप्रपाणततः इवघ्रःसदस्तरः ८२ तजाद्भस्चयोपेतंकरतंचधरणीसमम्‌ जाज्वल्यमानस्तीव्रेणतापिताद्कारभूमिना ॥८४॥ तन्मध्येपापकमोंणेविसुंचन्तियमादुगाः सदह्यमानस्तीत्रेणवह्विनातरधावति ८५ पदेषदेचपादोऽस्यङीयेतेजीयेतेषुनः अहोरात्रेणोद्धरणंपादन्यासंचगच्छति ८६ एवसदस्रयुत्तीणोयो जनानांविसुच्यते ततोऽन्यत्पापञयुद्धयर्थताहडनिरयमृच्छति ८७ ततःसवैषुनिस्तीणेःपापीतियं्तमश्रुते कमिकीदपतद्गषुशापेद मकादिषु ८८

हे, ओर उस्म जांघकी बराबर गहरा गर्तं ( गृढा ) है ८३ उस गरम म्तिकाके समान अगारे भर उन तीव अंगारेसि तपर होकर वह सदा जरता रहता # यमदूत पापात्मा मनुष्योंको उसमं डल्देते रै ओर वह उस तीव्रभभ्िमे दद्यमान होकर इधर. उधर दोढते ८५ इस प्रकार उसके पैर पग पग प्र अशरिस फटते ओर नष्ट होति कि, दिन रतम एकवार पैर रखने वा पेरउढनिमं समर्थं होता है ८६ इस भाति चरण रखता हभा सहस्चयोजन उत्तीणे होने पर वहांसे शुटकारा पाता रै ओर पापशुद्धिके ल्य उसीके समान दुसरे नरकम जाता है ८७ पापी मनुष्य इस प्रकार सव नरकसि ` उत्तीणं

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भाग्पु० | ३९॥ |

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|होकर तियं योनिको भाष होता फिर कमानुसार कमि, कीट, पर्तेग॒श्वापद( रिसकजन्तु ) मच्छर. ८< गो; षोढा, हाथी, ओर वृक्ष ठतादि अनेक | ।भकारकी कष्टदायक पाप योनिोमिं जन्मग्रहण पूवक ८९ मनुप्यजन्मको भरा हो रबडाः कुत्सितः . ओर . बोना. आदि रूपसे चाण्डाल | ओर पूल्कस इत्यादि निन्दनीय योगियोमं जन्म लेता है ९० पिर शेषपुण्यते मतुप्ययोनिको भाप होकर ( यदि एण्यसंचय करे तो.) आरोदिणी गति | पाय करमशः शद्‌, पैश्य, कषत्रिय ९१ ब्रा्ण ओर देवनद्रतक हो सकता है (ओर यदि किर अधमोचरण करे तो पुनर ) अरोहिणी. गतिको भाप |

रमानुसार उन सवव नरकोमिं गिरता रै ९२ अब पुण्यवान्‌ मनुष्य जिसभरकारजाते ह॒ कहता हूं सुनो-ृण्यवान्‌ मनुष्य भी यमकी निर्दट करीहुद पण्य |

| गत्वागजद्रमायेषगे भैवच अन्यासुचैवपापाशुदुःखदासुचयोनिषु ८९ मानुष्येषाप्यकुजोवाढुत्सितोवामनोऽपिवा चण्डारुपु | | ्कसायाहनरोयोनिषुनाय ९० अवरिष्टेनपापेनपुण्येनचसमन्वितः ततः्ारोद्णीनातिशूदेर्यनृपादिकाम्‌ ॥.९१॥ पपरिदेन्रताचापि. | कदाचिदवरोहणीम्‌ एवन्तुपापकम्मोणोनरकेषुपतन्त्यधः॥ ९२ यथापुण्यकृतोयान्तितन्मेनिगद्तःशृणु तेयमेनविनिरि्यान्तिएण्यांतिनराः | ९३ प्रगीतगन्ध्ैगणेःपरनत्ताप्रसांगणेः हारनुपुरमाधुयेशोभितान्युत्तमानिच. ९. प्रयान्त्याशुविमानानिनानादिष्यन्चरुल्वखः तस्मा | | चपच्युताराज्ञामन्येषां चमहात्मनाम्‌ ९५ जायन्तेचद्रेतजसहृत्तपरिपारुकाः भोगान्संपराुवन्तयगयास्ततोयान्त्यष्वेमन्यथा ९६ अवरो | | हणीचसम्पराप्यपूवैकयान्तिमानवाः एतत्तेसपैमाख्यातेयथानन्तर्विपयते अतःशृणुष्वविपरैयथागभभ्रपयते ९७ इति श्रीमकेण्डयपुराणे | पितिापुरसवदेमृत्युदश्चावणनेनामदरमोऽध्यायः १० ` ८५ मयी गतिको भान हेति ई॥९३॥ जिससमय वह गमन करते है, तब उनके चारों ओर गंधव गतिहुए जते है अप्सरा नाचती है तथा हार नुपुर ओर माधुयं इत्यादित [शोभित अतिउत्तम॥ ९४ विमान उनके निकट अति हँ ओर वह शीधही नानाभकारके दिव्य माल्यधारणसे उच्वल हो -उनमे ेढकर जते हं, फिर पुण्य शेष हेनेपर वह विमानसे गिरकर अन्य महात्मा॥९५॥वा राजकुलमे जन्म ठे सद्तिके पाटन. करनेवाठे मनुष्य होते ओर अनेक प्रकारके भोगोको भोगकर करमशः ऊर्वम्‌ | |तिको प्राप्त हेते ॥९६॥ ओर यदि अवरोहिणी दशमे पराप हो, तो पहिले केके अनुसार समस्त भोगकरे ह. हे तात ! भराणीगण जिसभकारसेमृत्युको भाष होते | | ई, वह आपसे सन वर्णन किया हे विप ! अव जिसभकरसे गंधारण होता है, एह शुनो ९७ इति भ्रीमाकेण्डेयपुराणे भाषादीकायां दशमोऽध्यायः ॥१०॥ |

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एने कहा-हे तात ! निषेककालमे स्के रजमं मनुष्यका जो वीये भ्रा होताहैः स्वगे वा नरकसे दते ही मनुष्य उसको करता है १॥ ओर्‌ उ्केद्रारा अभिभूत होकर वह दोनों वीज स्थेयंभावको भाप होति ईह, अथात्‌ स्थिर हो जति ह, फिर कुछ गढ़ बुलबुखे टंबे गोट ओर अंडाकार्‌ भावको भाप | होते है ॥२॥ उस ठंबे गोल अंडाकारम जो सृक्म बीन रहता रै, उक्षको अंकुरकले है ओर अंकुरसे विभागके कमानुसार पाचों अंगकी उत्पत्ति होती दे॥ २॥१र

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| समस्त उपाङ्ग अर्थात्‌ अंगुली, ने्र, नासिका, मुख ओंर कान दत्यादिकी उत्पत्ति हती है ओर इस उपाङ्गे जो अंकुर उत्पन्न होता है, उससे नखादिकी उत्पति |

| होती है फिर चमंके ऊपर रोमावली ओर केश उत्पन्न होते दै इसप्रकार उसके सव अंग ओर उद्ववकोश दोरनोदी समान भराक्से बहते अथात |

| पुजउवाच निषेकंमानवरछीणां ीजंपोक्तंरनस्यथ विसुक्तमात्रोनरकात्स्वगोद्वाफ्मिपद्यते 9 तनाभिभूतंतत्स्थेययातिवीनद्रयेपितः कटरत्व | | ५4 पशि एः र्यास्त > * अङ्करनाचत पि | उपाङ्ान्यगरटीने | | उुदृदत्वेततःपेशित्वमेव्च पेयास्तथायथाबीनादंशरादिसमुद्धवः अ्गानाचितथोतपत्तिःपंचानामलुभागराः ८०५ नेभनासास्य | | अदणानिच प्ररोयान्तिचाद्वेभ्यस्तदवत्तेभ्योनलादिकम्‌ त्वचिरोमाणिजायन्तेकेशाशवततःपरम्‌ : ॥९॥ |

| नारिकेरफटंयद्वत्सकोरोवृदिमृच्छति तद्रतमयात्यसेवरदिसकोशोऽथोसुःस्थितः & तरेतुनालपाधम्यांकरोन्यस्यतवददेते अशषठोचोप

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चिन्यस् |

| रिन्यस्तोजान्वोरमेतथांयरी जानुपृष्ेतथानेेनालमष्येचनासिका र्फिवोपाष्णद्यस्थेचाहुनंयेवहिःस्थिते एवविकमायति | | नन्तुःखीगभसंस्थितः अन्यसत्वोदेजन्तोयेथारूपंतथास्थितिः काटिन्यमग्निनायातिभुक्तपीतेनजीवति पयापुण्याश्रयमयीस्थितिजंन्तो |

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| जिस समय गभकोमे नीचेको मुख किये वास करता है, तो जानु ओर पा्यकेसित दोनों हाथ निभ्रभागमे विन्यस्त रहते है दोनों अंगूढे जानुके उपर रहे ||ई,

करिन होता ओर भोजन कयि वा पिये पदाथसे उसका जीवन धारण होता है) गणेवास शी पुण्य ओर पापकी अधिकताके कारण भिन्न भिन्न |

पकारका है १० जो हो, उसकी नाभिमं जो आप्यायनी नामक नादी निबद रहती है; वह सरीकी आतपं संरष है ११ उस छिद्रदारा सरके खये भ्यि।

सब पदार्थं वहां पर्वते रहते है ओर उनके दवारा देह तृप होकर वह जीव बढता रहता है १२ तव॒ अनेक प्रकार संसारफमि उसको स्मरण होती है ओर |

चारों ओरसे पीडित होकर वह अत्यन्त दुःखको पराप्त होता हे १२ देवजनित पृवीनुभरूत शत शत जनके सव दुःखोको स्मरणकर उस समय वह इस|

पकार चिन्ता करता कि; “मेँ इस उद्रसे निकट्ते ही फिर एसे कायं की नहीं करगा, अबकीवार इस विषयमे यत्नवान्‌ रहंगा, जिससे पनवार गरभं। नाडीचाप्यायनीनामनाभ्यांतस्यनिबध्यते स्रीणां तथान्वह्यपिरेसानिवद्धोपनायते ११॥ करामन्तियुक्तपीतानिश्चीणांगभद्रेयथा तैराप्यापितदेहो ऽसोजन्तुवेदियुपेतिवे १२ स्मृतितवप्रयान्त्यस्यबहयःससारभूमयः ततोनिषदमायातिषीव्यमानइतस्ततः १३ पुननेवेकरिष्यामि युक्तमाघइदोदरत्‌ तथातथायतिष्यामिगभनाप्स्याम्यहयथा १४ इतिचिन्तयतेस्मृत्वाजन्मदःखशतानिषे यानिप्वावुभूतानिदेवभूतानियानिवे ॥१५॥ ततःकालकमाजन्तुःपरिवतेत्यधोगुखः नवमेदङमेवापिमासिप्तञ्नायतेततः ॥१६॥ निष्काम्यमाणोवातनप्राजापत्येनषील्यते निष्काम्यतेचविरु पन्इ्दिदुःखनिषीडितः ॥१७॥ निष्कान्त्योदरान्पृच्छोपसयां प्रतिपद्यते प्रप्रोतिचेतनां चाप्ोवायुस्पशेषमन्वितः॥ १८॥ ततस्तवेष्णवीमायासमास्कन्द | तिमोदिनी तयाविमोहितात्मासोज्ञानभंशमवाप्रते १९ \ भरष्ज्ञानोबारभावततोनन्तुःप्रपद्यते ततःकोमारकावस्थांयोवनवृद्धतामपि २० पुनधमरणेतद्रनन्मचाप्रोतिमानवः ततःसेसार्चकरेस्मिन्धाम्यतेवप्यन्नवत्‌ २१॥

वासका दुःख भोगना पडे” १४ १५ अनन्तर वह अधोमुख प्राणी कालक्रमसे नवमं वा दशवे महीने मे जब प्ररिवतित होता है, तब उसका जन्म | होता हे १६ उस काट वह प्राजापत्य वायुसे अत्यन्त पीडित होकर निकढता है ओर हदयके अत्यन्त दुःखम पीडित होकर विठाप करताहभा

= =. -‰ होती न, पसे ४४ अन | बाहर आता है १७ इसप्रकार उदरसे निकटतेही उसको अद्य मृ होती है ओर किर वायुके स्यशसे चेतनाभी रीजाती है १८ अनन्तर |

मोहिनी वैष्णवी माया उसको लिपट जाती हे भर उस मायि षिमोहितात्मा हनेपर उसका ज्ञान नष्ट होनाता हे॥ १९ इसप्रकार ज्ञान नष्ट होनेपर वह भरणी क्रमा न॒सार बाल्य कौमार योवन ओर वद्धावस्था इत्यादि नाना दशा भोगता हे २० ओर फिर प्राण त्याग करके पुनवार उसी पमं जन्म ठेता सुतरां

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भाग्यीर भ० ३११

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